Sunday, March 5, 2017

श्री महाराजजी के श्रीमुख से......!!!
1.हरि और गुरु केवल अधिकारी जीव को ही खींच सकते हैं, अनाधिकारी जीव को नहीं। जैसे लोहा जितनी ज्यादा मात्रा में शुद्ध होगा ,चुंबक से उतना ही शीघ्र खिंच जाएगा।
2.जब तक लोक और परलोक दोनों की चाहत रहेगी ,तब तक प्रेमानन्द नहीं मिल सकता।
3.प्रारब्ध उसी को कहते हैं कि जब दुख कि कल्पना की जाये किन्तु सुख प्राप्त हो,अथवा सुख की कल्पना की जाये और दुख प्राप्त हो।
4.श्री महाराजजी कहते हैं कि: जितनी क्षमा हम करते हैं ,उतना कोई नहीं कर सकता। कई बार सोचते है कि उसका परित्याग कर दिया जाये ,किन्तु फिर दया आ जाती है।
5.श्री महाराजजी समझाते हैं कि: जब हम कोई बात पूछे तो भोले बच्चों की भाँति सीधा सा उत्तर दिया करो।
6.जो शत प्रतिशत आज्ञापालन के लिए तैयार नहीं है ,वह कैसे आगे बढ्ने की आशा कर सकता है।
7.बुद्धि से गलत और विपरीत चिंतन करके साधक स्वयं अपना अहित कर लेता है।
8.दैहिक, दैविक, भौतिक तापो से तप्त भगवदबहिर्मुख जीवों को हरि सन्मुख करने के लिए जगदगुरु श्री कृपालुजी महाराज भगवन्नाम संकीर्तन को ही सर्वश्रेष्ठ बताते है ,भगवन्नाम में पाप नाश करने की ऐसी शक्ति है की बड़े से बड़े पापी, सभी पापों से मुक्त होकर दिव्य प्रेम का पात्र बन जाता है।
-------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाराज।

श्री महाराजजी के श्रीमुख से:
एक बात है बड़ी इंपोर्टेंट(IMPORTANT)। हरि- गुरु को अपने साथ सर्वत्र ,सर्वदा महसूस करो। इसका अभ्यास करो। दस दिन ,बीस दिन, महीने, छ: महीने में यह अभ्यास पक्का हो जायेगा कि हम अकेले नहीं हैं। हम जहां अपने को अकेला मानते हैं वहीं पाप कर बैठते हैं - प्राइवेट। अरे, वेद कहता है, अगर तुम गुरु को न भी मानो तो भगवान को तो मानो कि अंत:करण में वो नित्य हमारे साथ है, हमारे आइडिया नोट कर रहा है। तो हरि-गुरु को अपने साथ अपना रक्षक मानो। यह फीलिंग हो - हम अकेले नहीं हैं,सदा वे हमारे साथ है।गलत काम न करें ,गलत चिंतन न करें । सावधानी आयेगी तो अपराध से बचेंगे।

हमारे प्यारे श्री महाराजजी (जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु) तो सदा से ही हम पर निगरानी रखते हैं। हमारे हर संकल्प हर क्रिया को हर क्षण हमारे साथ रहकर देखा करते हैं। यह हमारी कमी है कि हम उन्हें अपने साथ सदा महसूस नहीं कर पाते। बस पूर्ण दीनातिदीन होकर अपनी इंद्रिय,मन,बुद्धि को उनके चरणों में सदा-सदा के लिए चढ़ा दो। केवल उनकी आज्ञा ही हमारा चिंतन और उसका पालन ही हमारा काम है। बस इतनी साधना है। इसी बात पर आँसू बहाकर उनके चरणों को धोकर पी लो कि हम उन्हें सदा साथ-साथ महसूस क्यों नहीं करते।

कामना करना हमारा स्वभाव है:
आनन्द पाना हमारा स्वभाव है, इसलिये कामना बनाना भी हमारा स्वभाव है । पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, इन्हीं की पाँच कामना होती है अर्थात् देखने, सुनने, सुँघने, रस लेने, और स्पर्श करने की कामना । अज्ञानी संसार की कामना करता है और ज्ञानी भगवान् की कामना करता है।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।


आज्ञापालन ही अंतिम लक्ष्य है और प्रारम्भिक लक्ष्य है,और बीच में भी यही चलेगा। इसलिए सेवा को अच्छी प्रकार समझ लेना चाहिये कि जिससे हमारे स्वामी को सुख मिले,वही क्रिया हमारे लिए कल्याणकृत है, हमारे सोचने के अनुसार नहीं। हमारी बुद्धि कभी वहाँ तक नहीं सोच सकती जहां तक हमारा स्वामी सोचता है। आज्ञापालन तो बहुत से लोग करते हैं ,लेकिन विपरीत चिंतन करके आज्ञापालन,हमको ऐसा कह दिया,करना तो पड़ेगा ही अब कह रहे हैं तो ,ये भीतर सोचा और गए ,गिर गए। अरे! मैंने कुछ कहा थोड़े ही॥ अरे! सोचा न ,भगवान के यहाँ कहने वहने का मूल्य नहीं हैं बस सोचने का मूल्य है , मन से चिंतन,इसलिए बहुत सावधान होकर हमें इस एक सेंटेन्स(sentence) पर बुद्धि को केन्द्रित करना है। सेवा पर। जिस आदेश से उनको सुख मिले बस वही सही है,हमारा ख्याल। फिर हमारा ख्याल लगाया तुमने ,फिर बुद्धि की शरणागति कहाँ है तुम्हारी । तुम गुरु की आज्ञा कहाँ मान रहे हो,ये तो अपनी आज्ञा मान रहे हो तुम! अत: क्षण-क्षण सावधान रहो और गुरु आज्ञा को ही सर्वोपरि मानो। अपनी दो अंगुल की खोपड़ी लगाना बंद करो,इसी ने तुम्हारे अनंत जन्म बिगाड़े हैं।
.......सुश्री श्रीधरी दीदी (प्रचारिका),जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मोर मुकुट वारो, मेरो प्रानन प्यारो।
भाल तिलक वारो, मेरो प्रानन प्यारो।
मुदु मुसकनि वारो, मेरो प्रानन प्यारो।
दृग अति मतवारो ,मेरो प्रानन प्यारो।
....श्री महाराजजी।
ओरे मोरे मन, राधिका रमन, निशि दिन गुन गन गाये जा। छिन छिन नेह बढ़ाये जा। पल पल प्रेम बढ़ाये जा।
वह जीवन क्या जीवन जिसमें , जीवन धन से प्यार न हो, है वह प्यार, प्यार क्या जिसमें ,पियसुख में बलिहार न हो।
श्यामा श्याम मिलन हित, नित प्रति,नैनन नीर बहाये जा। मन गोविंद गुन गाये जा।

----- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।


मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...