Saturday, November 19, 2016

वेदों शास्त्रों, पुराणों, गीता,भागवत ,रामायण तथा अन्यानय धर्मग्रन्थों के शाश्वत अलौकिक ज्ञान के संवाहक तुमको कोटि-कोटि प्रणाम। जन-जन तक यह ज्ञान पहुँचाकर दैहिक ,दैविक,भौतिक तापों से तप्त कलियुगी जीवों के लिए तुमने महान उपकार किया है जो सरलतम,सरस,सार्वत्रिक ,सार्वभौमिक,भक्तियोग प्राधान्य मार्ग तुमने प्रतिपादित किया है,वह विश्व शांति का सर्व-सुगम साधन है,असीम शाश्वत आनंद का मार्ग है। सभी धर्मानुयायीयों को मान्य है।
हे जगद्गुरूत्तम! तुमको कोटि-कोटि प्रणाम। कोटि-कोटि प्रणाम।

तुम्हारे असंख्य प्रवचन , तुम्हारे द्वारा श्री श्यामा श्याम का गुणगान, तुम्हारे द्वारा रचित ग्रंथ,तुम्हारे द्वारा निर्मितस्मारक, 'भक्ति मंदिर','प्रेम मंदिर', तुम्हारे ही अनेक रूप हैं,इस सत्य का साक्षात्कार करा दो। हमारी इस पुकार को सुनकर अनसुना न करने वाले 'पतित पुकार सुनत ही धावत' का पालन करने वाले शीघ्रातिशीघ्र आकर थाम लो। भवसिंधु में डूबने से बचा लो। मगरमच्छ,घड़ियाल की तरह काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद मात्सर्य हमें निगलने के लिए हमारी और बढ़े आ रहे हैं। कहीं तुम्हारा सारा परिश्रम व्यर्थ न चला जाये अत: आकार हमे बचा लो।
भक्तों के आंसुओं से शीघ्र प्रसन्न होने वाले भक्तवत्सल सद्गुरु देव तुमको कोटि-कोटि प्रणाम।

हे हमारे जीवन धन! हमारे प्राण! हमारे पथ प्रदर्शक ! हमारे इस विश्वास को दृढ़ कर दो कि तुम सदा सर्वत्र हमारे साथ हो,हमारे साथ ही चल रहे हो,खा रहे हो,बोल रहे हो,हँस रहे हो,खेल रहे हो,हर क्रिया में तुम्हारी ही उपस्थिती का अनुभव हो। तुम्हारा नाम लेकर तुम्हें पुकारें,और तुम सामने आ जाओ। नाम में नामी विध्यमान है इस सिद्धान्त को हमारे मस्तिक्ष में बारंबार भरने वाले! अब इसे क्रियात्मक रूप में हमें अनुभव करवा दो।
हे दयानिधान! नाम में प्रकट होकर कृपा करने वाले कृपालु!
तुमको कोटि-कोटि प्रणाम।

हे जगद्गुरूत्तम! भगवती नन्दन!
तुम्हारी महिमा का गुणगान सहस्त्रों मुखों से भी असंभव है। तुम्हारी वंदना में क्या लिखें कोई भी लौकिक शब्द तुम्हारी स्तुति के योग्य नहीं है।
बस तुम्हारा 'भक्तियोग तत्त्वदर्शन ' युगों-युगों तक जीवों का मार्गदर्शन करता रहेगा।
तुम्हारे श्री चरणों में यही प्रार्थना है कि जो ज्ञान तुमने प्रदान किया उसको हम संजोये रहे और तुम्हारे द्वारा बताये गये आध्यात्मिक ख़जाने की रक्षा करते हुएतुम्हारे बताए हुए मार्ग पर चल सकें।
धर्म,संस्कृति ,ज्ञान,भक्ति के जीवंत स्वरूप हे जगद्गुरूत्तम ! तुमको कोटि-कोटि प्रणाम। कोटि-कोटि प्रणाम।

कहूँ का, वा दिन की सखि ! बात |
जा दिन देखी नँदनंदन छवि, मंद मंद मुसकात |
जिन अँखियन देखी सखि ! सो छवि, सोऊ कहि न सकात |
अंग – अंग प्रति रूपमाधुरी, लखि अनंग सकुचात |
देखतहूँ नहिं देखति सखि ! इन, अँखियन जल भरि जात |
बिनु देखेहूँ सखि ! ‘कृपालु’ मोहिं, इक पल कलप लखात ||

भावार्थ - एक सखी अपनी अंतरंग सखी से अपने प्रथम मधुर मिलन की बात बताती हुई कहती है, अरी सखी ! उस दिन की क्या बताऊँ जिस दिन मैंने श्यामसुन्दर की मन्द मन्द मुस्कुराती हुई मनोहर छवि को देखा | मैं तो क्या, जिन आँखों ने उस रूप को देखा है वे भी नहीं बता सकतीं | उनके प्रत्येक अंग का सौन्दर्य कामदेव को लज्जित कर रहा था और फिर मैंने तो सखी, देखते हुए भी नहीं देखा क्योंकि देखते समय इन आँखों में आनन्दाश्रु की धारा बहने लगी थी | ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में बिना देखे भी उनके वियोग में विरहाश्रु बहाती हुई, एक – एक क्षण कल्प के समान बिता रही हूँ |
( प्रेम रस मदिरा मिलन – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

Thursday, October 6, 2016

श्रीकृष्ण सूर्य के समान हैं, और माया अन्धकारमय है। जहां श्रीकृष्ण हैं वहां फिर माया का कुछ भी अधिकार नहीं है। अतः श्रीकृष्ण भक्ति के बिना न तो बुद्धि ही विशुद्ध हो सकती है और न यह जीव माया के चंगुल से छुटकारा पा सकता है।
.......जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

मोर मुकुट वारो, मेरो प्रानन प्यारो।
भाल तिलक वारो, मेरो प्रानन प्यारो।
मुदु मुसकनि वारो, मेरो प्रानन प्यारो।
दृग अति मतवारो ,मेरो प्रानन प्यारो।

...जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

जिस पर गुरु की कृपा हो जाये उस पर भगवान अपने आप दौड़े दौड़े कृपा करते हैं। उनकी कृपा माँगना नहीं पड़ता। वो देखते रहते हैं मेरे भक्त ने कृपा की है। अच्छा,अच्छा,अच्छा हो गया । बस! बस! बस! तुम मेरे पास मत आओ मैं कृपा कर दूँगा।

...... जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज के श्रीमुख से:
मेरे प्रिय साधक,
तत्वज्ञान तो इतना ही है कि सेवक धर्म में केवल सेव्य की इच्छानुसार सेवा करना है। किन्तु अभ्यास एवं वैराग्य से ही सेवा का सही रूप बनेगा। अभ्यास यह है कि क्षण क्षण सावधान रहो। वैराग्य यह कि शरीर के सुखों की इच्छा न हो। स्टेशन मास्टर या कारखाने का कर्मचारी रात भर नही सोता। बीमार शिशु की माँ रात भर नहीं सोती। यह महत्व मानने पर निर्भर करता है। लापरवाही ही अनंत जन्म नष्ट कर चुकी है। अतः तत्वज्ञानी को परवाह करनी चाहिए। यह सौभाग्य सदा न मिलेगा। जब तक मिला है परवाह करके लाभ ले लें।
दान का महत्व.....!!!!!
कोई व्यक्ति बैंक में पैसा जमा करता है तो ये नहीं सोचता कि पैसा जा रहा है । बल्कि ये सोचता है,
२ लाख हो गया बैंक में, 4 लाख हो गया अब तो! जेब में नहीं है, लेकिन बैंक में जमा हो रहा है ।
ऐसे ही पारमार्थिक दान करते समय ये सोचना चाहिए कि ये कई गुना होके मिलेगा अगले जन्म में ।
इसलिए दान करते समय ये मत सोचा कीजिये कि ये पैसा जा रहा है जेब से ।

सोचते हैं 99.99% लोग सोचते हैं ।
----- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
हर क्षण यही सोचो कि अगला क्षण मिले न मिले। अतएव भगवद विषय में उधार न करो। संसार में कोई-कोई भाग्यशाली भगवान् की ओर चलते हैं। उनमें भी किसी- किसी भाग्यशाली को कोई वास्तविक संत मिलता है। उनमें भी कोई-कोई भाग्यशाली तत्त्वज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। फिर भी एक दोष है जो आगे नहीं बढ़ने देता। उसका नाम है उधार। संसार के काम में तो हम उधार नहीं करते। कहीं राग करना है,कहीं द्वेष करना है,किसी को गाली देना है,किसी का नुकसान करना है,ये सब तो हम बहुत जल्दी कर लेते हैं। लेकिन भगवान संबंधी साधना में उधार कर देते हैं। वेद कहता है- ' अरे कल-कल मत करो,कौन जानता है कि कल न आवे।' इसलिये उधार नहीं करना है ,तुरंत करो।
------ जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...