Friday, December 2, 2016

हमारे देश में माइक से मन्त्र बोल देते हैं,जितने बैठे हैं सब चेले हो गये।और सबने मान लिया, हाँ, गुरूजी!हम चेले हो गये हैं आपके।
इतना अँधा है जगत,वो न कुछ पढ़े, न समझे,न शास्त्र-वेद को समझाने वाले हमारी दुनिया में हैं,क्योंकि समझाने वाले जो समझते भी हैं,वो अगर सही-सही बात समझा दें,तो उनका बिजनेस खराब जायेगा।

-----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।


एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां धर्मः परः स्मृतः।
भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः॥

प्रत्येक जीव का धर्म ये है कि वो भगवान् के नाम संकीर्तन आदि साधनों के द्वारा भक्ति करे।यानी भगवान् को धारण करे,माया को धारण न करे, जो किया है निकाले।
------ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
तत्कर्म हरितोषं यत् सा विद्या तन्मतिर्यया॥
(भागवत, ४-२९-४९)

कर्म क्या है? जो भगवान् के निमित्त हो। ज्ञान क्या है? जिससे भगवान् में मन का अटैचमेंट हो।हमारी बुद्धि में ये सही ज्ञान आ जाये कि शरीर के लिये संसार है,
आत्मा के लिये भगवान् है।

----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
वो महाचेतन है, भगवान्।उसके बल से माया इतनी बलवती हो गई कि बड़े-बड़े शक्तिधारी जीव,ब्रह्मादिक कोई हों, विश्व में, सब माया के अंडर में हैं।
जब तक भगवत् भक्ति करके शरणागत होकर के भगवत्कृपा न प्राप्त करेगा, कोई नहीं बचेगा।

शिव विरंचि कहँ मोहई, को है बपुरा आन ।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
कामनाओं को छोड़ना का मतलब यही है कि अभी तक जहाँ अटैचमेंट था,
ये सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण के व्यक्तियों या वस्तुओं में,उससे अलग हो जाओ।
दुश्मनी नहीं करो, अलग हो जाओ।
बाजार जाते हैं आप लोग? हाँ।गये, कपड़े की दुकान देखा।हाँ। आगे गये, मिठाई की दुकान है।आप चले ही जा रहे हैं, रुकते नहीं कहीं?अरे, हमको जूता लेना है जी! उसके आगे गये, जूते की दुकान आ गई, रुक गये।
हमको अपने अंतःकरण को शुद्ध करना है,अच्छी-अच्छी चीज हम लेंगे।
ये मायिक वस्तु नहीं लेंगे, बस,सीधी-सीधी बात है,हम तो स्वार्थी हैं जी!
हम चावल खा रहे हैं, दाल खा रहे हैं, कंकड़ आ गया।
ये (निकाल फेंका) हम कंकड़ नहीं खाते जी!हम संसार में सब जगह होशियार रहते हैं,बुद्धिमान रहते हैं।
दिन भर टाई ठीक करते रहते हैं हम।स्त्रियाँ अपना आँचल दिनभर ठीक करती रहती हैं। ऐसे ही हमको हमेशा सावधान रहना है,ये साधना का मतलब है।

----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
तुमको बर्तन साफ़ करना पड़ेगा। बर्तन साफ़? क्या मतलब?
अन्तःकरण शुद्धि, पहला काम।अन्तःकरण की शुद्धि अर्थात् ये जो डिसीज़न अनन्त जन्मों से हम करते आये हैं कि संसार में ही आनन्द है, ‘ही’। हमको नहीं मिला ये बात अलग है। है। एक लाख में नहीं मिला, एक करोड़ में है,एक करोड़ में नहीं मिला, एक अरब में है। एक कांस्टेबल बनकर के नहीं मिला,सब इंस्पेक्टर को होता होगा, कोतवाल है वो...।अरे! नहीं, उसके भी ऊपर है वो एस॰पी॰ को होगा,आई॰जी॰ को होगाअरे! क्या कल्पना कर रहा है पागल,संसार मात्र में कहीं आनन्द नहीं है—
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।

सब जगह एक हाल है,बल्कि जितना बड़ा आदमी संसार में आप लोग बोलते हैं न,
उतना ही वो दुःखी है।

----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
मैं, मैं, मैं , मैं काहे करे मूढ़ आठु यामा ।
आज जानि काल वृक भेजे यम धामा ।।

भावार्थ- अरे मूर्ख ! बकरे के समान रात दिन मिथ्या अभिमान-वश ' मैं मैं ' क्यों करता है। काल - रूपी भेड़िया तुझे यमलोक भेजने की तैयारी में लगा है ।
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज ।
श्यामा - श्याम गीत (३)
राधा - गोविन्द समिति।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...