This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Friday, March 11, 2016
Wednesday, March 2, 2016
जब
तक माया के अधीन हो तब तक क्यों सोचते हो कि मैं प्रशंसा के योग्य हूँ ।
जब तक तुम शरणागत नहीं हुए तब तक तुम्हे अहंकार किस बात का ? किसी भी जीव
का वास्तविक स्वरूप श्री कृष्ण दासत्व ही है । श्री कृष्ण के दास बन जाओ
फिर खूब अहंकार करो । हम छूट देते हैं ।लेकिन उस समय तुम अहंकार कर ही नहीं
सकते। भगवत्प्राप्ति से पहले रहता है अहंकार। अतः सदा सावधान रहो।
---------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु।
---------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु।
कोई
महापुरुष हो , चाहे राक्षस हो। अपने मन में दूसरे के प्रति हमेशा अच्छी
भावना होनी चाहिये। जिससे अच्छे विचार अंतःकरण में आवें। वो जो है, वो तो
रहेगा ही। वो राक्षस होगा, तो राक्षस रहेगा। महापुरुष होगा तो महापुरुष
रहेगा। हम अपने अंदर अगर दुर्भावना लाते हैं तो हमने तो अपना अंतःकरण
बिगाड़ लिया। अब भगवान् जो थोड़ा पैर रखे आने के लिए, एबाउट टर्न चल दिये।
वो कहते हैं - क्योंकि तुम तो औरों को बुलाते हो , इसलिये मैं नहीं रहता
ऐसे घर में।
!! जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज !!
!! जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज !!
श्रीकृष्ण भक्ति ही एकमात्र मार्ग है और कोई भी साधन अपेक्षित नहीं है, न
जानने की जरूरत है, न सोचने की और उसमें कोई यह भी नहीं है कि श्रीकृष्ण
भक्ति में या शरणागति में क्या- क्या करना होगा ? कुछ भी नहीं करना, केवल
सोचना है। वो तो भाव के भूंखे हैं। वहाँ कुछ करना- वरना नहीं है।
भगवान कोई बनावट नहीं चाहता, कोई तरकीब ? कोई जंत्र, मंत्र, तंत्र, सबेरे चार बजे उठो कि छः बजे, कि पूरब की तरफ मुँह करो, कि पश्चिम की तरफ करो, इस आसन से बैठो, यह कपड़ा पहनो, नहाओ धोओ, कुछ कोई मतलब नहीं। केवल सच्चे मन से रोकर उसे पुकारो। बस वह आपके पास दौड़ा चला आएगा।
🌸 तजि दे छल छंदा, राधे राधे गोविंदा।🌸
🌸 भजि ले मति मन्दा, राधे राधे गोविंदा।।🌸
🌹🌹🌹🌹🌹🌹 राधे राधे 🌹🌹🌹🌹🌹🌹
भगवान कोई बनावट नहीं चाहता, कोई तरकीब ? कोई जंत्र, मंत्र, तंत्र, सबेरे चार बजे उठो कि छः बजे, कि पूरब की तरफ मुँह करो, कि पश्चिम की तरफ करो, इस आसन से बैठो, यह कपड़ा पहनो, नहाओ धोओ, कुछ कोई मतलब नहीं। केवल सच्चे मन से रोकर उसे पुकारो। बस वह आपके पास दौड़ा चला आएगा।
🌸 तजि दे छल छंदा, राधे राधे गोविंदा।🌸
🌸 भजि ले मति मन्दा, राधे राधे गोविंदा।।🌸
🌹🌹🌹🌹🌹🌹 राधे राधे 🌹🌹🌹🌹🌹🌹
🌼👉 प्रेम वह तत्व है जो प्रिय– प्रेमाश्रय को असाधारण सुख देता है। ' प्रेम से प्रिय को असाधारण सुख मिलता है।' इसके चार रहस्य हैं – 🌻1– ' प्रियसुखसुखित्वम् ' – प्रेम केवल प्रियतम के सुख
के लिए ही होता है। 🌻2– ' प्रियानुकूलाचरणम् ' – प्रेम में केवल प्रिय के ही
अनुकूल आचरण होता है।
🌻3– ' प्रियसुखामातिरिक्तकामराहित्यम् ' – प्रिय–सुख–
कामना के अतिरिक्त प्रेम में स्व–काम बिल्कुल नहीं
होता है।
🌻4– ' वाचामगोचरत्वम् ' – प्रेम वाणी के द्वारा व्यक्त नहीं
किया जा सकता है, वह मूकास्वादवत् अनिवर्चनीय
होता है।
यही विशुद्ध गोपी प्रेम है।
के लिए ही होता है। 🌻2– ' प्रियानुकूलाचरणम् ' – प्रेम में केवल प्रिय के ही
अनुकूल आचरण होता है।
🌻3– ' प्रियसुखामातिरिक्तकामराहित्यम् ' – प्रिय–सुख–
कामना के अतिरिक्त प्रेम में स्व–काम बिल्कुल नहीं
होता है।
🌻4– ' वाचामगोचरत्वम् ' – प्रेम वाणी के द्वारा व्यक्त नहीं
किया जा सकता है, वह मूकास्वादवत् अनिवर्चनीय
होता है।
यही विशुद्ध गोपी प्रेम है।
अगर किसी वस्तु का उपयोग सही जगह नहीं किया तो गलत जगह उपयोग करना
पड़ेगा नेचर का नियम है । अगर मन को आपने हरि गुरु में नहीं लगाया तो संसार
में लगाना पड़ेगा । नेचर का नियम है । कोई भी चीज हो ये विश्व परिवर्तनीय है
। ये बदलने वाला है , नश्वर है इसकी समाप्ति होना है ।
---- जगद्गुरुत्तम् श्री कृपालु जी महराज।
---- जगद्गुरुत्तम् श्री कृपालु जी महराज।
Subscribe to:
Posts (Atom)
मन का अटैचमेंट किसमें करें?
एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...
-
Baar Baar suno, Baar Baar suno, tab tatvagyan paripakva hoga. Ye jo hum Logo ko Brham hota hai ki yeh to maine bahut suna hai, yeh to mein j...
-
गुरु में हरिबुद्धि रखो सदा गुरुधामा | नरबुद्धि आने नहिं पाये आठु यामा || गुरु के प्रति सदैव भगवद् बुद्धि ही रखो | निरन्तर यह सावधानी र...
-
ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...






