Wednesday, March 2, 2016

●जगद्गुरुत्तम् श्री कृपालु जी के श्रीमुख से●
दुर्वासा चिल्ला रहे हैं सारे देश में चौराहे पर खड़े हो करके, मुझे कोई गुरु बना लो, मेरा कोई चेला बन जाओ। लेकिन याद रखो अगर चेला बनने के बाद सेवा में कोई गड़बड़ हुई तो खैरियत नहीं होगी यह नारा लग रहा है। अब दुर्वासा का नाम सब जानते थे कि बड़े भारी महापुरुष हैं सबको पता है । बड़ी पॉवर है। गली - गली में विख्यात हैं। लेकिन जो वर्ना कह दिया कि अगर किसी ने सेवा में गड़बड़ी की उसने कहा भैया बिना गुरु के ही ठीक है । क्योंकि सेवा में गड़बड़ हो ही जायगी, संसारी जीव कौन सेवा का दावा कर सकता है ।
अस्तु दुर्वासा के नारा लगाने पर एक भी तैयार नही हुआ शिष्य बनने को । तो दुर्वासा गये द्वारिका । द्वारिका में सब महापुरुष ही महापुरुष हैं और भगवान् तो हैं ही हैं । उनकी सारी बीबियाँ सब महापुरुष ही हैं और माया का सवाल ही पैदा नहीं होता, लेकिन वहाँ भी अगर सेवा में गड़बड़ की तो दण्ड मिलेगा । जब ये वाक्य सुना लोगों ने कहा भई ठीक है ठीक है, आप आगे जाइये और कोई चेला ढूढिये । श्रीकृष्ण ने सुना एक दूत ने आकर बताया कि सरकार एक ऐसा-ऐसा फकीर आया है वो ऐसे चिल्ला रहा है। और कहता है हमारा नाम दुर्वासा है । तो उन्होंने कहा - अरे बुला लाओ , बुला लाओ । हम शिष्य बनेंगे उनके।
एक शिष्य बनने को तैयार हुए । वह जगद्गुरु श्रीकृष्ण आज शिष्य बनने जा रहे हैं । दुर्वासा के । और कौन हिम्मत करे ? ले आये महल में ठहरा दिया और पच्चीस - पचास लड़कियां सेवा में कर दिया दिया दुर्वासा के । बड़ी एक्सपर्ट लडकियाँ जो थीं सेवा में स्पेशल क्लास की । तो दुर्वासा ने कहा कि भई मैं तो खीर खाऊँगा । तो रुक्मिणी ने कहा ये कैसे बाबा जी हैं ? अरे बाबा जो कोई आता है तो उसको जो मिल जाय खा लेना चाहिये । मैं खीर खाऊंगा , हलुआ खाऊंगा । हाँ । पहले ही पहले । कोई बेतकल्लुफी हो जाय घर में , किसी गृहस्थी के घर तो बाबा जी लोग कुछ कह भी देते हैं और वह इस बहाने से कहते हैं कि आज तो हमारे गोपाल जी तस्मई खायेंगे । वह जो पत्थर के गोपाल जी लिये रहते हैं न उन्ही को बहाना ले लेकर के बाबा लोग खूब मालटाल खाते हैं । आप लोगों में से शायद किसी को अनुभव हो और वैसे भी बेतकल्लुफी हो जाने पर संसार में लोग कह देते हैं , लेकिन पहली बार में ऐसी बात करें ए ए श्रीकृष्ण ! मैं खीर खाऊँगा । हाँ महाराज जी ! जैसी आज्ञा । रुक्मिणी खीर लाओ । महालक्ष्मी की अवतार वहाँ क्या कमी है ? वहाँ कौन सा प्रश्न है आज चीनी नहीं है , आज दूध नहीं है , जरा दस मिनट रुक जाओ , ये सब सवाल नहीं है । ए खीर ! ए खीर आ गयी । सब सिद्धियाँ वहाँ नौकरानी हैं रुक्मिणी की । एक आध गस्सा खाया वाया और श्रीकृष्ण से कहा ए इस खीर को पोत लो अपने शरीर में । रुक्मिणी देख रही हैं कि क्या बाबा हैं और इनका दिमांग खराब है कि चुपचाप सुने जा रहे हैं सब । हाँ । सारे शरीर में श्रीकृष्ण ने अपने पोत दिया खीर। उसके बाद कहा - ये रुक्मिणी इधर आ । रुक्मिणी ने कहा मेरी भी शामत आई है बाबा हमको भी बुला रहा है । हाँ । अरे भई ये तो पुरुष हैं ठीक हैं । इनको कुछ भी बुलावें , हमको क्यों बुला रहे हैं बाबा जी । बैठाया और खीर अपने हाँथ से ले के उसके सारे शरीर में पोता रुक्मिणी के । अब बिचारी संकोच कर रही है स्त्री शरीर है । ठीक है श्रीकृष्ण चुप हैं तो बेचारी वह क्या बोले ? उसके बाद गये अपने जिस महल में ठहरे थे उसमें आग लगा दिया । वो जलने लगा । सब नौकरानियाँ भागीं । अरे वो पागल बाबा आया है उसने आग लगा दिया ( हंसी ) लेकिन अब श्रीकृष्ण से कौन बोले ठीक है भई वह कहते हैं हम गुरु बनायेंगे तो कौन बोले नौकर चाकर की हिम्मत क्या । अरे कृष्ण जरा मैं घूमने चलूँगा रथ तैयार करो । देखो रथ में घोड़े नहीं रहेंगे एक तरफ तुम , एक तरफ रुक्मिणी । रुक्मिणी ने कहा और लो , जो कसर है बाकी , पूरी हो गयी । अब घोड़ा बनना पड़ेगा हमको । और बैठ गये ठाठ से रथ के ऊपर , कोड़ा लेकर हाँथ में चाबुक और रथ लेकर चले दोनों , लेकिन रुक्मिणी तो कमजोर पड़ती थी बेचारी , अरे सोचो महालक्ष्मी की अवतार , इतनी कोमलांगी जो कमलासन कहलाती हैं कमल के ऊपर उनके चरण का निचला भाग रहता है हमेशा कमल की पंखुड़ियों के ऊपर । वह रथ लेकर चले नंगे पाँव , चप्पल नहीं पहन सकते गुरु को ले जाना है चप्पल वप्पल नहीं चलेगा , तो कुछ दूर चली उसके बाद कन्धा उनका यों यों होने लगा नीचे । जब एक तरफ का बैल गड़बड़ करे तो दूसरी तरफ का बैल क्या करेगा अकेला ? तो चाबुक मारा रुक्मिणी को । और श्रीकृष्ण अपना चुपचाप बड़े विभोर हो रहे हैं ( हंसी ) श्रीकृष्ण ने कहा - महाराज ! ये शिष्य नहीं बन सकती , मैं अकेला रथ ले चलूँगा आपका । बताइए कितनी स्पीड में ले चलूँ और कहाँ ले चलूँ ? किस लोक में ? तो देखा दुर्वासा ने और कहा कि हाँ ठीक है , ठीक है , तू पास हो गया । कहीं जाना वाना हमको नहीं था । ये सब विपरीत व्यवहार मेरी एक्टिंग थी ! जा तू पास हो गया । लेकिन तूने एक गलती किया है । हैं महाराज ! हमसे भी गलती हो गयी ? हाँ हो गयी । क्या गलती किया महाराज ! हमने कहा था सारे शरीर में खीर पोत लेना तुमने तलवे में नहीं पोता , उसी तलवे में तेरे बाण लगेगा , अन्तिम समय में । तूने मेरी आज्ञा पूरी - पूरी नहीं मानी । सारे शरीर में प्रत्येक अंग में खीर पोता , तलवे में नहीं पोता । यह बता रहा हूँ जो वेद की कथा है । कोई कहानी वहानी यहाँ वहाँ की नहीं है । सत्य कथा बता रहा हूँ ।
तो ये विपरीत व्यवहार करते हैं महापुरुष लोग । प्राचीन काल में तो नाइंटी नाइन परसेंट यही हुआ करता था लेकिन अब इस युग में तुलसी , सूर , मीरा , कबीर , नानक तुकाराम तमाम संत हुए उन्होंने समय - समय पर किया , ज्यादा नहीं किया क्योंकि जीव कल्याण करने के लिए सोचना पड़ता है कि भई इनकी योग्यता ऐसी नहीं है सहन करने की । कभी - कभी मूड में आ जाने पर कर देते हैं । थोड़ा समझने के लिए कि भई कुछ थ्योरी समझता भी है कि नहीं ये । खाली सिर हिलाता है लेक्चर में बैठकर ये ।
----- जगद्गुरुत्तम् श्री कृपालु जी महाराज।
प्यार तीन प्रकार का होता है । मोटी अकल से समझे रहो हमेशा के लिये । एक भीतर भी प्यार हो बाहर भी प्यार हो ठीक-ठीक और एक भीतर प्यार हो लेकिन बाहर आउट न किया जाय और तीसरा प्यार एक और होता है भीतर प्यार हो सेंट परसेंट लेकिन बाहर विपरीत व्यवहार किया जाय । इसमें तीसरा वाला तो महापुरुष के लिये खिलवाड़ है , भगवान् के लिये खिलवाड़ है । वह तो विनोदी है न , करते रहते हैं जान बूझकर चिढ़ाने के लिये कि देखें इसका प्यार सच्चा है कि कच्चा है । उल्टा व्यवहार करेंगे । अब अगर आप सचमुच प्यार करते हैं , तब तो आप मुस्कुरा देंगे । ठीक है , ठीक है , ठीक है । जब श्रीकृष्ण नें उल्टा व्यवहार किया भीष्म पितामह के साथ , चक्र लेकर दौड़े रथ का पहिया मारने के लिये , तो भीष्म पितामह हंसने लगे , गुस्सा नहीं किया और कहा , आओ आओ न , खड़े क्यों हो गये ? जरा देखें तुम्हारी हिम्मत हो तो आगे आओ ।
अब बताओ शत्रु इतना बड़ा शत्रु जिसके संकल्प से अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड भस्म हो जायें , वह गुस्से में भौंहे ताने , दांत पीसते हुये , पसीना-पसीना लहू लुहान , सारे शरीर से खून बह रहा है , सारे शरीर को छेद डाला भीष्म पितामह ने श्रीकृष्ण , अर्जुन दोनों के शरीर को । इतनी भयानक स्थिति में भी और भगवान् क्रोध की अन्तिम सीमा में एक्टिंग करते हुये , रथ की पहिया लेकर दौड़े सीना तानकर और भीष्म पितामह हंस रहे थे और कहते हैं यह एक्टिंग किसी और के साथ करना , मैं सब जानता हूँ , आओ आगे आओ , एक कदम चलकर रुक क्यों गये ? हमको सब पता है । अन्दर प्यार भरे हैं भीष्म पितामह के प्रति अनन्त और बाहर से ये विरोध की एक्टिंग कर रहे हैं विपरीत व्यवहार । और इसी विरोधी विपरीत व्यवहार वाली मुद्रा का ही ध्यान करते हुए शरशैय्या पर भीष्म पितामह छह महीने " वा पट पीत की फहरान " वह नहीं भूलती । पीताम्बर फहरा रहा है और भौहें तनी हैं और दांत पीस रहे हैं । क्या बढ़िया झाँकी है बड़ी अच्छी एक्टिंग कर लेते हैं ।
तो विपरीत व्यवहार जो करता है आम तौर से जो करता है वह अनुकूल व्यवहार करे तो समझो भारी कृपा है वरना तो उसको विपरीत व्यवहार करना ही चाहिये क्योंकि वह, क्योंकि वह क्या बतावें , क्योंकि गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नतः रसिकों के जगत में उनको आदेश है कि प्रेम को छुपाओ छुपाओ छुपाओ । और छुपाने का क्या तरीका है ? उल्टा व्यवहार करो । बस कोई नहीं जानेगा ।
----- जगद्गुरुत्तम् श्री कृपालु जी महाराज।
गौरांग महाप्रभु के समय में एक साधक था । उसको आंसू नहीं आते थे । उसको बड़ी फीलिंग हुआ करती थी कि सब आंसू बहा रहे हैं और मैं इतना अधम हूँ , इतना पतित हूँ । तो उसने अपना मिर्ची लिया और धोती के कपड़े में बांध करके उस मिर्ची को आँख से लगावे और उससे अपना पानी निकलेगा ही । तो किसी ने देख लिया कि रोज ये करता है कि हाँथ में लेकर के आँख में लगाता है और वो चीज पकड़ ली , देखा तो उसमें मिर्ची है , लाल मिर्चा । वो भाग करके महाप्रभु जी के पास गया कि महाराज जी देखिये इतना दम्भ हो रहा है आपके यहाँ । उन्होंने कहा , बुलाओ उसको । आया । पूंछा उससे , क्यों भाई तुम ऐसा क्यों करते हो ? हमने ये तो नहीं कहा कि तुम पाखण्ड करो इस प्रकार से मिर्ची लगा करके । उसने कहा महाराज जी मैं क्या करूं कई दिन से परेशान हूँ । मुझे नींद तक नहीं आती इस चिन्तन में , टेंशन में कि मुझे संकीर्तन में आँसू नहीं आते । तो इस प्रकार जब महाप्रभु जी से उसने कहा तो महाप्रभु जी ने दौड़कर उसको चिपटा लिया ।
अब शिकायत करने वाला दंग रह गया , कि सत्संग से इसको निकाल देना चाहिए इसके बजाय इसको चिपटा रहे हैं ! उन्होंने शिकायत करने वाले को डाँटा , एक बात बताओ जी तुम साधना करने आते हो , यहाँ कहते हैं राधाकृष्ण का ध्यान करो और तुम इस आदमी को देखते रहते हो कि ये पोटली लिये कैसे आँख में लगा रहा है ? क्या कर रहा है ? तुम इंस्पेक्शन करने आते हो यहाँ ? तुम बड़े अपराधी हो । ये बिलकुल अपराधी नहीं है , क्योंकि इसका लक्ष्य लोकरंजन का नहीं है । ये अपराधी तब होता जब लोकरंजन का लक्ष्य रखता अर्थात मिर्ची लगा करके आँसू बहा करके किसी को प्रभावित करके उससे कोई स्वार्थ सिद्धि चाहता , ये लक्ष्य बनाए होता अपना , तब तो ये दोषी था । ये तो अपने आप को दण्ड दे रहा है फील करके कि मेरे आँसू क्यों नहीं आते , और ये फीलिंग ऐसी है कि अगर थोड़े दिन भी ऐसी फीलिंग हो जायेगी तो ये फीलिंग ऐसी है कि अगर थोड़े दिन भी ऐसी फीलिंग हो जायेगी तो ये अपने लक्ष्य में सफल हो जायेगा ।
---- जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज।

Monday, February 15, 2016

जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने अपने दिव्य प्रवचनों के द्वारा समस्त वेदों - शास्त्रों के वास्तविक रहस्यों को अत्यंत सरल और सारगर्भित शैली में उद्घाटित किया है । वास्तव में श्री महाराजजी का दिव्य अवतरण इस कलिकाल में इसीलिए हुआ है क्योंकि विभिन्न मत और सम्प्रदायों ने अपने अपने मतानुसार शास्त्रों वेदों की अनेक परस्पर विरोधी व्याख्याएं करके साधारण आस्तिक जनता को भ्रमित ही करने का कार्य किया है ।भक्ति का वास्तविक स्वरूप ,कर्म -धर्म ,ज्ञानयोग और मोक्ष आदि की जो अनेकानेक परस्पर विरोधी व्याख्याएं की गई हैं ,श्री महाराज जी ने सभी का समन्वय करके एक मात्र 'भक्तिमार्ग' की ही श्रेष्ठता प्रतिपादित की है । इसी योग्यता के कारण श्री महाराजजी को "निखिल दर्शन समन्वयाचार्य " की उपाधि से अलंकृत किया गया ।
समस्त शास्त्र -वेदों का अर्थ इतने विशद रूप में पहली बार पब्लिक के बीच में उनकी ही सरल भाषा में श्री महाराजजी ने सहज ही प्रकट किया है ।
इसके बावजूद भी कुछ तथाकथित सम्प्रदायवादियों को आपत्ति है कि श्री महाराज जी ने पूर्व वर्ती जगद्गुरुओं की भांति ब्रह्म सूत्र ,उपनिषदों तथा श्रीमदभगवद्गीता आदि का भाष्य नहीं किया ।
श्री महाराज जी द्वारा जो दिव्यातिदिव्य तत्वज्ञान अपने अनगिनत प्रवचनों के माध्यम से जन साधारण को प्रदान किया गया वह क्या किसी भी भाष्य से कम है ।अनेकानेक पद संकीर्तन आदि चलते फिरते ही श्री महाराजजी ने सहज ही भावावेश की अवस्था में प्रकट किये हैं उनमे जो अनुभूति की तीव्रता है जो सरसता है जो विलक्षणता है उस रस की तुलना क्या किसी भाष्य से हो सकती है ?
श्री महाराज जी ने अपनी दिव्य वाणी के द्वारा जिन शास्त्र वेदों के निगूढतम सिद्धांतों को प्रकट किया है उनका स्थान कोई भी भाष्य नही ले सकता ।
स्वयं वेद व्यास जी ने श्रीमद्भागवत के विषय में लिखा -'अर्थोsयं ब्रह्म सूत्राणाम्' ।।
फिर ब्रह्म सूत्रों पर अन्य किसी भाष्य की क्या आवश्यकता है ।श्री महाराजजी ने अनेक बार इस तथ्य को अपने प्रवचनों में उल्लिखित किया है ।
प्रत्येक महापुरुष का प्राकट्य देश काल तथा युग धर्म की परिस्थतियो के अनुकूल होता है ।पूर्व वर्ती जगद्गुरुओ ने तमाम भाष्य लिखे वह उस युग के अनुकूल रहा होगा लेकिन क्या वर्तमान काल में उस शैली के संस्कृत भाष्य, तत्व जिज्ञासु लोगो को कुछ लाभ दे पायेंगे। वे तो बस पोथियो की ही शोभा बढ़ाएंगे ।
दूसरी बात है 'परम्परा और सम्प्रदाय' की श्री महाराजजी ने अनेको बार इस बात को दोहराया है कि दो ही सम्प्रदाय हैं -एक माया का यह 'भौतिकतावादी सम्प्रदाय' जिसमे फंसा हुआ जीव अनादि काल से ठोकरे खा रहा है और दूसरा है 'भगवदीय सम्प्रदाय' । इसी को कठोपनिषद में "प्रेय मार्ग और श्रेय मार्ग" कहा गया है - "अन्य च्छ्रेयोsयुदुतैव प्रेयस्ते नानार्भे पुरुषं सिनीत:॥
तयो श्रेय आददानस्य साधु भवति दीयतेsर्थाद्य प्रेयो वृणीते"।।
कबीर ने भी कितना सुन्दर कहा है -
'पखा पखी के कारने सब जग रहा भुलान निरपख हो के हरि भजे सोई संत सुजान' ।।
अर्थात पक्ष विपक्ष मत मतांतरों और सम्प्रदायो के झगड़ो में सारा जगत उलझा हुआ है । जो इन झगड़ो से परे रहकर अनन्य भाव से हरि का भजन करता है वही वास्तविक संत होता है ।
तो हमारे श्री महाराजजी ऐसे ही निरपख संत सुजान हैं ।। वे किसी बाहरी दिखावे या बंधन के आधीन नहीं है । उन्होंने तो जीवन पर्यन्त मुक्त हस्त से हम कलिमल ग्रसित अधम जीवों पर अपनी करुणा और कृपा की निरंतर वर्षा की है और आज भी हम सबके हृदय में बसे हुए हैं । सूर्य के तेज को कोई डिबिया में बंद नहीं कर सकता ऐसे ही श्री महाराजजी के दिव्य व्यक्तित्व और कृतित्व को कोई किसी उपाधि परम्परा या सम्प्रदाय में नहीं समेट सकता

।।राधे -राधे ।।
श्रीमद्सद्गुरु सरकार की जय।
हमारे श्री महाराजजी कलिमल ग्रसित अधम जीवों को भी सचमुच बरबस ब्रजरस में सराबोर करना चाहते हैं। उनके श्रीमुख से नि:सृत संकीर्तन ब्रज रस ही है, पीने वाला होना चाहिये। श्री महाराजजी की रचनाओं में निहित रस का रसास्वादन तो कोई रसिक ही कर सकता है, फिर भी हम जैसे पतित जीव भी इतना तो महसूस करते ही हैं कि ऐसा रस कभी नहीं मिला।
****बोलिये रसिक-शिरोमणि भगवान श्री कृपालुजी महाराज की जय****
जो राधा भाव के साक्षात मूर्तिमान स्वरूप हैं,जो स्वयं महाभाव हैं,जिन के रोम-रोम से श्री कृष्ण प्रेम रस सदा टपकता रहता है,जिन के दिव्य वचन सुनते ही माया अविद्या का जाल सदा-सदा के लिये नष्ट हो जाता है,जो स्वयं प्रेम के सगुण साकार रूप हैं,जिन के अंदर-बाहर श्री कृष्ण प्रेम लबालब भरा है,जो इस धरा पे कृष्ण प्रेम दान करने के लिये अवतरित हुए हैं,ऐसे सहेज सनेही सद्गुरुदेव जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु के चरण-कमलों पर बार-बार बलिहार जाने को जी चाहता है।
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु की जय।
जय-जय श्री राधे।

यदि तन , मन , धन.... हरि गुरु को समर्पित नहीं किया गया तो संसार अवश्य ही इन्हें लूट लेगा ।
-----श्री महाराज जी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...