Friday, December 2, 2016

Shri Maharaj Ji reminds us:
Rob God and Guru of everything by offering Them body, mind and soul. If you do not offer these to God and Guru, people of the world will certainly rob you of them.
मुक्ति एवं बंधन में मध्यस्थ कारण केवल मन ही है । अतएव हमें मन को ही ईश्वर के शरणागत करना है । मन के शरणागत होने पर सबकी शरणागति स्वयमेव हो जायेगी । हम लोग शारीरिक क्रियादिकों से तो ईश्वर की शरणागति सदा ही करते हैं किन्तु मन की आसक्ति जगत में ही रखते हैं अतएव मन की आसक्ति के अनुसार जगत की ही प्राप्ति होती है । यह अटल सिद्धांत है कि मन की आसक्ति जहाँ होगी , बस उसी तत्व की प्राप्ति होगी । यदि हम शारीरिक कर्म अन्य करें एवं मानसिक आसक्ति अन्यत्र हो तो बस मन की आसक्ति का ही फल मिलेगा । अर्थात यदि शरीरेंद्रियों से हम शुभ या अशुभ कर्म करें एवं मन से कुछ भी न करें , केवल ईश्वर- शरणागत ही रहें तो कर्म का फल न मिलेगा , केवल ईश्वरीय लाभ ही मिलेगा । अतएव मन की शरणागति ही वास्तविक शरणागति है । जैसे पैरों को बांधकर मार्चिंग नहीं हो सकती , मुख बंद करके स्पीच नही हो सकती , वैसे ही मन को अन्यत्र आसक्त करके ईश्वरोपासना भी नही हो सकती । मन की आसक्ति ही ईश्वरीय क्षेत्र में 'उपासना' कहलाती है एवं जगत क्षेत्र में 'आसक्ति' कहलाती है ।
.......जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
ऊधो !, कहियो श्याम सुजान |
पाण्डु रोग जनु भयो तुमहिं बिनु, जड़ – जंगम पियरान |
बछरन पियत न दूध सुरभि – थन, तृण न चरति गैयान |
लता गुल्म औषधि सब सूखे, यमुना जलहुँ सुखान |
गोपिन, गोपन की का कहिये, जिनके तुम हो प्रान |
वे ‘कृपालु’ भल भूलि जाहिँ मोहिँ, हौं न भूलि सक कान्ह ||

भावार्थ – ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेश भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव ! उन श्यामसुन्दर से कह देना कि तुम्हारे वियोग में ब्रज के समस्त जड़ चेतन जीवों को पाण्डुरोग सा हो गया है, सब के सब पीले पड़ गये हैं | बछड़े गायों का दूध नहीं पीते, गायें घास नहीं चरतीं, लता गुल्म औषधि सब सूख गयीं और यमुना जल भी सूख गया फिर जिन गोपियों एवं ग्वालों के तुम प्राण हो, उनकी दशा तो बिना कहे ही अच्छा है | ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में वे हम लोगों को भले ही भूल जायँ किन्तु हम लोग उन्हें स्वप्न में भी नहीं भूल सकते |
( प्रेम रस मदिरा विरह - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
हम कह देते हैं— महाराज जी!
वो मन नहीं लगता।महाराज जी! वो, हम साधना करते हैं,तो मन संसार में जाता है।अरे! अनंत जन्म संसार में ले गये हो।ले गये हो, तो वो जाता है,
क्या करे बेचारा? अरे, भई! मन का काम जाने का है,तुम भगवान् की ओर ले जाओ, उधर जायेगा।जब चप्पल-जूता खाने पर भी वो बार-बार जाने को तैयार है, तुम्हारी आज्ञा से,तो, जो वो आनंद सिन्धु है,उसके पास जाने को क्यों मना करेगा?
उसको मना करने का अधिकार ही नहीं है।
वो तो, जो बुद्धि कहेगी, मन वो करेगा।और बुद्धि क्या कहेगी,ये डिसीजन महापुरुषों की शरण होकर के उनसे लो।शास्त्र-वेद और गुरु यही डॉक्टर हैं,
इनके द्वारा तत्त्वज्ञान प्राप्त करके उसी प्रकार मन को गवर्न करो और एक सेकंड में गवर्न नहीं कर सकोगे हमेशा के लिये।

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
हमारे देश में माइक से मन्त्र बोल देते हैं,जितने बैठे हैं सब चेले हो गये।और सबने मान लिया, हाँ, गुरूजी!हम चेले हो गये हैं आपके।
इतना अँधा है जगत,वो न कुछ पढ़े, न समझे,न शास्त्र-वेद को समझाने वाले हमारी दुनिया में हैं,क्योंकि समझाने वाले जो समझते भी हैं,वो अगर सही-सही बात समझा दें,तो उनका बिजनेस खराब जायेगा।

-----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।


एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां धर्मः परः स्मृतः।
भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः॥

प्रत्येक जीव का धर्म ये है कि वो भगवान् के नाम संकीर्तन आदि साधनों के द्वारा भक्ति करे।यानी भगवान् को धारण करे,माया को धारण न करे, जो किया है निकाले।
------ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
तत्कर्म हरितोषं यत् सा विद्या तन्मतिर्यया॥
(भागवत, ४-२९-४९)

कर्म क्या है? जो भगवान् के निमित्त हो। ज्ञान क्या है? जिससे भगवान् में मन का अटैचमेंट हो।हमारी बुद्धि में ये सही ज्ञान आ जाये कि शरीर के लिये संसार है,
आत्मा के लिये भगवान् है।

----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...