Saturday, May 6, 2017

जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज के श्रीमुख से नि:सृत अमृत वचन.......!!!

श्री महाराजजी बताते हैं की "श्यामा-श्याम" के लिए एक आँसू बहाने से वे हजार आँसू बहाते हैं। काश! की मेरी इस वाणी पर आप विश्वास कर लेते तो आँसू बहाते न थकते। अरे उसमें हमारा खर्च क्या होता है। उसमें क्या कुछ अकल लगाना है। क्या उसके लिए कोई साधना करनी है? क्या इसमें कोई मेहनत है। क्या यह कोई जप है? तप है? आँसू उनको इतने प्रिय हैं और तुम्हारे पास फ्री हैं। क्यों नहीं फ़िर उनके लिए बहाते हो? निर्भय होकर उनसे कहो कि तुम हमारे होकर भी हमें अबतक क्यों नहीं मिले। तुम बड़े कृपण हो, बड़े निष्ठुर हो, तुमको जरा भी दया नहीं आती क्या? हमारे होकर भी हमें नहीं मिलते हो। इस अधिकार से आँसू बहाओ। हम पतित हैं, अपराधी हैं, तो क्या हुआ। तुम तो 'पतित पावन' हो। फ़िर अभी तक क्यों नहीं मिले? अगर इतने बड़े अधिकार से मन से प्रार्थना करोगे, आँसू बहाओगे, तो वो तुम्हारे एक आँसू पर स्वयं हजार आँसू बहाते हैं।
प्रश्न: महाराजजी! कभी कभी ऐसा होता है न एक बार मैंने ऐसे ही suit डाला हुआ था तो कोई आई और कहती है - मालकिन किधर है? तो मुझे लगा- मैं नौकरानी हूँ क्या?
उत्तर: श्री महाराजजी बोले! नौकर तो हो ही हो। भगवान के नौकर हो माया के नौकर हो। दो में से एक का नौकर बनना पड़ेगा सबको। यही तो बात है न अहंकार की। उसने जब कहा मालकिन कहाँ है तो धक्का लगा तुमको। इसका मतलब तुम अपने को मालकिन समझती हो। काहे की मालकिन हो? दो कौड़ी की तो हो। किस बात की मालकिन हो बताओ जरा? अरे! काम क्रोध लोभ मोह मद मात्सर्य ईर्ष्या द्वेष सबकी तो मरीज़ हो,गुलाम हो। मालकिन किस बात की हो? मालिक तो एक भगवान है, महापुरुष है बस। तुम कहाँ मालकिन बनोगी? तुम तो इच्छाओं की गुलाम हो,ख़्वाहिशों की दासी हो। तो क्या गलत बोला उसने?
यह बीमारी निकाल देगा जब मनुष्य तभी वह normal होगा। वरना चाहे करोड़पति हो जाय,वह आगे ही बढ्ने की सोचेगा और हमेशा tension में रहेगा। कभी शांति नहीं मिल सकती। यह बीमारी मिटा दो। कोई किसी को कभी अच्छा नहीं कह सकता न मान सकता है चाहे वह जिस भी तरीके से रहे। तो फिर क्यों गुलामी करें हम दुनिया की अनावश्यक? हमको लोग अच्छा कहें- इस चक्कर में न पड़के अच्छा बनने के लिए चेष्टा करें।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
अवध बिहारी राजा राम,वृन्दाविपिन बिहारी श्याम।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम,ब्रजरस रसिक शिरोमणि श्याम।
ब्रह्म एक ही है द्वै नाम, तेहि कहु राम अथवा कहु श्याम।
धर्म प्रचारक राजा राम,प्रेम प्रचारक हैं घनश्याम।
------ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

संसार में प्रथम तो वैराग्य होना कठिन है। यदि वैराग्य हो भी गया तो कर्मकाण्ड का छूटना कठिन है। यदि कर्मकाण्ड से छुटकारा मिल गया तो काम क्रोधादि से छूटकर दैवी सम्पत्ति प्राप्त करना कठिन है। यदि दैवी संपत्ति भी आ गई तो भी सदगुरु मिलना कठिन है। यदि सदगुरु भी मिल जाय तो भी उनके वाक्य में श्रद्धा होकर ज्ञान होना कठिन है। और यदि ज्ञान भी हो जाय तो भी चित्त- वृत्ति का स्थिर रहना कठिन है।
यह स्थिति तो केवल भगवत्कृपा से ही होती है, इसका कोई अन्य साधन नहीं है। गोस्वामी तुलसीदास जी भी कहते हैं :--
" यह गुन साधन तें नहिं होई।
तुम्हारी कृपा पाव कोई कोई।।"

अतः विषयों से मन को हटाकर भगवत्तत्व गुरू से पूर्ण श्रद्धा के साथ समझकर उनके बताये गए मार्ग का ही अनुसरण करना चाहिए। तभी हमारा कल्याण होगा।
जो मनुष्य संसार को नाशवान और हरि- गुरु को सदा का साथी समझकर चलता है, वही उत्तम गति पाता है।

......श्री महाराजजी।

-: समस्त जयपुर वासियों के लिए स्वर्णिम अवसर :-
खातीपुरा,जयपुर में जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की प्रचारिका सुश्री श्रीधरी दीदी के विलक्षण दार्शनिक प्रवचन एवं रसमय संकीर्तन का आयोजन।
सत्संग प्रेमी महानुभाव !
इस विकराल कलिकाल में अनेक अज्ञानी असंतो द्वारा ईश्वरप्राप्ति के अनेक मनगढ़ंत मार्गों, अनेकानेक साधनाओं का निरूपण सुनकर भोले भाले मनुष्य कोरे कर्मकाण्डादि में प्रवृत्त होकर भ्रान्त हो रहे हैं एवं अपने परम चरम लक्ष्य से और दूर होते जा रहे हैं।
ऐसे में विविध दर्शनों के विमर्श से अनिश्चय के कारण, व्याकुल एवं भटके हुये भवरोगियों के लिए पंचम मूल जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज के प्रवचन अमृत औषधि के समान हैं।
अपने सद्गुरुदेव के कृपा प्रसाद से ही उनकी विदुषी प्रचारिका सुश्री श्रीधरी जी उनके समस्त शास्त्रों, वेदों एवं अन्यान्य धर्मग्रन्थों के सार स्वरूप विलक्षण दार्शनिक सिद्धान्त "कृपालु भक्तियोग तत्वदर्शन" को अपने ओजस्वी धारावाहिक प्रवचनों के माध्यम से जन-जन में प्रचारित करते हुये जीवों को श्री राधाकृष्ण की निष्काम भक्ति की ओर प्रेरित कर रही हैं।
इसी श्रंखला में उनके 15 दिवसीय दिव्य प्रवचन का आयोजन सिद्धेश्वर महादेव मंदिर ,सिंह भूमि -सी ,खातीपुरा , जयपुर में किया गया है। इस प्रवचन श्रंखला का समय दिनाँक 7 मई से 21 मई तक प्रतिदिन सायं 7:00 से 8:30 बजे तक रहेगा।
इस युग के परमाचार्य जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज द्वारा विरचित अद्वितीय संकीर्तन भक्त हृदय के लिए संजीवनी बूटी के समान हैं। उन्हीं अनुपमेय संकीर्तनों के माध्यम से वे प्रवचन के साथ ही कर्मयोग की क्रियात्मक साधना का अभ्यास भी करायेंगी।
अतएव यह एक ऐसा दुर्लभ अवसर है जो आपकी आत्मा को तृप्ति प्रदान करेगा। वेद-शास्त्र सम्मत सार्वभौमिक सिद्धान्त ज्ञान के साथ ही कलि के सर्वश्रेष्ठ धर्म संकीर्तन द्वारा भक्तजन ब्रजरस का भी आस्वादन कर सकेंगे।
सुश्री श्रीधरी जी के संस्कृत उच्चारण की बड़े से बड़े विद्वान भी प्रशंसा किए बिना नहीं रह सकते। गुरु कृपा से समस्त वेद-शास्त्रों के गूढ़तम सिद्धांतों को भी सरल सरस रूप में प्रस्तुत करना इनके प्रवचन की विशेषता है। इनके दिव्य ज्ञान से युक्त प्रवचन सभी आध्यात्मिक शंकाओं एवं समस्त धर्मग्रन्थों व आचार्यों के सिद्धांतों में परस्पर पाये जाने वाले विरोधाभासों का समन्वय करते हुये भगवत्प्राप्ति का अत्यंत सीधा सरल मार्ग प्रशस्त करते हैं।
वे इस धारावाहिक प्रवचन श्रंखला में समस्त शास्त्रीय प्रमाणों, तर्कों एवं दैनिक उदाहरणों द्वारा जीव का स्वरूप एवं लक्ष्य, भगवान से जीव का संबंध, मानव देह का महत्व एवं क्षणभंगुरता, भगवत्कृपा, शरणागति, वैराग्य एवं संसार का स्वरूप, गुरुतत्व, रूपध्यान, कर्मयोग, ज्ञानयोग इत्यादि विषयों पर प्रकाश डालते हुये भक्तियोग की उपादेयता सिद्ध करके शीघ्रातिशीघ्र लक्ष्य दिलाने वाली साधना का निरूपण करेंगी।
वे कठिन से कठिन विषयों की व्याख्या भी इतनी सरलता से करती हैं कि एक भोले भाले अंगूठा छाप को भी समझने में कठिनाई नहीं होती। इनका प्रवचन वेद, गीता, रामायण, भागवत, बाइबिल, कुरान आदि समस्त धर्मग्रन्थों के प्रमाणों से युक्त होता है।
"कृपालु भक्तियोग तत्वदर्शन" पर आधारित इनके रसमयी प्रवचन एवं मधुर संकीर्तन जिज्ञासुओं के जीवन को, उनकी विचारधारा को पूर्ण सात्विक एवं भगवदमयी बना देते हैं।
यह देव दुर्लभ मानव देह सद्गुरु की शरणागति में भगवत्प्राप्ति के लिए ही भगवान ने अपनी अकारण करुणा से हमें प्रदान किया है लेकिन परलोक में सद्गति प्राप्त करने के लिए हमने अब तक कोई तैयारी नहीं की। हमारे हठी एवं अहंकारी मन ने जीवन की इस गोधूलि बेला में भी भीषण तम परिपूर्ण पथ पर चलते हुए कभी उस और दृष्टिपात नहीं किया जहां दिव्य ज्ञान ,दिव्य प्रेम एवं दिव्य आनंद की वर्षा हो रही है। वेदों के अनुसार केवल वास्तविक गुरु के पावन सानिध्य एवं शरणागति से ही जीव का अज्ञान अंधकार समाप्त हो सकेगा एवं जीव भगवतप्राप्ति की और अग्रसर हो सकेगा। इसी तथ्य को मस्तिक्ष में रखते हुए ही इस प्रवचन का आयोजन किया गया है। ये दिव्य प्रवचन श्रवण एक ऐसा दुर्लभ अवसर है जो आपकी आत्मा को तृप्ति प्रदान करेगा। इस प्रवचन का प्रारूप किसी भी प्रकार के आडंबर से रहित है।
वेद कहता है :- "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत"
अरे मनुष्यों ! उठो, जागो और शीघ्र ही महापुरुषों की शरण में जाकर परतत्व का ज्ञान प्राप्त कर अपने परम चरम लक्ष्य आनंद को प्राप्त करो। पता नहीं इस क्षणभंगुर जीवन का अगला क्षण तुमको मिले न मिले, इसलिए देर न करो।

अतएव आप सभी से करबद्ध निवेदन है कि अपने इष्ट मित्रों एवं परिवार सहित समय से पधारकर इस धारावाहिक प्रवचन श्रंखला को आदि से अंत तक श्रवण कर अपने देव दुर्लभ मानव जीवन को सफल बनायें। इस स्वर्णिम अवसर को हाथ से न जाने दें।
नोट: इस सत्संग कार्यक्रम का सीधा प्रसारण Facebook Live Broadcast के माध्यम से आपके अपने इसी सबसे प्रिय Facebook ग्रुप (https://www.facebook.com/groups/361497357281832/) में किया जाएगा। एवं साथ-साथ ही जो भी हमारे द्वारा संचालित अन्य FbGroups/Fb Pages/Twitter/GooglePlus Account/हमारे Profiles हैं उनपर भी सभी जग़ह Share किया जायेगा।आप सभी से पुनः करबद्ध निवेदन है कि अधिक से अधिक हरि-गुरु प्रेमी जीवों को इन Groups/Pages से जोडें। इस सेवा में सभी का लाभ निहित है। श्री महाराजजी की कितनी बड़ी कृपा है कि आप सभी भक्तजन पूरे विश्व में कहीं भी हों घर बैठे इस विलक्षण दार्शनिक प्रवचन को सुन सकते हैं एवं लाभ ले सकते हैं।
जय श्री राधे।

हम जो चाहते हैं उसे प्रियतम जब चाहे दें , यह निष्काम प्रेम और हम जब चाहते हैं तभी दें , यह सकाम प्रेम।
----श्री महाराज जी।

ईश्वरीय क्षेत्र में मन का ही महत्त्व है। केवल शारीरिक रूप से सत्संग करने का विशेष लाभ नहीं है। मन से श्रद्धायुक्त हो कर सत्संग जीव को ज्ञान, वैराग्य, भक्ति सब कुछ दिला देगा।
......जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...