Wednesday, May 4, 2016

तत्वज्ञान व्यक्ति के दिमाग से गया कि.... गलती हुई......!!!

-------श्री महाराज जी।

Wednesday, April 27, 2016

सदा ये ध्यान रखो कि हरि-गुरु सदा मुझे एवं मेरे संकल्पों को देख रहे हैं। बस फिर न लापरवाही ही आयेगी न विस्मरण ही होगा।

.......सुश्री श्रीधरी दीदी (प्रचारिका),जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
अब तो कृपा करो श्री राधे!
सर्वप्रथम यह विचार करना है कि जीव का रोग क्या है ? इसका सीधा सा उत्तर है कि जीव को माया की दासता का रोग है माया के अधीन होने के कारण ही भगवान् से विमुख है। भगवान् से विमुख होने के कारण अपने शुद्ध स्वाभाविक स्वरूप को भूल गया है ( मैं सेवक रघुपति पति मोरे ) अपने शुद्ध स्वरूप को भूल जाने के कारण स्वयं को शरीर मानने लगा है। स्वयं को शरीरादि मानने के कारण ही सांसारिक मायिक पदार्थों में ही आनन्द प्राप्ति की निरन्तर साधना कर रहा है। बस यही रोग एवं उनके परिणाम हैं। इस रोग के बड़े - बड़े उपद्रव स्वयं हो गये। यथा काम , क्रोध , लोभ , मोह , ईर्ष्या , द्वेष पाखण्ड आदि । पुनः कर्मबन्धन आदि अनन्त उपद्रव उत्पन्न होते चले गये।

~~~~~~~जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज~~~~~~~~
गुरु के आदेशों को (तत्वज्ञान) सदा साथ रखो, तभी सच्चे साधक कहलाओगे!!!

........श्री महाराजजी।
जग राग छूटे नहीं, कृपा करु राधे।
माया ने सताया अति, कृपा करु राधे ।।

O Radhey! Please destroy my worldly attachments by showering Your Divine grace upon me. Your Maya has troubled me extensively; please bless me with Your grace.
........SHRI MAHARAJJI.

Thursday, April 7, 2016

जिज्ञासु जन !

मानव देह दुर्लभ है किन्तु नश्वर है किसी भी क्षण छिन सकता है । अतएव उधार न करो । तत्काल मन से हरि गुरु का स्मरण प्रारंभ कर दो ।
शरीर से संसारी कार्य करो एवं मन का अनुराग हरि गुरु में हो ।

मन हरि में तन जगत में , कर्म योग ये हि जान।
तन हरि में मन जगत में , यह महान अज्ञान ।।


----- सुश्री श्रीधरी दीदी (प्रचारिका), जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...