Friday, July 8, 2016

उस ईश्वर को युगों तक परिश्रम करके भी कोई नहीं जान सकता है किंतु उस ईश्वर की जिस पर कृपा हो जाती है वह उसे पूर्णतया जान लेता है एवं कृतार्थ हो जाता है। सर्वात्म-समर्पण से मुक्ति एवम् भगवत्कृपा का लाभ हो सकता है। हमें ईश्वर के शरणागत हो जाना है ऐसी शरणागत के आधार पर ही ईश्वर कृपा निर्भर है। जो-जो जीव आत्माएं उसके शरणागत हो गई, वह-वह अपने परम चरम लक्ष्य परमानंद को प्राप्त कर चुकी हैं एवम् जो शरणागत नहीं हुई है उन्ही के ऊपर ईश्वर की कृपा नहीं हुई है एवं वही अपने लक्ष्य से वंचित होकर 84 लाख योनियो में काल, कर्म, स्वभाव, गुणाधीन होकर चक्कर लगा रही हैं।
---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

बताऊँ, तो कहँ सखि ! का बात |
सुनहु सखी ! ललिता, वाकी कछु, बात कही नहिं जात |
कहत मधुर बोलनि मो ते अस, ‘तुम ही सों मम नात’ |
पै विहरत चंद्रावलि घर वह, नेकहुँ नाहिं लजात |
कह्यो कालि अइहौं अध रातिहिं, करिहौं तव मनभात |
नहिं आयो ‘कृपालु’ परखत रहि, तलफत बीती रात ||

भावार्थ – मानिनी वृषभानुनन्दिनी ललिता सखी से कहती हैं कि अरी सखी ! मैं तुझसे क्या बात बताऊँ | उस छलिया की कुछ बात कहने योग्य ही नहीं है | वह बड़े मधुर बोल से मुझसे कहता है कि मेरा प्रेम एकमात्र तुम्हीं से है किन्तु चन्द्रावली के घर में नित्य विहार करने जाया करता है | उसको थोड़ी भी लज्जा नहीं है | कल उसने मुझसे कहा कि मैं अर्द्धरात्रि में आऊँगा एवं तुम्हारा मनभाया करूँगा | ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में किशोरी जी कहती हैं फिर भी वह नहीं आया, मैं परखती रही एवं पूरी रात तड़पती रही |
( प्रेम रस मदिरा मान – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

तन क्षणभंगुर गोविन्दराधे।
छोड़ दे गुमान मन हरि में लगा दे।।
----- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...