Sunday, March 5, 2017

आज्ञापालन ही अंतिम लक्ष्य है और प्रारम्भिक लक्ष्य है,और बीच में भी यही चलेगा। इसलिए सेवा को अच्छी प्रकार समझ लेना चाहिये कि जिससे हमारे स्वामी को सुख मिले,वही क्रिया हमारे लिए कल्याणकृत है, हमारे सोचने के अनुसार नहीं। हमारी बुद्धि कभी वहाँ तक नहीं सोच सकती जहां तक हमारा स्वामी सोचता है। आज्ञापालन तो बहुत से लोग करते हैं ,लेकिन विपरीत चिंतन करके आज्ञापालन,हमको ऐसा कह दिया,करना तो पड़ेगा ही अब कह रहे हैं तो ,ये भीतर सोचा और गए ,गिर गए। अरे! मैंने कुछ कहा थोड़े ही॥ अरे! सोचा न ,भगवान के यहाँ कहने वहने का मूल्य नहीं हैं बस सोचने का मूल्य है , मन से चिंतन,इसलिए बहुत सावधान होकर हमें इस एक सेंटेन्स(sentence) पर बुद्धि को केन्द्रित करना है। सेवा पर। जिस आदेश से उनको सुख मिले बस वही सही है,हमारा ख्याल। फिर हमारा ख्याल लगाया तुमने ,फिर बुद्धि की शरणागति कहाँ है तुम्हारी । तुम गुरु की आज्ञा कहाँ मान रहे हो,ये तो अपनी आज्ञा मान रहे हो तुम! अत: क्षण-क्षण सावधान रहो और गुरु आज्ञा को ही सर्वोपरि मानो। अपनी दो अंगुल की खोपड़ी लगाना बंद करो,इसी ने तुम्हारे अनंत जन्म बिगाड़े हैं।
.......सुश्री श्रीधरी दीदी (प्रचारिका),जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मोर मुकुट वारो, मेरो प्रानन प्यारो।
भाल तिलक वारो, मेरो प्रानन प्यारो।
मुदु मुसकनि वारो, मेरो प्रानन प्यारो।
दृग अति मतवारो ,मेरो प्रानन प्यारो।
....श्री महाराजजी।
ओरे मोरे मन, राधिका रमन, निशि दिन गुन गन गाये जा। छिन छिन नेह बढ़ाये जा। पल पल प्रेम बढ़ाये जा।
वह जीवन क्या जीवन जिसमें , जीवन धन से प्यार न हो, है वह प्यार, प्यार क्या जिसमें ,पियसुख में बलिहार न हो।
श्यामा श्याम मिलन हित, नित प्रति,नैनन नीर बहाये जा। मन गोविंद गुन गाये जा।

----- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।


अब देखो यहाँ चार-पाँच सौ आदमी आये हैं | अब अगर एक आदमी सोचे- हमसे तो बात ही नहीं किया | भई कोई संसारी व्यवहार हो कि चलो एक-एक आदमी को नम्बर-वार बुलाओ और एक-एक आदमी से बात करो, ऐसा तो नहीं | और जिससे बात करेंगे उससे अधिक प्यार है, ये सोचना गलत है | मेरी गोद में कोई बैठा रहे 24 घण्टे इससे कुछ नहीं होगा | उसका मन जितनी देर मेरे पास रहेगा बस उसको हम नोट करते हैं | खुले आम सही बात करते हैं | बदनाम हैं सारे विश्व में हम स्पष्ट व्यक्तित्व में साफ-साफ | आप ये ना सोचें कि हम बहिरंग अधिक सम्पर्क पा करके और बड़े भाग्यशाली हो गए | और एक को बहिरंग सम्पर्क न मिला, उससे बात तक नहीं किया मैंने तो उसका कोई मूल्य नहीं है हमारे हृदय में | ये सब कुछ नहीं | कुछ लोगों की आदत होती है बहुत बोलने की | वो जैसे ही लैक्चर से उतरेंगे सीधे हमारे पास आएंगे और बकर-बकर बोलते जाएंगे | कुछ लोग अपना हृदय में ही भाव रखते हैं, दूर से ही अपना आगे बढ़ते जाते हैं | मैं तो केवल हृदय को देखता हूँ | मुझे इन बहिरंग बातों से कोई मतलब नहीं है | और कभी बहिरंग बातों के धोखे में आना भी मत | इतना कानून याद रखना- “ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम” | जितनी मात्रा में हमारा सरेण्डर होगा, हमारी शरणागति होगी उतनी मात्रा में ही उधर से फल मिलेगा |
.........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
बहुतों को शंका है की भगवान और गुरु हमसे कितना प्यार करते हैं या कितना कृपा करते हैं ? तो इसका सीधा और सरल उतर है कि जो जीव जितनी मात्रा में जितना प्यार (भक्ति) करेगा, उससे भगवान और गुरु उतना ही प्यार करेंगे उससे अधिक भी नहीं या उससे कम भी नहीं । अब आप लोग सोचो आपको कितना चाहिए । आपको यदि १०% चाहिये तो १०% कर लो यदि ५०% चाहिये तो ५०% कर लो यदि हाँ १००% चाहिये पूरा कर लो । इसलिये प्यार करोगे तो प्यार मिलेगा यदि अक्टिंग करोगे तो वो भी महा अक्टिंग करेंगे । इसलिये छल, कपट छोड़ कर निस्वार्थ भाव से तुरंत जन्मे हुये बच्चे की तरह रो कर पुकारो ओर प्यार (भक्ति) करो ।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
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Out of 8,400,000 varieties of living beings, humans are the only children of God who have been granted the privilege of performing fruit-bearing actions. Since you cannot undo what you have done already, stop crying over destiny and focus instead on the actions you are free to perform in this life, for they will be called your destiny in the future. You have tremendous power. All other creatures, including heavenly gods, envy what you have: the power to create your own destiny.
------Jagadguru Shree Kripalu Ji Maharaj.
सदा यही सोचो कि मेरे जीवन का एक क्षण भी बिना हरि-गुरु सेवा के नष्ट न होने पाये। अपने आपको अपने शरण्य की धरोहर मानकर उनकी नित्य सेवा करने में ही अपना भूरिभाग्य मानो।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...