This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Saturday, February 4, 2017
संसार
में हमने जितने काम किये हैं, अभ्यास से आगे बड़े हैं। ये बड़े बड़े नट
कमाल करते हैं जो, जिनको आप दूर से बैठे देखते हैं खुश होते हैं। वाह भाई!
वाह! कमाल कर दिया। वह कैसे कमाल कर दिया उसने? अभ्यास से । बस। वह भी
हमारी तरह था पहले। अभ्यास करके यहाँ पहुँच गया वह। संसार में तो हम
सर्वत्र अभ्यास करके आगे बड़े है। तो फिर भगवान् के एरिया में निराश क्यों
हों। और कोई सूरत भी नहीं। अगर कोई कहे निराश होकर बैठ जाएँगे हम
भगवत्प्राप्ति से बाज आये। तो 84 लाख घूमने से बाज आओगे क्या? वो तो करना पड़ेगा। एक साइड में तो जाना ही पड़ेगा आपको। इसलिये घबड़ाना नही चाहिये अभ्यास लगातार करतें रहें।
रसरी आवत जात ते सिल पर परत निशान।
अभ्यास में बहुत बड़ी शक्ति है।
--- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
अभ्यास में बहुत बड़ी शक्ति है।
--- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
Thursday, January 19, 2017
हे
! करुणा सागर, दीन बंधु, पतितपावन, तुम्हारी कृपा के बिना कोई तुम्हारी
सेवा भी तो नहीं कर सकता । हमारी गति, मति, रति सर्वस्व तुम्ही हो । अकिंचन
के धन, निर्बल के बल, अशरण-शरण, कहाँ से लाएँ तुम्हें प्रसन्न करने के लिए
सतत रुदन और करुण क्रंदन । अनंत जन्मो का विषयानंदी मन संसार के लिए आँसू
बहाना चाहता है श्याम मिलन के लिए नहीं । अकारण-करुण कुछ ऐसी कृपा कर दो की
मन निरन्तर युगल चरणों का स्मरण करते हुए ब्रजरस धन का लोभी बन जाये । रोम
रोम प्रियतम के दर्शन के लिए, स्पर्श के लिए, मधुर
मिलन के लिए, इतना व्याकुल हो जाए की आंसुओं की झड़ी लग जाए ओर हम आँसुओ की
माला पहनकर तुम्हें प्रसन्न कर सकें पश्चात निशिदिन श्यामा श्याम मिलन हित
आँसू बहाते रहें । अपने अकारण करुण विरद की रक्षा करते हुए हे ! कृपालु,
हे ! दयालु हमारा सर्वस्व बरबस लेकर ब्रजरस प्रदान करो । किसी भी प्रकार यह
स्वप्न साकार करो की हम तुम्हारे वास्तविक गौर-श्याम मिलित स्वरूप को हृदय
मे सदा सदा के लिए धारण करके प्रेम रस सागर मे निमग्न हो अश्रु पूरित
नेत्रों से तुम्हारी विरुदावली का अनंत काल तक गान करते रहें ।
-----जगद्गुरुत्तम भक्तियोगरसावतार कृपालु महाप्रभु ।
60 वें जगद्गुरुत्तम दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
14 जनवरी यानि मकर संक्रांति यानि सूर्य का उत्तरायण यानि प्रकाश की वृद्धि और अंधकार का ह्रास।
पर बात अगर 14 जनवरी 1957 की हो तो यही कहना पड़ेगा कि इस दिन एक ऐसे सूर्य का उत्तरायण हुआ जिसका पुन: कभी दक्षिणायण नहीं होता। जी हाँ! यहाँ पर बात उस सूर्य की होने जा रही है जिसने अपनी अलौकिक सर्वदर्शनसमन्वित तत्त्वज्ञान एवं भक्तिरस की सहश्त्रों किरणों से जीवात्मा के अन्तर्मन को प्रकाशित कर उसके भीतर व्याप्त अनादिकालीन अंधकार को हर लिया। आज भी वह प्रकाश निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। वह सूर्य और कोई नहीं अपितु हम सबके प्रिय श्री महाराज जी अर्थात् जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज है। आज से 60 वर्ष पूर्व जब काशी विद्वत परिषद् द्वारा श्री महाराज जी को न सिर्फ जगद्गुरु अपितु 'जगद्गुरुत्तम' की उपाधि से विभूषित किया जा रहा था तथा सभी विद्वतजन उनको सम्मानित कर अपने आपको धन्य अनुभव कर रहे थे तो उस समय वास्तव में ऐसा ही प्रतीत हो रहा था कि इस दिव्य अलौकिक भक्तियोगरसावतार 'कृपालु' सूर्य का 'उत्तरायण' न केवल भारत अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपने दिव्य तत्त्वज्ञान, भक्तिरस एवं कृपाओं से आलोकित करेगा एवं जीवात्मा के पीड़ित मन की व्यथा को हर लेगा।नि:संदेह यही हुआ, वर्तमान में भी हो रहा है और आगे भी यह क्रम जारी रहेगा।
समस्त साधक समुदाय को 'जगद्गुरुत्तम दिवस' की ढेर सारी बधाइयाँ एवं शुभकामनाएँ।
बोलिए जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु की जय!!!
14 जनवरी यानि मकर संक्रांति यानि सूर्य का उत्तरायण यानि प्रकाश की वृद्धि और अंधकार का ह्रास।
पर बात अगर 14 जनवरी 1957 की हो तो यही कहना पड़ेगा कि इस दिन एक ऐसे सूर्य का उत्तरायण हुआ जिसका पुन: कभी दक्षिणायण नहीं होता। जी हाँ! यहाँ पर बात उस सूर्य की होने जा रही है जिसने अपनी अलौकिक सर्वदर्शनसमन्वित तत्त्वज्ञान एवं भक्तिरस की सहश्त्रों किरणों से जीवात्मा के अन्तर्मन को प्रकाशित कर उसके भीतर व्याप्त अनादिकालीन अंधकार को हर लिया। आज भी वह प्रकाश निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। वह सूर्य और कोई नहीं अपितु हम सबके प्रिय श्री महाराज जी अर्थात् जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज है। आज से 60 वर्ष पूर्व जब काशी विद्वत परिषद् द्वारा श्री महाराज जी को न सिर्फ जगद्गुरु अपितु 'जगद्गुरुत्तम' की उपाधि से विभूषित किया जा रहा था तथा सभी विद्वतजन उनको सम्मानित कर अपने आपको धन्य अनुभव कर रहे थे तो उस समय वास्तव में ऐसा ही प्रतीत हो रहा था कि इस दिव्य अलौकिक भक्तियोगरसावतार 'कृपालु' सूर्य का 'उत्तरायण' न केवल भारत अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपने दिव्य तत्त्वज्ञान, भक्तिरस एवं कृपाओं से आलोकित करेगा एवं जीवात्मा के पीड़ित मन की व्यथा को हर लेगा।नि:संदेह यही हुआ, वर्तमान में भी हो रहा है और आगे भी यह क्रम जारी रहेगा।
समस्त साधक समुदाय को 'जगद्गुरुत्तम दिवस' की ढेर सारी बधाइयाँ एवं शुभकामनाएँ।
बोलिए जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु की जय!!!
प्रेम
को परखना तो बड़ी मेहनत का काम है, लेकिन फिर भी असंभव नहीं अगर कोई
स्वार्थ रहित हो जाये तो। जब कि असंभव है वह भी। लेकिन ईश्वरीय प्यार में
तो अकल लगाने की जरूरत ही नहीं है कि उनका हमसे कितना प्यार है। जितनी
मात्रा में हमारा है उतनी मात्रा में उनको हमसे है यह सिद्ध है।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।
"कृपालु अनंत कृपालु कथा अनंता"......!!!
'कृपालु'(अकारण दया,कृपा करने वाले) - यह सुमधुर नामधारी श्री कृपालु गुरुदेव ही हम सबके प्राणप्रिय गुरुदेव हैं जो रसिक शिरोमणि श्री कृष्ण के महाभाव रस में सदा स्नात रहते हैं यानि डूबे हुए रहते हैं उसी रस से। नाना प्रकार के मज़हब,धर्मों आदि के विभिन्न उपासक,साधक जो उन्हे अपना गुरु,रहबर,spiritual guide,मानकर साधना करते हैं,अपने-अपने अनुभवों के आधार पर उन्हे अलग-अलग अवतारों में देखता है। वे श्यामा-श्याम के रस-मानसरोवर में बाल-हंस की भाँति नित्य विहार करते हैं,जो रसिकों की नगरी वृन्दावन के भी न केवल रसिक प्रमुख हैं वरन जो श्यामसुंदर के उत्तुंग उफनते प्रेम-रस-ज्वार में सतत अनवरत डूबे रहते हैं,ऐसे हैं हमारे 'कृपालु सरकार'....... पापीजन जो उनकी शरण में चले जाते हैं उनके लिए वे श्री कृपालु-महाप्रभु(आवागमन रूपी संसार से) दिव्य धाम(नित्य सनातन परमानंदमय स्थान) तक पहुंचाने वाली (सुदृढ़) सीढ़ी हैं। इतना ही नहीं,सच्चे हृदय से बिलख-बिलखकर प्रायश्चित के आँसू बहाते हुए आतरनाद कर जो भी पापात्मा एक बार भी उनके चरणों में 'त्राहि माम,पाहि माम' पुकारते हुए गिर जाता है तो श्री गुरुदेव उसकी कातर पुकार सहन नहीं कर पाते,विह्वल होकर न केवल उसे गले ही लगा लेते हैं,बल्कि उसके हाथ बिक कर अपने आपको ही उसे समर्पित कर देते हैं। जितने सच्चे हम होंगे,उतने ही वो भी बल्कि उससे कई ज्यादा आपका योगक्षेम वहन करेंगे। वे सरल के लिए अत्यंत सरल,चालाक के लिए अत्यंत चालाक हैं।उनसे जीतना असंभव है।वे सिर्फ आँसुओं से,सच्ची पुकार प्रभु को पाने की जिस हृदय में उत्कंठा हो उसीसे रीझते हैं। उनको कोई जबरदस्ती रिझा नहीं सका,पैसे का अहंकार,पोस्ट का अहंकार,अन्य कई बल लिए जो उनके पास चला जाता है,उसकी और तो देखना भी पसंद नहीं करते गुरुदेव।और वो अहंकारी बेचारा उल्टे पैर वहाँ से चल देता है,अहंकार से तो सख्त परहेज है उनको। बड़े-बड़े अहंकारी लोग उनके यहाँ आए,लेकिन जिसने अपनी ज्ञान गठरिया उतार के फेंक दी,वो ही यहाँ टिका है। इनको आजतक विश्व में कोई भी चैलेंज नहीं दे सका ज्ञान में ,सब को अंदर ही अंदर पता है कौन है ये........बस उन बेचारों का अहंकार,मिथ्या ज्ञानभिमान उनको यहाँ आने नहीं देता। और आ भी जाये तो महाराजजी के यहाँ टिक ही नहीं सकता,वो लोग वास्तव में दया के पात्र हैं जो इस समय विश्व की महानतम विभूति से अपने दंभ की वजह से दूर हैं,अभी भी समय है,अहंकार त्याग दीजिये,और कृपालु महाप्रभु को सुनिए,समझिए,और उनकी शरण ग्रहण कर उनके द्वारा निर्दिष्ट साधना करके अपने परम चरम लक्ष्य भगवदप्राप्ति तक पहुचने का प्रयास कीजिये।
'कृपालु'(अकारण दया,कृपा करने वाले) - यह सुमधुर नामधारी श्री कृपालु गुरुदेव ही हम सबके प्राणप्रिय गुरुदेव हैं जो रसिक शिरोमणि श्री कृष्ण के महाभाव रस में सदा स्नात रहते हैं यानि डूबे हुए रहते हैं उसी रस से। नाना प्रकार के मज़हब,धर्मों आदि के विभिन्न उपासक,साधक जो उन्हे अपना गुरु,रहबर,spiritual guide,मानकर साधना करते हैं,अपने-अपने अनुभवों के आधार पर उन्हे अलग-अलग अवतारों में देखता है। वे श्यामा-श्याम के रस-मानसरोवर में बाल-हंस की भाँति नित्य विहार करते हैं,जो रसिकों की नगरी वृन्दावन के भी न केवल रसिक प्रमुख हैं वरन जो श्यामसुंदर के उत्तुंग उफनते प्रेम-रस-ज्वार में सतत अनवरत डूबे रहते हैं,ऐसे हैं हमारे 'कृपालु सरकार'....... पापीजन जो उनकी शरण में चले जाते हैं उनके लिए वे श्री कृपालु-महाप्रभु(आवागमन रूपी संसार से) दिव्य धाम(नित्य सनातन परमानंदमय स्थान) तक पहुंचाने वाली (सुदृढ़) सीढ़ी हैं। इतना ही नहीं,सच्चे हृदय से बिलख-बिलखकर प्रायश्चित के आँसू बहाते हुए आतरनाद कर जो भी पापात्मा एक बार भी उनके चरणों में 'त्राहि माम,पाहि माम' पुकारते हुए गिर जाता है तो श्री गुरुदेव उसकी कातर पुकार सहन नहीं कर पाते,विह्वल होकर न केवल उसे गले ही लगा लेते हैं,बल्कि उसके हाथ बिक कर अपने आपको ही उसे समर्पित कर देते हैं। जितने सच्चे हम होंगे,उतने ही वो भी बल्कि उससे कई ज्यादा आपका योगक्षेम वहन करेंगे। वे सरल के लिए अत्यंत सरल,चालाक के लिए अत्यंत चालाक हैं।उनसे जीतना असंभव है।वे सिर्फ आँसुओं से,सच्ची पुकार प्रभु को पाने की जिस हृदय में उत्कंठा हो उसीसे रीझते हैं। उनको कोई जबरदस्ती रिझा नहीं सका,पैसे का अहंकार,पोस्ट का अहंकार,अन्य कई बल लिए जो उनके पास चला जाता है,उसकी और तो देखना भी पसंद नहीं करते गुरुदेव।और वो अहंकारी बेचारा उल्टे पैर वहाँ से चल देता है,अहंकार से तो सख्त परहेज है उनको। बड़े-बड़े अहंकारी लोग उनके यहाँ आए,लेकिन जिसने अपनी ज्ञान गठरिया उतार के फेंक दी,वो ही यहाँ टिका है। इनको आजतक विश्व में कोई भी चैलेंज नहीं दे सका ज्ञान में ,सब को अंदर ही अंदर पता है कौन है ये........बस उन बेचारों का अहंकार,मिथ्या ज्ञानभिमान उनको यहाँ आने नहीं देता। और आ भी जाये तो महाराजजी के यहाँ टिक ही नहीं सकता,वो लोग वास्तव में दया के पात्र हैं जो इस समय विश्व की महानतम विभूति से अपने दंभ की वजह से दूर हैं,अभी भी समय है,अहंकार त्याग दीजिये,और कृपालु महाप्रभु को सुनिए,समझिए,और उनकी शरण ग्रहण कर उनके द्वारा निर्दिष्ट साधना करके अपने परम चरम लक्ष्य भगवदप्राप्ति तक पहुचने का प्रयास कीजिये।
राधे-राधे।
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गुरु में हरिबुद्धि रखो सदा गुरुधामा | नरबुद्धि आने नहिं पाये आठु यामा || गुरु के प्रति सदैव भगवद् बुद्धि ही रखो | निरन्तर यह सावधानी र...
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ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...






