Friday, December 2, 2016

ऊधो !, कहियो श्याम सुजान |
पाण्डु रोग जनु भयो तुमहिं बिनु, जड़ – जंगम पियरान |
बछरन पियत न दूध सुरभि – थन, तृण न चरति गैयान |
लता गुल्म औषधि सब सूखे, यमुना जलहुँ सुखान |
गोपिन, गोपन की का कहिये, जिनके तुम हो प्रान |
वे ‘कृपालु’ भल भूलि जाहिँ मोहिँ, हौं न भूलि सक कान्ह ||

भावार्थ – ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेश भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव ! उन श्यामसुन्दर से कह देना कि तुम्हारे वियोग में ब्रज के समस्त जड़ चेतन जीवों को पाण्डुरोग सा हो गया है, सब के सब पीले पड़ गये हैं | बछड़े गायों का दूध नहीं पीते, गायें घास नहीं चरतीं, लता गुल्म औषधि सब सूख गयीं और यमुना जल भी सूख गया फिर जिन गोपियों एवं ग्वालों के तुम प्राण हो, उनकी दशा तो बिना कहे ही अच्छा है | ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में वे हम लोगों को भले ही भूल जायँ किन्तु हम लोग उन्हें स्वप्न में भी नहीं भूल सकते |
( प्रेम रस मदिरा विरह - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
हम कह देते हैं— महाराज जी!
वो मन नहीं लगता।महाराज जी! वो, हम साधना करते हैं,तो मन संसार में जाता है।अरे! अनंत जन्म संसार में ले गये हो।ले गये हो, तो वो जाता है,
क्या करे बेचारा? अरे, भई! मन का काम जाने का है,तुम भगवान् की ओर ले जाओ, उधर जायेगा।जब चप्पल-जूता खाने पर भी वो बार-बार जाने को तैयार है, तुम्हारी आज्ञा से,तो, जो वो आनंद सिन्धु है,उसके पास जाने को क्यों मना करेगा?
उसको मना करने का अधिकार ही नहीं है।
वो तो, जो बुद्धि कहेगी, मन वो करेगा।और बुद्धि क्या कहेगी,ये डिसीजन महापुरुषों की शरण होकर के उनसे लो।शास्त्र-वेद और गुरु यही डॉक्टर हैं,
इनके द्वारा तत्त्वज्ञान प्राप्त करके उसी प्रकार मन को गवर्न करो और एक सेकंड में गवर्न नहीं कर सकोगे हमेशा के लिये।

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
हमारे देश में माइक से मन्त्र बोल देते हैं,जितने बैठे हैं सब चेले हो गये।और सबने मान लिया, हाँ, गुरूजी!हम चेले हो गये हैं आपके।
इतना अँधा है जगत,वो न कुछ पढ़े, न समझे,न शास्त्र-वेद को समझाने वाले हमारी दुनिया में हैं,क्योंकि समझाने वाले जो समझते भी हैं,वो अगर सही-सही बात समझा दें,तो उनका बिजनेस खराब जायेगा।

-----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।


एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां धर्मः परः स्मृतः।
भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः॥

प्रत्येक जीव का धर्म ये है कि वो भगवान् के नाम संकीर्तन आदि साधनों के द्वारा भक्ति करे।यानी भगवान् को धारण करे,माया को धारण न करे, जो किया है निकाले।
------ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
तत्कर्म हरितोषं यत् सा विद्या तन्मतिर्यया॥
(भागवत, ४-२९-४९)

कर्म क्या है? जो भगवान् के निमित्त हो। ज्ञान क्या है? जिससे भगवान् में मन का अटैचमेंट हो।हमारी बुद्धि में ये सही ज्ञान आ जाये कि शरीर के लिये संसार है,
आत्मा के लिये भगवान् है।

----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
वो महाचेतन है, भगवान्।उसके बल से माया इतनी बलवती हो गई कि बड़े-बड़े शक्तिधारी जीव,ब्रह्मादिक कोई हों, विश्व में, सब माया के अंडर में हैं।
जब तक भगवत् भक्ति करके शरणागत होकर के भगवत्कृपा न प्राप्त करेगा, कोई नहीं बचेगा।

शिव विरंचि कहँ मोहई, को है बपुरा आन ।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
कामनाओं को छोड़ना का मतलब यही है कि अभी तक जहाँ अटैचमेंट था,
ये सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण के व्यक्तियों या वस्तुओं में,उससे अलग हो जाओ।
दुश्मनी नहीं करो, अलग हो जाओ।
बाजार जाते हैं आप लोग? हाँ।गये, कपड़े की दुकान देखा।हाँ। आगे गये, मिठाई की दुकान है।आप चले ही जा रहे हैं, रुकते नहीं कहीं?अरे, हमको जूता लेना है जी! उसके आगे गये, जूते की दुकान आ गई, रुक गये।
हमको अपने अंतःकरण को शुद्ध करना है,अच्छी-अच्छी चीज हम लेंगे।
ये मायिक वस्तु नहीं लेंगे, बस,सीधी-सीधी बात है,हम तो स्वार्थी हैं जी!
हम चावल खा रहे हैं, दाल खा रहे हैं, कंकड़ आ गया।
ये (निकाल फेंका) हम कंकड़ नहीं खाते जी!हम संसार में सब जगह होशियार रहते हैं,बुद्धिमान रहते हैं।
दिन भर टाई ठीक करते रहते हैं हम।स्त्रियाँ अपना आँचल दिनभर ठीक करती रहती हैं। ऐसे ही हमको हमेशा सावधान रहना है,ये साधना का मतलब है।

----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...