Saturday, February 4, 2017

क्षण क्षण हरि गुरु स्मरण में ही व्यतीत करो। पल पल मृत्यु की और बढ़ रहे हो और संसार में बेहोश हो

  ------सुश्री श्रीधरी दीदी (प्रचारिका), जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।

साधक को अपनी शरणागति पर ध्यान देना चाहिए।वैसे आप लोगों को लगता है कि हम पूर्ण शरणागत हैं लेकिन वस्तुतः ऐसा है नहीं। छोटी सी भी बात आप से कही जाती है, आपका तुरंत उत्तर होता है - नहीं हमने तो ऐसा नहीं किया अथवा ऐसा किया तो नहीं था न जाने कैसे हो गया? बाहर से आप मान भी लें लेकिन भीतर से अपनी गलती स्वीकार नहीं करते। गुरु आपके अन्दर की बात नोट करते हैं, वह परीक्षा भी लेता है। और साधक परीक्षा में फेल हो गया तब भी गुरु बारम्बार परीक्षा लेना बंद नहीं करता।जिस कक्षा का जीव है उसी कक्षा का परचा उसको दिया जाता है, अगर आप परीक्षा देने से घबराएंगे तो आप कभी भी भगवद प्राप्ति नहीं कर सकेंगे। इस प्रकार बार-बार परीक्षा देते हुए हमें शरणागति को पूर्ण करना है।
------सुश्री श्रीधरी दीदी (प्रचारिका), जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।"
The Guru imparts spiritual knowledge, removes the darkness of ignorance and guides you towards the attainment of your supreme goal. Living in the association of a Saint for some time, if you find yourself more deeply attached to God and detached from the world, this is the surest proof that he is a God-realised soul. You could never have imagined giving so much time to devotion of God. It was only made possible due to the grace of your Guru. You should always realise the grace of your Guru to be instrumental in your spiritual progress.
--------JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.
Devotion is the most powerful spiritual practice. It destroys unauspiciousness of past karmas & creates auspiciousness by cleansing the mind.
भक्ति सबसे शक्तिशाली आध्यात्मिक साधना है । वह पूर्व कर्मों के अशुभ संस्कारों को नष्ट करके मन को शुद्ध करती है तथा नवीन शुभ संस्कारों की रचना करती है ।
......जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।


श्री महाराजजी से प्रश्न: संसार में भी तो स्त्री-पति आदि में प्रेम देखा जाता हैं। तो अंतर क्या हैं?
Ans:- संसार में कोई व्यक्ति किसी से इसलिए प्रेम नहीं कर सकता क्योंकि प्रत्येक जीव स्वार्थी है। वह आनंद चाहता है। अस्तु, लेने-लेने की भावना रखता है। जब दोनों पक्ष लेने-लेने की घात में है तो मैत्री कितने क्षण चलेगी? तभी तो स्त्री-पति,बाप-बेटे में दिन में दस बार टक्कर हो जाती है। जहाँ दोनों लेने-लेने के चक्कर में हैं, वहाँ टक्कर होना स्वाभाविक है।
कामना 'प्रेम' का विरोधी तत्त्व है। लेने-लेने का नाम कामना है, एवम् देने-देने का नाम प्रेम है, तथा लेने-देने का नाम व्यापार है। जिसमें प्रेमास्पद से कुछ याचना की भावना हो, वह प्रेम नहीं है। जिसमें सब कुछ देने पर भी तृप्ति न हो, वही 'प्रेम' है।
ब्रज देवियों का प्रेम इस प्रकार था कि जिस प्रकार भी श्रीकृष्ण प्रसन्न रहें, वही वे सब करती थी।

------ श्री महाराज जी ।

जयति जय, जय सद्गुरु महाराज |
छके युगल रस रास सरस जनु, मूर्तिमान रसराज |
बिनु कारण करुणाकर जाकर, अस स्वभाव भल भ्राज |
बरबस पतितन देत प्रेमरस, अस रसिकन सरताज |
डूबत आपु डुबावत जन कहँ, प्रेमसिंधु - ब्रजराज |
हौं ‘कृपालु’ गुरुचरण शरण गहि, भयो धन्य जग आज ||

भावार्थ - श्री सद्गुरुदेव की जय हो, जय हो | प्रेमानन्द में निमग्न गुरुदेव मानो श्यामा - श्याम के मूर्तिमान रसावतार ही हैं | उनका सहज स्वभाव ही है अकारण करुणा करके जीवोद्धार करना | गुरुदेव ऐसे रसिक शिरोमणि हैं कि पतितों को भी हठात् प्रेमानन्द प्रदान कर देते हैं; उस रस में स्वयं भी डूब जाते हैं; साथ ही शरणागत शिष्य को भी डुबा देते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं मैं तो उन सद्गुरु के चरणों की शरण ग्रहण करके आज धन्य हो गया |
( प्रेम रस मदिरा सद्गुरु - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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अरे कृत्घन मन! प्रभु ने तुझे प्रेम मार्ग का पथिक बनाया है, फिर तुझ में घृणा, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष जैसी मलिन वृत्तियों का वास क्यों? क्या यह अनवरत नामापराध की क्षृंखला तुझे अकारण-करुण, कृपासिन्धु, दीनबंधु स्वामी, सखा, सुत, पति रूप महाप्रभु के श्री चरणों से प्रथक न कर देगी। फिर तू कहाँ जायेगा? हे मन! तेरे जैसे पतित के लिए यदि कोई दूसरा स्थान नहीं ,तो अब बहुत हो गया, छोड़ दे अपनी जन्म-जन्म की आदत और अपने एकमात्र प्यारे श्री महाराजजी के चरणों का प्रेम-पुजारी बनकर उनकी कोटी-कोटी कृपाओं का चिंतन करते हुए एकाग्र,अनन्य व निष्काम भाव से उनकी सेवा में लग जा।
------सुश्री श्रीधरी दीदी (प्रचारिका), जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...