Tuesday, January 5, 2016

One should not forget God in times of happiness and should realise His grace even in times of misery.
सुख का अनुभव करते समय भी भगवान् को मत भूलो तथा दुःखकाल में भी उनकी कृपा का अनुभव करो।
........सुश्री श्रीधरी दीदी (जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज की प्रचारिका)।
सहज सनेही प्रभु हमारे,बड़े ही भोले भाले हैं।
जो जन इनकी शरण में आये,बन जाते रखवाले हैं।।
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज की जय.....राधेरानी की जय हो।

जिस महापुरुष के सानिध्य में हृदय में भगवतप्रेम बढ़ने लगे एवं हृदय पिघलने लगे तो समझ लो की वह वास्तविक महापुरुष ही है।
With Whomsoever Saint’s Company, Your heart melts and Your love for God Increases, Then surely realize that saint to be a real saint.
.....Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj.
तुम्हारा श्याम सुंदर के बिना जीना निरर्थक है। पेट तो शूकर भी भर लेते हैं। क्या केवल पेट भरना ही जीवन का उद्देश्य है?
.........श्री महाराजजी।

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
शीश दियो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।।
यह जोरी नीकी जान रे |
यह मन अरु वह मनमोहन दोउ, दीखत एक समान रे |
इत कह मन अति चंचल वाको, वेग वायु बलवान रे |
उत चंचलताहूँ ते चंचल, सुंदर श्याम सुजान रे |
इत कारो मन जनम कोटि के, पापन, संत बखान रे |
उत ‘कृपालु’ कारो हरि पुनि कत, धरत न मन ! उन ध्यान रे ||

भावार्थ - यह युगल जोड़ी कितनी अच्छी है | अरे मन ! तेरी एवं मनमोहन की सभी बातें एक सी हैं | तेरा भी वेग वायु से बढ़कर है, उधर श्यामसुन्दर भी चंचलता से भी अधिक चंचल हैं | महापुरुषों के कथनानुसार इधर तू भी करोड़ों जन्मों के पापों से काला है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि उधर श्यामसुन्दर भी काले हैं | फिर भी अरे मन ! तू उन श्यामसुन्दर से मैत्री क्यों नहीं कर लेता |
( प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

Sunday, January 3, 2016

O Krishn, my Lord! Please make me a true devotee of one of Your rasik Saints so that I can have his darshan, association and affection all the time; and also, with my body, mind and money, I may delightfully serve him forever.
O Krishn, my Lord! Please allow me to do the satsang of your Saint with constancy so that I may fulfill his teachings, and thereby detach myself from worldly attractions.
---------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...