Tuesday, September 13, 2016

जीव का चरम लक्ष्य......!!!
मानव देह पाकर यदि इश्वर को नहीं जाना तो पुनः चौरासी लाख योनियों में चक्कर लगाना होगा | उससे बड़ी कोई भूल न होगी |
Utlimate Goal of Human Beings.....!!!
Having acquired a human body if we do not realize God, we will have to suffer in the endless cycle of birth and death. This will be our greatest mistake.

.......JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHAPRABHU.
अगर है चाह, हो घनश्याम की मुझपर नज़र पहले,
तो उनके आशिकों की ख़ाक-ए-पा में कर गुज़र पहले।
तरीका है अजब इस इश्क की मंज़िल में चलने का,
कदम पीछे गुज़रता है, गुज़रता है सर पहले।
उसी का घर बना पहले, दिल-ए-मोहन की बस्ती में,
कि जिसका दीन-ओ-दुनिया दोनों से उजड़ा है घर पहले।
मज़ा तब है कि कुर्बानी में हर एक ज़िद से बढ़ता हो,
ये तन पहले, ये जाँ पहले, ये दिल पहले, ज़िगर पहले।
ना घबरा गर ये तेरी आँख के ये अश्रु लुटते हैं,
यकीं रख ये कि उल्फ़त में नफ़ा पीछे, ज़रर पहले।।

जय-जय श्री राधे।
जब तक भगवान् की भक्ति न की जायगी तब तक अन्त:करण शुध्द ही न हाेगा। बिना अन्त:करण शुध्द हुये हम सत्य आदि दैवीगुणाें का प्रदर्शन मात्र कर सकते है किन्तु वास्तव में दैवीगुण युक्त नही हाे सकते। केवल मन से साेचने मात्र से हमारा मन शुध्द न हाेगा। हां- यह हाे सकता है कि बार-बार साेचने से, परलाेक के भय से कुछ मात्रा में बहिरंग रुप से इन गुणाें का दिखावा कर लें।
------- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

सिद्धान्त ज्ञान में theory की नॉलिज (knowledge) में आलस्य न करो। अगर पूरा ज्ञान तुम्हें थ्योरी (theory) का नहीं होगा तो तुम साधना में गिर जाओगे। पूरी नॉलिज (knowledge) चाहिये -----
भगवान् कौन है ?
जीव क्या है ?
माया क्या है ?
संसार क्या है ?
मन क्या है ?
बुद्धि क्या है ?
हर चीज़ आपकी नॉलिज (knowledge) में रहनी चाहिये। तब आपका पतन नहीं होगा। आप चलते जायेंगे सीधे।

..........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

जगद्गुरु वंदना:
हे मंगलमूर्ति ! कृपा सिन्धु गुरुवर ! आपके चरणों का ध्यान, आपके चरित्र का गुणगान जीव को माया मोह जाल से छुड़ाकर शाश्वत सुख प्रदान करता है । आपकी दिव्य वाणी का अनुसरण त्रिगुण, त्रिताप दूर भगा देता है।
जय श्री राधे।

Tuesday, August 30, 2016

हरि गुरु के प्रति अनन्य भक्ति हो और निष्काम हो। उनकी इच्छा में इच्छा रखना ,उनको सुख देना, तन मन धन से सेवा करना,अपना सर्वस्व मानना,निरंतर मानना,यही प्रेम है,शरणागति है।जिसने ये शर्तें पूरी कर दीं वो कृतार्थ हो गया।जिसने नहीं पूरी कीं वो चौरासी लाख योनियों में जैसे कोल्हू का बैल होता है ऐसे घूम रहा है बिचार।
..........जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाप्रभु।
गुरु के आदेशों को सदा साथ रखो,तभी सच्चे साधक कहलाओगे।

.........श्री महाराजजी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...