This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Tuesday, November 29, 2016
Friday, November 25, 2016
मानव
देह तो कभी-कभी मिलता है। लाखों वर्षों के बाद, बाकी योनियाँ मिला करती
हैं। कुत्ते बने, गधे बने, बिल्ली बने, मच्छर बने, दुःख भोगे मर गये, फिर
दुःख भोगे फिर मर गये। लेकिन कर्म करने का अधिकार और योनियों में नहीं है,
स्वर्ग में भी नहीं है। - वहाँ भी भोग है, जैसे कुत्ता-बिल्ली ये भोग योनि
है। ऐसे ही स्वर्ग के देवता भी हैं। वहाँ भी कर्म नहीं हो सकता, भक्ति नहीं
हो सकती। केवल मानव देह में मनुष्य शरीर, जिसको हम विषय सेवन में बिता
देते हैं अथवा खा - पीकर किसी प्रकार। बेटे से कहते हैं-
बेटा मेरी तो बीत गई अब तुम अपनी फ़िक्र करो। पिता जी आपकी क्या बीत गई,
देखो अब सत्तर के हो गये, अस्सी के हो गये, नब्बे के हो गये। पिता जी ! तो
इसके बाद फिर क्या होगा ? भगवान् को प्यारे हो जायेंगे। भगवान् के प्यारे
ऐसे हो जाओगे- साधना तो किया नहीं पूरे जीवन भर बेटे की साधना की, बाप की,
माँ की, बीबी की, पति की, इनकी भक्ति की और मरने के बाद क्या आशा कर रहे हो
गोलोक, बैकुण्ठ मिलेगा। जिसमें प्यार होता है मरने के बाद उसी की प्राप्ति
होती है। यदि तुम हरि गुरु से प्यार करते हो तो उनका लोक मिलेगा और यदि
तुम बाप, बेटे, माँ, पति, बीबी, इनसे प्यार करते हो तो ये कुत्ता , बिल्ली ,
गधा बनेंगे तो तुमको भी वही योनि मिलेगी। बड़ी सीधी सी बात है।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
Saturday, November 19, 2016
यहाँ
पर एक प्रश्न यह भी उत्पन्न होता है कि यदि भगवान् सर्वव्यापक है तो फिर
उसका हमें अनुभव क्यों नहीं होता। रसगुल्ला खाते हैं, चीनी खाते हैं तो
हमें उसकी मिठास का अनुभव होता है फिर प्रत्येक परमाणु में व्याप्त आनन्दमय
भगवान् के आनन्द का हमें अनुभव क्यों नहीं होता ? दूध पीने में दूध का
अनुभव होता है, विष खाने में विष का अनुभव होता है, उसी प्रकार भगवान् का
भी अनुभव हमें होना चाहिये। आप लोगों का दावा है कि अनुभव में आने वाली
वस्तु ही आप मान सकते हैं। अनुभव प्रमाण ही आपको मान्य है।
किन्तु अनुभव प्रमाण सबसे निर्बल प्रमाण है। पीलिया रोग के रोगी को
सर्वत्र पीला ही पीला दीखता है किन्तु उसका अनुभव भ्रामक है। साँप के काटे
हुए व्यक्ति को नीम मीठा लगता है। इसी प्रकार भव-रोग से ग्रस्त जीव को किसी
भी वस्तु का अनुभव भ्रामक ही होता है। एक चींटी चीनी के पहाड़ पर चक्कर
काटकर लौटी और उससे पूछा गया तो उसने अनुभव यह बताया कि यह पर्वत नमकीन था।
बड़ा आश्चर्य हुआ किन्तु जब जाँच हुई तो पता चला कि चींटी के मुख में नमक
की डली रखी हुई थी। अस्तु, सर्वत्र शक्कर के ढेर पर भ्रमण करते हुए भी उसे
अपने मुख में रखे हुए नमक का ही स्वाद अनुभव में आया। उसी प्रकार जिस
इन्द्रिय, मन, बुद्धि से हम संसार को ग्रहण करते हैं वे सब प्राकृत, मायिक,
त्रिगुणात्मक एवं सदोष हैं और भगवान् प्रकृत्यतीत, दिव्य, गुणातीत एवं
दोषरहित है, फिर हम इनसे उसके ठीक स्वरूप को किस प्रकार से पहचान सकते हैं ?
जब तक ये दिव्य न हो जायें, इनका अनुभव सही कदापि नहीं हो सकता।
प्रेम रस सिद्धान्त,
रचयिता- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
संस्करण 2010, अध्याय 1: जीव का चरम लक्ष्य, पृ. 26
रचयिता- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
संस्करण 2010, अध्याय 1: जीव का चरम लक्ष्य, पृ. 26
<ईश्वर सर्वव्यापक है>
कुछ लोग कहते हैं कि घड़ी अपने आप चलती है ऐसे ही सृष्टि भी अपने आप हो जायगी, किन्तु उन्हें सोचना चाहिये कि घड़ी पूर्व में नहीं चलती थी जब किसी ने उसे बनाया तब चलने लगी एवं पश्चात् भी नहीं चलेगी अर्थात् नष्ट हो जायगी, तब फिर बनानी पड़ेगी। इसके अतिरिक्त यह भी विचारणीय है कि घड़ी बनाने वाले ने घड़ी तो बनायी है किन्तु उस घड़ी के लौह परमाणुओं की क्रिया को घड़ीसाज नहीं जानता अर्थात् उस पर कन्ट्रोल नहीं कर सकता। उसे कन्ट्रोल करने वाला ईश्वर है। अतएव ईश्वर को सर्वव्यापक होना पड़ता है अन्यथा वे परमाणु ठीक रूप से काम नहीं कर सकते।
कुछ लोग कहते हैं कि घड़ी अपने आप चलती है ऐसे ही सृष्टि भी अपने आप हो जायगी, किन्तु उन्हें सोचना चाहिये कि घड़ी पूर्व में नहीं चलती थी जब किसी ने उसे बनाया तब चलने लगी एवं पश्चात् भी नहीं चलेगी अर्थात् नष्ट हो जायगी, तब फिर बनानी पड़ेगी। इसके अतिरिक्त यह भी विचारणीय है कि घड़ी बनाने वाले ने घड़ी तो बनायी है किन्तु उस घड़ी के लौह परमाणुओं की क्रिया को घड़ीसाज नहीं जानता अर्थात् उस पर कन्ट्रोल नहीं कर सकता। उसे कन्ट्रोल करने वाला ईश्वर है। अतएव ईश्वर को सर्वव्यापक होना पड़ता है अन्यथा वे परमाणु ठीक रूप से काम नहीं कर सकते।
प्रेम रस सिद्धान्त,
रचयिता- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
संस्करण 2010, अध्याय 1: जीव का चरम लक्ष्य, पृ. 17
भावार्थः- भगवान् संसार की रचना करते हैं, उसका पालन करते हैं और अंत में उसका प्रलय कर देते हैं अर्थात् यह सम्पूर्ण संसार ईश्वर से प्रकट हुआ है, ईश्वर द्वारा इसका पालन किया जाता है और अंत में फिर यह सम्पूर्ण संसार ईश्वर में समा जाता है। संसार का नियामक ईश्वर है। इस संसार के प्रत्येक परमाणु में ईश्वर व्याप्त है, अतः ईश्वर सर्वव्यापक है। सृष्टि का पालन एवं उसकी रक्षा करने के लिये भगवान् संसार के प्रत्येक परमाणु में व्याप्त होते हैं।
------ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
रचयिता- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
संस्करण 2010, अध्याय 1: जीव का चरम लक्ष्य, पृ. 17
भावार्थः- भगवान् संसार की रचना करते हैं, उसका पालन करते हैं और अंत में उसका प्रलय कर देते हैं अर्थात् यह सम्पूर्ण संसार ईश्वर से प्रकट हुआ है, ईश्वर द्वारा इसका पालन किया जाता है और अंत में फिर यह सम्पूर्ण संसार ईश्वर में समा जाता है। संसार का नियामक ईश्वर है। इस संसार के प्रत्येक परमाणु में ईश्वर व्याप्त है, अतः ईश्वर सर्वव्यापक है। सृष्टि का पालन एवं उसकी रक्षा करने के लिये भगवान् संसार के प्रत्येक परमाणु में व्याप्त होते हैं।
------ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
Jagadguru
Shri Kripalu Ji Maharaj entire life was dedicated to inspiring souls on
the path of devotion to God. Through enlightening discourses and
chanting of the holy name, Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj (lovingly
called Shri Maharaj Ji by His devotees) made unceasing efforts to reveal
the true philosophy from the Vedic scriptures to mankind in the
simplest form possible so that they may attain their true goal of God
Realisation. Mankind was privileged to have his physical association on
this planet earth from 1922 to 2013.
His natural scholarliness inspired trust in even the greatest intellectuals, while his tremendous love, causeless grace and endless compassion melted the hearts and inspired devotional love in all who came near him. His satsang was divinely exhilarating and unbelievably joyous.
His natural scholarliness inspired trust in even the greatest intellectuals, while his tremendous love, causeless grace and endless compassion melted the hearts and inspired devotional love in all who came near him. His satsang was divinely exhilarating and unbelievably joyous.
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