Saturday, June 18, 2016

ये संसार सारहीन है इसमें इतना ही सार है कि मानव - शरीर पा कर हरि एवं गुरु से सच्चा प्रेम सम्बन्ध स्थापित हो जाये।
........श्री महाराज जी।
कोई भगवान का अवतार, कोई महापुरुष ऐसा नहीं हुआ, कि जीव के अंदर बैठकर उसका कल्याण कर दें, सब जीव को स्वयं करना है I

-------श्री महाराजजी।

बलिहार युगल सरकार, हमरिहुँ ओर निहार।
तुम मात पिता भरतार, हम सेवक सदा तिहार।
तुम पतितन को रखवार, हम पतितन को सरदार।
तुम दीनबंधु सरकार, हम अहंकार अवतार।।

----- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

One should not forget God in times of happiness and should realise His grace even in times of misery.

सुख का अनुभव करते समय भी भगवान् को मत भूलो तथा दुःखकाल में भी उनकी कृपा का अनुभव करो।

........सुश्री श्रीधरी दीदी (जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज की प्रचारिका)।
Do not procrastinate in the matter of spiritual practise as the human body is transient.

मानव देह क्षणभंगुर है अतः उधार न करो।


----SHRI MAHARAJ JI.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...