This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Tuesday, January 5, 2016
यह जोरी नीकी जान रे |
यह मन अरु वह मनमोहन दोउ, दीखत एक समान रे |
इत कह मन अति चंचल वाको, वेग वायु बलवान रे |
उत चंचलताहूँ ते चंचल, सुंदर श्याम सुजान रे |
इत कारो मन जनम कोटि के, पापन, संत बखान रे |
उत ‘कृपालु’ कारो हरि पुनि कत, धरत न मन ! उन ध्यान रे ||
यह मन अरु वह मनमोहन दोउ, दीखत एक समान रे |
इत कह मन अति चंचल वाको, वेग वायु बलवान रे |
उत चंचलताहूँ ते चंचल, सुंदर श्याम सुजान रे |
इत कारो मन जनम कोटि के, पापन, संत बखान रे |
उत ‘कृपालु’ कारो हरि पुनि कत, धरत न मन ! उन ध्यान रे ||
भावार्थ - यह युगल जोड़ी कितनी अच्छी है | अरे मन ! तेरी एवं
मनमोहन की सभी बातें एक सी हैं | तेरा भी वेग वायु से बढ़कर है, उधर
श्यामसुन्दर भी चंचलता से भी अधिक चंचल हैं | महापुरुषों के कथनानुसार इधर
तू भी करोड़ों जन्मों के पापों से काला है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि
उधर श्यामसुन्दर भी काले हैं | फिर भी अरे मन ! तू उन श्यामसुन्दर से
मैत्री क्यों नहीं कर लेता |
( प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
( प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
Sunday, January 3, 2016
O
Krishn, my Lord! Please make me a true devotee of one of Your rasik
Saints so that I can have his darshan, association and affection all the
time; and also, with my body, mind and money, I may delightfully serve
him forever.
O Krishn, my Lord! Please allow me to do the satsang of your Saint with constancy so that I may fulfill his teachings, and thereby detach myself from worldly attractions.
---------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.
O Krishn, my Lord! Please allow me to do the satsang of your Saint with constancy so that I may fulfill his teachings, and thereby detach myself from worldly attractions.
---------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.
ये
आदमी खराब है, ये अच्छा। होगा, ये भी खराब निकला, ये अच्छा होगा, यही
रिहर्सल कर रहे हैं हम लोग अनादि काल से अब तक। फिर भी पक्का नहीं हो सका
कि यहां सब गड़बड़ है। नर्मदा के कंकड़ सब शंकर। ‘कूप में ही यहां भांग
घुली है’ और कोई बुरी बात नहीं है। अरे भाई, जैसे हम भूखे हैं, आनन्दके,
ऐसे ही सब हैं। जैसे हम अपने मतलब के लिए मां बाप बेटा स्त्री पति पड़ौसी
से प्लान बना-बनाकर स्वार्थ सिद्ध करने के चक्कर में रहते हैं, ऐसे ही सब
रहते हैं। समझे रहो। तुम ही अकेले बुद्धिमान हो और नहीं है, क्यों
भूल जाते हो तुम्हारे साथ कोई एक्टिंग कर रहा है और तुम समझते हो, फैक्ट
है। हम तुम्हारे लिये जान दे सकते हैं। देखो उसने कहा था कि हम जान दे सकते
हैं। ऐ! बेवकूफ बना रहा है। जितना अधिक भयानक शब्द। कोई बोलता है, समझ लो,
उतना ही बड़ा वो ठग है, धूर्त है, चार सौ बीस है, उसका बहुत बड़ा स्वार्थ
है। अगर स्वार्थ कम है तो हल्का शब्द ही बोलेगा और स्वार्थ नहीं है तो
नमस्ते ऐसे करता है। एक हाथ से भी होता है नमस्ते आजकल। चले जा रहे हैं-
नमस्ते, क्यों कि वहां स्वार्थ नहीं है। तो हम स्वयं को तो बुद्धिमान मानते
हैं औरों को बेवकूफ मानते हैं। हमने उसको बेवकूफ बनाया। खूब दावत किया,
खूब स्वागत-सत्कार किया वो बेवकूफ बन गया।
-----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
Every
minute is unlimitedly precious. We cannot buy back even one minute of
lost time, even if we possess all the world's wealth. Therefore time
should not be squandered in unnecessary sense gratification. We should
instead fully dedicate our every thought, word, and deed in all times,
places, and circumstances to awakening our dormant devotion to
HARI-GURU. This is the proper utilization of the human form of life.
............Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj.
............Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj.
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मन का अटैचमेंट किसमें करें?
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