This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Saturday, February 4, 2017
संसारी
दोष कितने कम हुए, हमे इस पर हर समय दृष्टि रखनी है । हमारे स्वभाव मेँ
अहमता, ममता कितनी कम हुई ,इस और ध्यान देना है । स्वाभिमान कितना कम
हुआ,अपने अपमान का अनुभव होना कितना कम हुआ,आत्म-प्रशंसा कितनी अचछी लगती
है । संसारी विषयों के अभाव मेँ कितना दुख होता है,उनके मिलने मेँ कितना
सुख मिलता है, यह सब अपनी आध्यात्मिक उन्नति को नापने का सबसे बढ़िया पैमाना
है।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
हाय मोरा, पिया बिनु जिया घबराये |
बरसों बीत गये गये घर सों, परसों कितक विहाये |
कहँ लौं मन समुझाउँ सखी अब, मनहूँ भये पराये |
सुधा समान बैन सखियन के, विष सम मोहिं जनाये |
छिन आँगन छिन बाहर भाजति, कितहूँ चैन न आये |
कबहूँ तो ‘कृपालु’ पिय हियहूँ, ‘हाय !’ लगेगी जाये ||
बरसों बीत गये गये घर सों, परसों कितक विहाये |
कहँ लौं मन समुझाउँ सखी अब, मनहूँ भये पराये |
सुधा समान बैन सखियन के, विष सम मोहिं जनाये |
छिन आँगन छिन बाहर भाजति, कितहूँ चैन न आये |
कबहूँ तो ‘कृपालु’ पिय हियहूँ, ‘हाय !’ लगेगी जाये ||
भावार्थ – ( जब श्यामसुन्दर गोपियों को छोड़कर मथुरा चले गये तब एक
विरहिणी अपनी विरह – व्यथा को अपनी अन्तरंग सखी से बताती है |)
हाय ! सखी ! मेरा मन प्रियतम श्यामसुन्दर के बिना अत्यन्त ही घबरा रहा है | अरी सखी ! उन्होंने कहा था कि परसों ही आ जायेंगे किन्तु बरसों बीत गये उनका अभी तक परसों नहीं समाप्त हुआ | अरी सखी ! अपने मन को किस प्रकार एवं कहाँ तक समझाऊँ और अगर समझाऊँ भी तो वह भी तो उन्हीं के पास चला गया है, फिर हमारी बात मन समझ कैसे सकता है ? मेरी परम अन्तरंग सखियों के अमृततुल्य मीठे वचन भी मुझे विष के समान प्रतीत हो रहे हैं | मैं क्षण – क्षण में कभी घर में आती हूँ कभी ‘प्रियतम आते होंगे’, इस आशा में भागती हुई घर से बाहर जाती हूँ किन्तु कहीं भी चैन नहीं मिलता | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अरी विरहिणी ! तू घबरा मत, कभी तो प्यारे श्यामसुन्दर के हृदय में तेरी यह ‘हाय ! हाय !’ की ध्वनि अवश्य ही प्रभाव डालेगी एवं उन्हें विवश होकर आना पड़ेगा |
( प्रेम रस मदिरा विरह – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
हाय ! सखी ! मेरा मन प्रियतम श्यामसुन्दर के बिना अत्यन्त ही घबरा रहा है | अरी सखी ! उन्होंने कहा था कि परसों ही आ जायेंगे किन्तु बरसों बीत गये उनका अभी तक परसों नहीं समाप्त हुआ | अरी सखी ! अपने मन को किस प्रकार एवं कहाँ तक समझाऊँ और अगर समझाऊँ भी तो वह भी तो उन्हीं के पास चला गया है, फिर हमारी बात मन समझ कैसे सकता है ? मेरी परम अन्तरंग सखियों के अमृततुल्य मीठे वचन भी मुझे विष के समान प्रतीत हो रहे हैं | मैं क्षण – क्षण में कभी घर में आती हूँ कभी ‘प्रियतम आते होंगे’, इस आशा में भागती हुई घर से बाहर जाती हूँ किन्तु कहीं भी चैन नहीं मिलता | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अरी विरहिणी ! तू घबरा मत, कभी तो प्यारे श्यामसुन्दर के हृदय में तेरी यह ‘हाय ! हाय !’ की ध्वनि अवश्य ही प्रभाव डालेगी एवं उन्हें विवश होकर आना पड़ेगा |
( प्रेम रस मदिरा विरह – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
संसार
में हमने जितने काम किये हैं, अभ्यास से आगे बड़े हैं। ये बड़े बड़े नट
कमाल करते हैं जो, जिनको आप दूर से बैठे देखते हैं खुश होते हैं। वाह भाई!
वाह! कमाल कर दिया। वह कैसे कमाल कर दिया उसने? अभ्यास से । बस। वह भी
हमारी तरह था पहले। अभ्यास करके यहाँ पहुँच गया वह। संसार में तो हम
सर्वत्र अभ्यास करके आगे बड़े है। तो फिर भगवान् के एरिया में निराश क्यों
हों। और कोई सूरत भी नहीं। अगर कोई कहे निराश होकर बैठ जाएँगे हम
भगवत्प्राप्ति से बाज आये। तो 84 लाख घूमने से बाज आओगे क्या? वो तो करना पड़ेगा। एक साइड में तो जाना ही पड़ेगा आपको। इसलिये घबड़ाना नही चाहिये अभ्यास लगातार करतें रहें।
रसरी आवत जात ते सिल पर परत निशान।
अभ्यास में बहुत बड़ी शक्ति है।
--- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
अभ्यास में बहुत बड़ी शक्ति है।
--- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
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