Sunday, June 14, 2015

सदा ये ध्यान रखो कि हरि-गुरु सदा मुझे एवं मेरे संकल्पों को देख रहे हैं। बस फिर न लापरवाही ही आयेगी न विस्मरण ही होगा।
........श्री महाराज जी।
अंत:करण शुद्ध होने पर गुरुकृपा से स्वरूप शक्ति मिलेगी । तब माया निवृत्ति एवं भगवत्प्राप्ति होगी । तभी भगवत्सेवा रूपी चरम लक्ष्य प्राप्त होगा ।
------ श्री महाराजजी ।
श्री महाराज जी अपने सम्पूर्ण साहित्य एवं प्रवचन द्वारा पुनः - पुनः यही सिद्धान्त जीवों के मस्तिष्क में भर रहें हैं। उनके मतानुसार ब्रह्म जीव माया तीन तत्व सनातन हैं , किन्तु जीव एवं माया दोनों ही ब्रह्म की शक्ति हैं। ब्रह्म श्री राधाकृष्ण का दिव्य प्रेम प्राप्त करना साध्य एवं उनकी ही निष्काम भक्ति करना ही साधना है।

The world will not give you anything unless there is self-interest involved. However, God and your Guru bestow the nectar of divine love without any self-interest.
------SHRI MAHARAJJI.

Saturday, June 6, 2015

Let's practice feeling deep gratitude towards God for all the Graces we have received from Him. "Thank you God for your infinite compassion" As we progress in our appreciation of all the Graces He bestows upon us, we will automatically enhance love for God in our hearts.
............SHRI MAHARAJJI.

हम पतितों की प्राण हैं राधे, जीवनधन अरमान हैं राधे।
स्वामिनी कर दो दया की दृष्टि, दिन रात हम तुमहें ही आराधे ।।
अगर कोई सोचता है- मैं अभागा हूँ। यह भगवान अथवा गुरु के प्रति सबसे बड़ी अकृतज्ञता है। कोई समर्थ गुरु मिल गया तो। भगवान की कृपा की तो यह अंतिम सीमा हो गयी।
------श्री महाराजजी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...