Sunday, December 6, 2015

सुप्रीम पावर पूर्णतम पुरुषोतम ब्रह्म श्रीकृष्ण ही वास्तविक नित्य अनन्त मात्रा के प्रकाश हैं शेष सब अंधकार का स्वरूप हैं। जड़ स्वरूप हो चाहे चेतन हो चाहे कुछ भी हो।
.............जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

शरण्य के प्रति जीव की नित्य शरणागति ही साधना है एवं शरणागति द्वारा शरण्य की नित्य सेवा ही जीव का परम-चरम लक्ष्य है।
-------------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

हे श्यामसुन्दर ! संसार में भटकते - भटकते थक गया। हे करुणा वरुणालय ! तुमने अकारण करुणा के परिणामस्वरूप मानव देह दिया , गुरु के द्वारा तत्वज्ञान कराया कि किसी तरह तुम्हारे सम्मुख हो जाऊँ तथा अनन्त दिव्यानन्द प्राप्त करके सदा-सदा के लिए मेरी दुःख निवृति हो जाए लेकिन यह मन इतना हठी है कि तुम्हरे शरणागत नहीं होता।
--------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
अगर कोई सोचता है- मैं अभागा हूँ। यह भगवान अथवा गुरु के प्रति सबसे बड़ी अकृतज्ञता है। कोई समर्थ गुरु मिल गया तो। भगवान की कृपा की तो यह अंतिम सीमा हो गयी।
------श्री महाराजजी।

Sunday, November 1, 2015

हरि-गुरु को अपने साथ महसूस करना ही सबसे बड़ी साधना है। इससे हम अपराधों से भी बचे रहेंगे।
........श्री महाराजजी।
प्रेमी का तो यह ध्येय है कि भले ही हमारे शरीर की बोटी-बोटी समाप्त हो जाये लेकिन बस हमारा इष्टदेव या स्वामी प्रसन्न रहे।
.........श्री महाराजजी।

जितनी देर जिस गहराई से मन भगवदीय उपासना में तल्लीन रहेगा , वही भगवदीय उपासना नोट होगी। बाकि सब की सब माया की उपासना में नोट की जायेगी।
.......श्री महाराजजी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...