Wednesday, March 2, 2016

Every individual soul is an eternal part of God.
हर व्यक्ति की आत्मा ईश्वर का एक शाश्वत हिस्सा है।
......श्री महाराज जी।
जब तक माया के अधीन हो तब तक क्यों सोचते हो कि मैं प्रशंसा के योग्य हूँ । जब तक तुम शरणागत नहीं हुए तब तक तुम्हे अहंकार किस बात का ? किसी भी जीव का वास्तविक स्वरूप श्री कृष्ण दासत्व ही है । श्री कृष्ण के दास बन जाओ फिर खूब अहंकार करो । हम छूट देते हैं ।लेकिन उस समय तुम अहंकार कर ही नहीं सकते। भगवत्प्राप्ति से पहले रहता है अहंकार। अतः सदा सावधान रहो।
---------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु।
कोई महापुरुष हो , चाहे राक्षस हो। अपने मन में दूसरे के प्रति हमेशा अच्छी भावना होनी चाहिये। जिससे अच्छे विचार अंतःकरण में आवें। वो जो है, वो तो रहेगा ही। वो राक्षस होगा, तो राक्षस रहेगा। महापुरुष होगा तो महापुरुष रहेगा। हम अपने अंदर अगर दुर्भावना लाते हैं तो हमने तो अपना अंतःकरण बिगाड़ लिया। अब भगवान् जो थोड़ा पैर रखे आने के लिए, एबाउट टर्न चल दिये। वो कहते हैं - क्योंकि तुम तो औरों को बुलाते हो , इसलिये मैं नहीं रहता ऐसे घर में।
!! जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज !!

श्रीकृष्ण भक्ति ही एकमात्र मार्ग है और कोई भी साधन अपेक्षित नहीं है, न जानने की जरूरत है, न सोचने की और उसमें कोई यह भी नहीं है कि श्रीकृष्ण भक्ति में या शरणागति में क्या- क्या करना होगा ? कुछ भी नहीं करना, केवल सोचना है। वो तो भाव के भूंखे हैं। वहाँ कुछ करना- वरना नहीं है।
भगवान कोई बनावट नहीं चाहता, कोई तरकीब ? कोई जंत्र, मंत्र, तंत्र, सबेरे चार बजे उठो कि छः बजे, कि पूरब की तरफ मुँह करो, कि पश्चिम की तरफ करो, इस आसन से बैठो, यह कपड़ा पहनो, नहाओ धोओ, कुछ कोई मतलब नहीं। केवल सच्चे मन से रोकर उसे पुकारो। बस वह आपके पास दौड़ा चला आएगा।
🌸 तजि दे छल छंदा, राधे राधे गोविंदा।🌸
🌸 भजि ले मति मन्दा, राधे राधे गोविंदा।।🌸


🌹🌹🌹🌹🌹🌹 राधे राधे 🌹🌹🌹🌹🌹🌹
🌼👉 प्रेम वह तत्व है जो प्रिय– प्रेमाश्रय को असाधारण सुख देता है। ' प्रेम से प्रिय को असाधारण सुख मिलता है।' इसके चार रहस्य हैं – 🌻1– ' प्रियसुखसुखित्वम् ' – प्रेम केवल प्रियतम के सुख
के लिए ही होता है।
🌻2– ' प्रियानुकूलाचरणम् ' – प्रेम में केवल प्रिय के ही
अनुकूल आचरण होता है।
🌻3– ' प्रियसुखामातिरिक्तकामराहित्यम् ' – प्रिय–सुख–
कामना के अतिरिक्त प्रेम में स्व–काम बिल्कुल नहीं
होता है।
🌻4– ' वाचामगोचरत्वम् ' – प्रेम वाणी के द्वारा व्यक्त नहीं
किया जा सकता है, वह मूकास्वादवत् अनिवर्चनीय
होता है।
यही विशुद्ध गोपी प्रेम है।

अगर किसी वस्तु का उपयोग सही जगह नहीं किया तो गलत जगह उपयोग करना पड़ेगा नेचर का नियम है । अगर मन को आपने हरि गुरु में नहीं लगाया तो संसार में लगाना पड़ेगा । नेचर का नियम है । कोई भी चीज हो ये विश्व परिवर्तनीय है । ये बदलने वाला है , नश्वर है इसकी समाप्ति होना है ।
---- जगद्गुरुत्तम् श्री कृपालु जी महराज।
मृत्यु के आगे किसी का वश नहीं है । सीधे या टेढ़े । इसलिये हर समय सावधान रहना चाहिये । यह सावधानी है कि अगला क्षण न मिला तो ? सावधान रहो । तैयार रहो , तैयार रहो । भगवान् को न भूलो , ताकि अन्तिम समय में भगवान् का स्मरण रहे , तो भगवान् के लोक में जायें । हम अगर दिन भर , भगवान् का स्मरण करते हैं और चौबीस घंटे में बस दो मिनट पहले भगवान् को भूल करके माँ , बाप , बेटा , स्त्री , पति का स्मरण करने लगे और मर गये तो -
यं यं वापि स्मरंभाव त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ।।

( गीता 6-8 )
जड़ भरत सरीखे परमहंस मरते समय हिरन का स्मरण करके मरे , तो हिरन बनना पड़ा। परमहंसों का यह हाल है, तो मायाबद्ध का क्या होगा ?
----- जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...