Saturday, February 4, 2017

हाय मोरा, पिया बिनु जिया घबराये |
बरसों बीत गये गये घर सों, परसों कितक विहाये |
कहँ लौं मन समुझाउँ सखी अब, मनहूँ भये पराये |
सुधा समान बैन सखियन के, विष सम मोहिं जनाये |
छिन आँगन छिन बाहर भाजति, कितहूँ चैन न आये |
कबहूँ तो ‘कृपालु’ पिय हियहूँ, ‘हाय !’ लगेगी जाये ||

भावार्थ – ( जब श्यामसुन्दर गोपियों को छोड़कर मथुरा चले गये तब एक विरहिणी अपनी विरह – व्यथा को अपनी अन्तरंग सखी से बताती है |)
हाय ! सखी ! मेरा मन प्रियतम श्यामसुन्दर के बिना अत्यन्त ही घबरा रहा है | अरी सखी ! उन्होंने कहा था कि परसों ही आ जायेंगे किन्तु बरसों बीत गये उनका अभी तक परसों नहीं समाप्त हुआ | अरी सखी ! अपने मन को किस प्रकार एवं कहाँ तक समझाऊँ और अगर समझाऊँ भी तो वह भी तो उन्हीं के पास चला गया है, फिर हमारी बात मन समझ कैसे सकता है ? मेरी परम अन्तरंग सखियों के अमृततुल्य मीठे वचन भी मुझे विष के समान प्रतीत हो रहे हैं | मैं क्षण – क्षण में कभी घर में आती हूँ कभी ‘प्रियतम आते होंगे’, इस आशा में भागती हुई घर से बाहर जाती हूँ किन्तु कहीं भी चैन नहीं मिलता | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अरी विरहिणी ! तू घबरा मत, कभी तो प्यारे श्यामसुन्दर के हृदय में तेरी यह ‘हाय ! हाय !’ की ध्वनि अवश्य ही प्रभाव डालेगी एवं उन्हें विवश होकर आना पड़ेगा |

( प्रेम रस मदिरा विरह – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
परमार्थ का जो भी काम करो उसमें ये समझो कि ये भगवान और गुरु की कृपा ने करा लिया,वरना मैं करता भला।
----- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।


हृदय में ज्ञान का दीपक जलाने वाले गुरु साक्षात भगवान ही हैं। जो पुरुष उन्हे मनुष्य समझते हैं उनका समस्त शास्त्र-श्रवण हाथी के स्नान के समान व्यर्थ है।
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।


धरो मन! युगल माधुरी ध्यान।
मनमोहन मोहिनि श्यामा अरु,मोहिनि मोहन कान्ह।
यह 'कृपालु' रस रसिकहिं जानत, जो नित कर रह पान।।

------- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

संसार में हमने जितने काम किये हैं, अभ्यास से आगे बड़े हैं। ये बड़े बड़े नट कमाल करते हैं जो, जिनको आप दूर से बैठे देखते हैं खुश होते हैं। वाह भाई! वाह! कमाल कर दिया। वह कैसे कमाल कर दिया उसने? अभ्यास से । बस। वह भी हमारी तरह था पहले। अभ्यास करके यहाँ पहुँच गया वह। संसार में तो हम सर्वत्र अभ्यास करके आगे बड़े है। तो फिर भगवान् के एरिया में निराश क्यों हों। और कोई सूरत भी नहीं। अगर कोई कहे निराश होकर बैठ जाएँगे हम भगवत्प्राप्ति से बाज आये। तो 84 लाख घूमने से बाज आओगे क्या? वो तो करना पड़ेगा। एक साइड में तो जाना ही पड़ेगा आपको। इसलिये घबड़ाना नही चाहिये अभ्यास लगातार करतें रहें।
रसरी आवत जात ते सिल पर परत निशान।
अभ्यास में बहुत बड़ी शक्ति है।
--- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Thursday, January 19, 2017

हे ! करुणा सागर, दीन बंधु, पतितपावन, तुम्हारी कृपा के बिना कोई तुम्हारी सेवा भी तो नहीं कर सकता । हमारी गति, मति, रति सर्वस्व तुम्ही हो । अकिंचन के धन, निर्बल के बल, अशरण-शरण, कहाँ से लाएँ तुम्हें प्रसन्न करने के लिए सतत रुदन और करुण क्रंदन । अनंत जन्मो का विषयानंदी मन संसार के लिए आँसू बहाना चाहता है श्याम मिलन के लिए नहीं । अकारण-करुण कुछ ऐसी कृपा कर दो की मन निरन्तर युगल चरणों का स्मरण करते हुए ब्रजरस धन का लोभी बन जाये । रोम रोम प्रियतम के दर्शन के लिए, स्पर्श के लिए, मधुर मिलन के लिए, इतना व्याकुल हो जाए की आंसुओं की झड़ी लग जाए ओर हम आँसुओ की माला पहनकर तुम्हें प्रसन्न कर सकें पश्चात निशिदिन श्यामा श्याम मिलन हित आँसू बहाते रहें । अपने अकारण करुण विरद की रक्षा करते हुए हे ! कृपालु, हे ! दयालु हमारा सर्वस्व बरबस लेकर ब्रजरस प्रदान करो । किसी भी प्रकार यह स्वप्न साकार करो की हम तुम्हारे वास्तविक गौर-श्याम मिलित स्वरूप को हृदय मे सदा सदा के लिए धारण करके प्रेम रस सागर मे निमग्न हो अश्रु पूरित नेत्रों से तुम्हारी विरुदावली का अनंत काल तक गान करते रहें ।
-----जगद्गुरुत्तम भक्तियोगरसावतार कृपालु महाप्रभु ।
60 वें जगद्गुरुत्तम दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

14 जनवरी यानि मकर संक्रांति यानि सूर्य का उत्तरायण यानि प्रकाश की वृद्धि और अंधकार का ह्रास।
पर बात अगर 14 जनवरी 1957 की हो तो यही कहना पड़ेगा कि इस दिन एक ऐसे सूर्य का उत्तरायण हुआ जिसका पुन: कभी दक्षिणायण नहीं होता। जी हाँ! यहाँ पर बात उस सूर्य की होने जा रही है जिसने अपनी अलौकिक सर्वदर्शनसमन्वित तत्त्वज्ञान एवं भक्तिरस की सहश्त्रों किरणों से जीवात्मा के अन्तर्मन को प्रकाशित कर उसके भीतर व्याप्त अनादिकालीन अंधकार को हर लिया। आज भी वह प्रकाश निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। वह सूर्य और कोई नहीं अपितु हम सबके प्रिय श्री महाराज जी अर्थात् जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज है। आज से 60 वर्ष पूर्व जब काशी विद्वत परिषद् द्वारा श्री महाराज जी को न सिर्फ जगद्गुरु अपितु 'जगद्गुरुत्तम' की उपाधि से विभूषित किया जा रहा था तथा सभी विद्वतजन उनको सम्मानित कर अपने आपको धन्य अनुभव कर रहे थे तो उस समय वास्तव में ऐसा ही प्रतीत हो रहा था कि इस दिव्य अलौकिक भक्तियोगरसावतार 'कृपालु' सूर्य का 'उत्तरायण' न केवल भारत अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपने दिव्य तत्त्वज्ञान, भक्तिरस एवं कृपाओं से आलोकित करेगा एवं जीवात्मा के पीड़ित मन की व्यथा को हर लेगा।नि:संदेह यही हुआ, वर्तमान में भी हो रहा है और आगे भी यह क्रम जारी रहेगा।
समस्त साधक समुदाय को 'जगद्गुरुत्तम दिवस' की ढेर सारी बधाइयाँ एवं शुभकामनाएँ।
बोलिए जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु की जय!!!

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...