Monday, April 10, 2017

माय ! अस गुड़िया मोहिं बनाय |
जाकी निरखि सुघर सुंदरता, गुड़रा जिय ललचाय |
भूषन – वसन पिन्हाउ वाय अस, जस कहुँ सखिन न पाय |
पुनि बनाउ अस सुंदर गुड़रा, लखि गुड़िया मनभाय |
नख शिख करि श्रृंगार दुहुँन सिर, सेहरा देउ बँधाय |
कह ‘कृपालु’ तब कुंवरि सखिन लै, दोउन ब्यावहु कराय ||

भावार्थ – छोटी सी किशोरी जी कीर्ति मैया से कहती हैं – “ मैया ! मुझे ऐसी बढ़िया गुड़िया बना दे जिसकी सुन्दरता देख कर गुड्डे का मन ललचा जाय | और मैया ! इस गुड़िया को ऐसे कपड़े एवं गहने पहिना दे जो सखियों को कहीं न मिलें | फिर मैया गुड्डा भी इतना ही सुन्दर बना दे कि उसे देखकर गुड़िया का मन ललचा जाय | दोनों का नख से शिख तक सुन्दर श्रृंगार करके, दोनों को सेहरा बाँध दे |” ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं – “हाँ मैया ! ऐसा कर दे, तब हमारी छोटी – सी किशोरी जी सखियों को लेकर गुड़िया – गुड्डा का ब्याह रचायेंगी |”
( प्रेम रस मदिरा श्री राधा – बाल लीला – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

नींद जो है वो तमोगुण है। जाग्रत अवस्था में हम सत्वगुण में जा सकते हैं,रजोगुण में भी जा सकते हैं। लेकिन नींद जो है वो प्योर(pure) तमोगुण है। बहुत ही हानिकारक है। अगर लिमिट से अधिक सोओ तो भी शारीरिक हानी होती है। आपके शरीर के जो पार्ट्स हैं उनको खराब करेगा वो अधिक सोना भी। रेस्ट की भी लिमिट है। रेस्ट के बाद व्यायाम आवश्यक है। देखिये शरीर ऐसा बनाया गया है कि इसमें दोनों आवश्यक हैं। तुम्हें संसार में कोई जरूरी काम आ जाए,या कोई तुम्हारा प्रिय मिले तब नींद नहीं आती। इसलिए कोई फ़िज़िकल रीज़न नहीं कारण केवल मानसिक वीकनेस है। लापरवाही,काम न होना,नींद आने का प्रमुख कारण है। हर क्षण यही सोचो की अगला क्षण मिले न मिले अतएव भगवद विषय में उधार न करो।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

यदि आपके पास श्रद्धा रूपी पात्र है तो शीघ्र लेकर आइये और पात्रानुसार कृपालु महाप्रभु रूपी जलनिधि से भक्ति-जल भर-भरकर ले जाइए।स्वयं तृप्त होइये और अन्य की पिपासा को भी शांत कीजिये ।
यदि श्रद्धा रूपी पात्र भी नहीं है तो अपने परम जिज्ञासा रूपी पात्र से ही उस कृपालु-पयोधि का रसपान कर आनंदित हो जाइये ।
यदि जिज्ञासा भी नहीं है तो भी निराश न हों । केवल कृपालु-महोदधि के तट पर आकार बैठ जाइये, वह स्वयं अपनी उत्तुंग तरंगों से आपको सराबोर कर देगा । उससे आपमें जिज्ञासा का सृजन भी होगा, श्रद्धा भी उत्पन्न होगी और अन्तःकरण की शुद्धि भी होगी । तब उस शुद्ध अन्तःकरण रूपी पात्र में वह प्रेमदान भी कर देगा ।
और यदि उस कृपासागर के तट तक पहुँचने की भी आपकी परिस्थिति नहीं है तो आप उन कृपासिंधु को ही अपने ह्रदय प्रांगण में बिठा लीजिये । केवल उन्हीं का चिंतन, मनन और निदिध्यासन कीजिये । बस! आप जहां जाना चाहते हैं, पहुँच जाएँगे, जो पाना चाहते हैं पा जाएँगे ।

।। कृपानिधान श्रीमद सद्गुरु सरकार की जय ।।

सौ बातन की इक , धरु मरलीधर ध्यान।
बड़वहु सेवा -वासना , यह सौ ज्ञानन ज्ञान।।७४।।

भावार्थ - अनंत सिद्धांतों का यही सार है कि सेव्य श्रीकृष्ण में मन का अनुराग हो। एवं श्रीकृष्ण सेवा की भावना निरंतर बढ़ती जाय। यही अंतिम तत्त्वज्ञान है।
भक्ति शतक (दोहा - 74)
-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
(सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति)

Thursday, March 16, 2017

ओरे मोरे मन, राधिका रमन, निशि दिन गुन गन गाये जा। छिन छिन नेह बढ़ाये जा। पल पल प्रेम बढ़ाये जा।
वह जीवन क्या जीवन जिसमें , जीवन धन से प्यार न हो, है वह प्यार, प्यार क्या जिसमें ,पियसुख में बलिहार न हो।
श्यामा श्याम मिलन हित, नित प्रति,नैनन नीर बहाये जा। मन गोविंद गुन गाये जा।

----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

श्री राधे हमारी सरकार, फ़िकिर मोहिं काहे की ।

हित अधम उधारन देह धरेँ, बिनु कारन दीनन नेह करेँ ;

जब ऐसी दया दरबार , फ़िकिर मोहिं काहे की ।

...........श्री महाराज जी।

अनादिकाल से साधना की असफलता के पीछे एक ही अवगुण रहा है...!
हरि गुरु का स्मरण त्याग कर मन संसार में लगाना।
.......श्री महाराज जी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...