Saturday, May 6, 2017

कब मिलिहौ नंद कुमार, तुम मातु पिता भरतार ।
यह कह तेरी श्रुति चार, अब सुन लो मोर पुकार ॥
तव अगनित जन सरकार, हमरे इक तुम आधार ।
दुख पाये विविध प्रकार, अब सुन लो मोर पुकार ॥
लख चौरासी तनु धार, जनमेउ जग बारंबार ।
रह देखत तुम सरकार, अब सुन लो मोर पुकार ॥
तव माया तो सरकार, बहिरंगा शक्ति तिहार ।
सब जगिहं नचावन हार, अब सुन लो मोर पुकार ॥
माया तव बल सरकार, ब्रम्हादि नचावन हार ।
का शक्ति 'कृपालु' हमार, अब सुन लो मोर पुकार ॥
(युगल शतक)
A devotee humbly asks Shree Krishna, “ O Nandakimar Krishna, when will I meet you? All the four Vedas tell that You are my mother, father and Beloved. When will that day come when I will see You? Please listen to my humble cry.
O Shree Krishna, You have uncountable Divine associates but You alone are my only refuge. I have suffered all kinds of pain in this world. Please listen to my cry.
You have been quietly watching me taking birth after birth in this world in unncountable species. Now at least listen to my cry.
Your maya is bahiranga shakti (lifeless, external and amazing power). All the souls and gods and goddesses dance to its tune. Please listen to my humble cry for You.
Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj says in the words of a devotee-O shree Krishna, maya is Your personal power. What can a soul do when even Bramha and other great gods remain under its influence? So, O my beloved Krishna, please listen to my humble cry (and Grace me with Your love).”

--------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.
संत पाकर भी यदि जीवन भगवन्मय नही बन रहा है तो दो ही बाते हो सकती हैं , या तो आप जिसको संत मानते है वो संत ही नही है या आप भगवत्क्षेत्र में जाना ही नही चाहते (पूरी लगन के साथ) ।
यूँ समझिए या तो पारस नकली है या हमने आज तक उसका (मन-बुध्दि से पूर्ण समर्पणयुक्त) सही से स्पर्श ही नही किया ।
संत को पाकर भी हम उसका मूल्य नही समझ पाते है तथा अधिकांश लोग इसीलिए चूक जाते है, यदा-कदा जो कुछ महत्व समझते भी है वे लोग लापरवाही/टालमटोल (फिर कर लेंगे, बुढ़ापे में तो करना ही है आदि) करके सब गुड़-गोबर कर लेते हैं ।
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ।
God possesses innumerable mutual contradictions within Him. He is bigger than the biggest, yet smaller than the smallest. He is without name and form, but also with name and form. He is farther than the farthest, yet nearer than the nearest. God does not take birth, yet takes birth innumerable times. For all these reasons and more, it is impossible to know God with material senses, mind and intellect.
----- JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.
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कभी कभी लोग हमसे कहते हैं कि महाराजजी हमारा बड़ा दुर्भाग्य है । हमें हँसी आती है और आश्चर्य भी होता है कि यदि मनुष्य अभागा है तो क्या ये कुत्ता बिल्ली गधे भाग्य वाले हैं। अरे! तुम्हें चौरासी लाख योनियों मे सबसे ऊपर मानव देह मिला । भारत जैसे देश में जन्म मिला जहाँ भगवान के इतने अवतार हुए और संत भी बहुत आए । फिर तत्त्वज्ञान कराने वाला गुरु भी मिला। अनंत जीवों में कितनो को ये सौभाग्य मिला सोचो।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

कृपा करु बरसाने वारी,तेरी कृपा का भरोसा भारी।

कोउ हो या न हो अधिकारी, सब पर कृपा करें प्यारी।।

-------सुश्री श्रीधरी दीदी (जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज की प्रचारिका)।


भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि—
विषयान् ध्यायतश्चित्तं विषयेषु विषज्जते।
तुमने अब तक संसार में जहाँ बार-बार चिंतन किया, उसका फल भोगा। एक बार मुझमें आनंद है,ये चिंतन बार-बार करके देख लो फिर मैं मिल जाऊँ। और कुछ करना ही नहीं है। चिंतन, मनन, स्मरण, बस (भागवत, ११-१४-२७)।
---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

जगत की प्राप्ति जीव का लक्ष्य नहीं हैं। जीव भगवान् का अंश है अतः अपने अंशी को प्राप्त कर ही आत्मा की शांति को प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार का वास्तविक विवेक गुरु की कृपा से ही प्राप्त होता है। ऐसा विवेक जाग्रत करने वाले गुरु को अपने करोड़ों प्राण देकर भी कोई उनके ऋण से उऋण होना चाहे तो यह जीव का मिथ्या अभिमान है।
..........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...