Thursday, February 4, 2016

भगवान् तथा महापुरुष शुद्ध शक्ति हैं। महापुरुष का संग सांसारिक हानि सहकर भी करना श्रेयस्कर है। महापुरुष भले ही प्रेमयुक्त व्यवहार करें , उदासीन रहें अथवा विपरीत व्यवहार ही क्यों न करें । सबमें हमारा कल्याण है।
--------सुश्री श्रीधरी दीदी (जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज की प्रचारिका)।
श्री महाराजजी से प्रश्न: हमें अपने चिंतन के प्रति सावधान क्यों रहना चाहिए?
श्री महाराजजी द्वारा उत्तर : क्योंकि हमारे उत्थान और पतन का कारण हमारा चिंतन है। भगवदविषयों के विपरीत चिंतन से हमारी बुद्धि मोहित हो जाती है।
"क्षण क्षण हरि गुरु स्मरण में ही व्यतीत करो। पल पल मृत्यु की और बढ़ रहे हो और संसार में बेहोश हो।
------सुश्री श्रीधरी दीदी (प्रचारिका), जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।"

आत्‍मा की परवाह नहीं है....!!!
ठीक है मन बहुत पापी है, तो फील तो करो। पचास बार कोशिश करोगे एक बार मन लगेगा। तो कल उनचास बार में एक बार लगेगा, परसों अड़तालिस बार में एक बार लगेगा, ऐसे अभ्‍यास करते- करते लगने लगेगा।
जब आप लोग पैदा हुये तो करवट बदलना भी नहीं जानते थे। सोचिये कितना मुलायम शरीर था, और उतान पड़े रहते थे। अब आप हट्टे- कट्टे होकर लम्‍बे चौड़े, छः फुट के हो गये। कभी ऑपरेशन में आप को चार दिन डॉक्‍टर बिना करवट के कम्‍पलीट रेस्‍ट के लिये कहता है तो करते हैं और उस अवस्‍था से लेकर आप दौड़ने लगते हैं। ये अभ्‍यास से तो हुआ।
भगवान् के विषय में आप क्‍यों हार मानते हैं, कि क्‍या बतायें समझते तो हैं लेकिन होता नहीं। होता नहीं? कोई होता है? ये आप लोग कपड़ा पहन कर बैठे हैं, ये अपने आप कपड़ा आपको पहन जाता है? नहीं जी, नहाते हैं, धोते हैं फिर एक- एक कपड़ा पहनते हैं, अंगो को ढकते हैं। क्‍यों? नंगे क्‍यों नहीं घूमते? अरे नहीं, लोग क्‍या कहेंगे। लोगों की इतनी परवाह है और आत्‍मा की परवाह नहीं है कि मरने के बाद क्‍या होगा? इतने असावधान हैं दिन भर। अरे! गधों आत्मा की परवाह करो शरीर की नहीं।
-----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

जैसे जलयान खग गोविंद राधे। उडि थकि जलयान आवे बता दे।
जीव जग सुख नहीं गोविंद राधे। पावे तब आवे हरि शरण बता दे।।
समुद्र के जहाज पर कोई पक्षी बैठा था और जहाज़ चल पड़ा और वो पचासों सेकड़ों मील चला गया जहाज़, तो पक्षी सोच रहा है मैं खाऊँ पीऊँ क्या? ये तो पानी ही पानी है चारों ओर, और पानी में खड़ा भी नहीं हो सकता और समुद्र में कब तक बैठा रहुंगा, ऐसे जहाज़ पे से उड़ा और बहुत दूर तक चला गया जब थक गया, उसने कहा अब क्या करें? खड़े होने तक की जगह नहीं हैं, फिर आ कर के जहाज़ पर बैठ गया और कोई गति नहीं बेचारे की, चारों और पानी ही पानी है, कहीं स्थल नहीं, पेड़ नहीं, खाने-पीने का सामान नहीं।
उसी प्रकार ये जीव भगवान से विमुख होकर उड़ा, 84 लाख योनियों में घूमा, थक गया, कहीं सुख नहीं मिला तो फिर भगवान की शरण में गया कि संसार में कहीं सुख नहीं है, हमको धोखा था, अब समझ में आ गया। पहले संसार में सुख ढूंढता है, युवावस्था आयी ब्याह किया, बीबी पति हुआ यहाँ सुख मिल जायेगा, वहाँ भी चप्पल-जूते मिले, कोई सुख नहीं मिला। आगे बाल बच्चे हुए, इनसे सुख मिल जायेगा, खूब लाड़ प्यार किया बच्चों को, बड़े होकर वो भी नमस्ते करके चले गए, किसी ने साथ नहीं दिया, अब भगवान कि शरण में आया।

-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

हमारे प्यारे श्री महाराजजी (जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु) तो सदा से ही हम पर निगरानी रखते हैं। हमारे हर संकल्प हर क्रिया को हर क्षण हमारे साथ रहकर देखा करते हैं। यह हमारी कमी है कि हम उन्हें अपने साथ सदा महसूस नहीं कर पाते। बस पूर्ण दीनातिदीन होकर अपनी इंद्रिय,मन,बुद्धि को उनके चरणों में सदा-सदा के लिए चढ़ा दो। केवल उनकी आज्ञा ही हमारा चिंतन और उसका पालन ही हमारा काम है। बस इतनी साधना है। इसी बात पर आँसू बहाकर उनके चरणों को धोकर पी लो कि हम उन्हें सदा साथ-साथ महसूस क्यों नहीं करते।
जय श्री राधे।

When we learn to surrender to the will of God, and accept ourselves as His servants, life becomes a festival and a continuous celebration.

........SHRI MAHARAJJI.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...