This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Saturday, May 6, 2017
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि—
विषयान् ध्यायतश्चित्तं विषयेषु विषज्जते।
तुमने अब तक संसार में जहाँ बार-बार चिंतन किया, उसका फल भोगा। एक बार मुझमें आनंद है,ये चिंतन बार-बार करके देख लो फिर मैं मिल जाऊँ। और कुछ करना ही नहीं है। चिंतन, मनन, स्मरण, बस (भागवत, ११-१४-२७)।
विषयान् ध्यायतश्चित्तं विषयेषु विषज्जते।
तुमने अब तक संसार में जहाँ बार-बार चिंतन किया, उसका फल भोगा। एक बार मुझमें आनंद है,ये चिंतन बार-बार करके देख लो फिर मैं मिल जाऊँ। और कुछ करना ही नहीं है। चिंतन, मनन, स्मरण, बस (भागवत, ११-१४-२७)।
---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
जगत
की प्राप्ति जीव का लक्ष्य नहीं हैं। जीव भगवान् का अंश है अतः अपने अंशी
को प्राप्त कर ही आत्मा की शांति को प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार का
वास्तविक विवेक गुरु की कृपा से ही प्राप्त होता है। ऐसा विवेक जाग्रत करने
वाले गुरु को अपने करोड़ों प्राण देकर भी कोई उनके ऋण से उऋण होना चाहे तो
यह जीव का मिथ्या अभिमान है।
..........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
..........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
श्रीधाम मनगढ़ (26/10/1980)
उस दिन जब आप लोग कीर्तन कर रहे थे , तो मैं बैठा - बैठा देख रहा था । सबका अपना - अपना नेचर होता है । कुछ लोगो का नेचर होता है दूसरों के दोष देखना । बहुत बुरी बात है । लेकिन मेरा धन्धा यही है, मैं क्या करूँ । जितनी देर यहाँ बैठा रहता हूँ।आप लोगो को रीड करता रहता हूँ । आप लोग तो चाहे गोलोक , बैकुण्ठ लोक जायेंगे मेरा क्या होगा , पता नहीं । क्योकि मैं तो ये ही करता हूँ । भगवान् वगभान् का ध्यान तो करता नहीं , मैं आप लोगों का ध्यान करता हूँ । कौन मक्कारी कर रहा है ? कौन थोड़ा प्रयत्न कर रहा है , कौन पूरी ताकत लगा रहा है ? पूरी ताकत लगाना है बस । वो कितना आप कर पायेंगे , ये सब आगे की बाते हैं । किन्तु हमें अपनी मेहनत तो पूरी करनी चाहिये न । आपकी मेहनत पूरी समझ लेगा अगर आपका शरण्य गुरु तो बस कृपा कर देगा । आपके पास कुछ थोड़े ही है जो कमाल कर दिखायेंगे । लेकिन जितनी पावर है उसका तो उपयोग कीजिये । शरणागति वो तो पूरी दिखा दीजिये । जो तुम्हे ज्ञान दिया जा रहा है उसको तो मान लीजिए । प्रैक्टीकल लाइफ में उतारिये उसको । बस सीधी सी बात है ।
उस दिन जब आप लोग कीर्तन कर रहे थे , तो मैं बैठा - बैठा देख रहा था । सबका अपना - अपना नेचर होता है । कुछ लोगो का नेचर होता है दूसरों के दोष देखना । बहुत बुरी बात है । लेकिन मेरा धन्धा यही है, मैं क्या करूँ । जितनी देर यहाँ बैठा रहता हूँ।आप लोगो को रीड करता रहता हूँ । आप लोग तो चाहे गोलोक , बैकुण्ठ लोक जायेंगे मेरा क्या होगा , पता नहीं । क्योकि मैं तो ये ही करता हूँ । भगवान् वगभान् का ध्यान तो करता नहीं , मैं आप लोगों का ध्यान करता हूँ । कौन मक्कारी कर रहा है ? कौन थोड़ा प्रयत्न कर रहा है , कौन पूरी ताकत लगा रहा है ? पूरी ताकत लगाना है बस । वो कितना आप कर पायेंगे , ये सब आगे की बाते हैं । किन्तु हमें अपनी मेहनत तो पूरी करनी चाहिये न । आपकी मेहनत पूरी समझ लेगा अगर आपका शरण्य गुरु तो बस कृपा कर देगा । आपके पास कुछ थोड़े ही है जो कमाल कर दिखायेंगे । लेकिन जितनी पावर है उसका तो उपयोग कीजिये । शरणागति वो तो पूरी दिखा दीजिये । जो तुम्हे ज्ञान दिया जा रहा है उसको तो मान लीजिए । प्रैक्टीकल लाइफ में उतारिये उसको । बस सीधी सी बात है ।
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज के श्रीमुख से नि:सृत अमृत वचन.......!!!
श्री महाराजजी बताते हैं की "श्यामा-श्याम" के लिए एक आँसू बहाने से वे हजार आँसू बहाते हैं। काश! की मेरी इस वाणी पर आप विश्वास कर लेते तो आँसू बहाते न थकते। अरे उसमें हमारा खर्च क्या होता है। उसमें क्या कुछ अकल लगाना है। क्या उसके लिए कोई साधना करनी है? क्या इसमें कोई मेहनत है। क्या यह कोई जप है? तप है? आँसू उनको इतने प्रिय हैं और तुम्हारे पास फ्री हैं। क्यों नहीं फ़िर उनके लिए बहाते हो? निर्भय होकर उनसे कहो कि तुम हमारे होकर भी हमें अबतक क्यों नहीं मिले। तुम बड़े कृपण हो, बड़े निष्ठुर हो, तुमको जरा भी दया नहीं आती क्या? हमारे होकर भी हमें नहीं मिलते हो। इस अधिकार से आँसू बहाओ। हम पतित हैं, अपराधी हैं, तो क्या हुआ। तुम तो 'पतित पावन' हो। फ़िर अभी तक क्यों नहीं मिले? अगर इतने बड़े अधिकार से मन से प्रार्थना करोगे, आँसू बहाओगे, तो वो तुम्हारे एक आँसू पर स्वयं हजार आँसू बहाते हैं।
श्री महाराजजी बताते हैं की "श्यामा-श्याम" के लिए एक आँसू बहाने से वे हजार आँसू बहाते हैं। काश! की मेरी इस वाणी पर आप विश्वास कर लेते तो आँसू बहाते न थकते। अरे उसमें हमारा खर्च क्या होता है। उसमें क्या कुछ अकल लगाना है। क्या उसके लिए कोई साधना करनी है? क्या इसमें कोई मेहनत है। क्या यह कोई जप है? तप है? आँसू उनको इतने प्रिय हैं और तुम्हारे पास फ्री हैं। क्यों नहीं फ़िर उनके लिए बहाते हो? निर्भय होकर उनसे कहो कि तुम हमारे होकर भी हमें अबतक क्यों नहीं मिले। तुम बड़े कृपण हो, बड़े निष्ठुर हो, तुमको जरा भी दया नहीं आती क्या? हमारे होकर भी हमें नहीं मिलते हो। इस अधिकार से आँसू बहाओ। हम पतित हैं, अपराधी हैं, तो क्या हुआ। तुम तो 'पतित पावन' हो। फ़िर अभी तक क्यों नहीं मिले? अगर इतने बड़े अधिकार से मन से प्रार्थना करोगे, आँसू बहाओगे, तो वो तुम्हारे एक आँसू पर स्वयं हजार आँसू बहाते हैं।
प्रश्न:
महाराजजी! कभी कभी ऐसा होता है न एक बार मैंने ऐसे ही suit डाला हुआ था तो
कोई आई और कहती है - मालकिन किधर है? तो मुझे लगा- मैं नौकरानी हूँ क्या?
उत्तर: श्री महाराजजी बोले! नौकर तो हो ही हो। भगवान के नौकर हो माया के नौकर हो। दो में से एक का नौकर बनना पड़ेगा सबको। यही तो बात है न अहंकार की। उसने जब कहा मालकिन कहाँ है तो धक्का लगा तुमको। इसका मतलब तुम अपने को मालकिन समझती हो। काहे की मालकिन हो? दो कौड़ी की तो हो। किस बात की मालकिन हो बताओ जरा? अरे! काम क्रोध लोभ मोह मद मात्सर्य ईर्ष्या द्वेष सबकी तो मरीज़ हो,गुलाम हो। मालकिन किस बात की हो? मालिक तो एक भगवान है, महापुरुष है बस। तुम कहाँ मालकिन बनोगी? तुम तो इच्छाओं की गुलाम हो,ख़्वाहिशों की दासी हो। तो क्या गलत बोला उसने?
यह बीमारी निकाल देगा जब मनुष्य तभी वह normal होगा। वरना चाहे करोड़पति हो जाय,वह आगे ही बढ्ने की सोचेगा और हमेशा tension में रहेगा। कभी शांति नहीं मिल सकती। यह बीमारी मिटा दो। कोई किसी को कभी अच्छा नहीं कह सकता न मान सकता है चाहे वह जिस भी तरीके से रहे। तो फिर क्यों गुलामी करें हम दुनिया की अनावश्यक? हमको लोग अच्छा कहें- इस चक्कर में न पड़के अच्छा बनने के लिए चेष्टा करें।
उत्तर: श्री महाराजजी बोले! नौकर तो हो ही हो। भगवान के नौकर हो माया के नौकर हो। दो में से एक का नौकर बनना पड़ेगा सबको। यही तो बात है न अहंकार की। उसने जब कहा मालकिन कहाँ है तो धक्का लगा तुमको। इसका मतलब तुम अपने को मालकिन समझती हो। काहे की मालकिन हो? दो कौड़ी की तो हो। किस बात की मालकिन हो बताओ जरा? अरे! काम क्रोध लोभ मोह मद मात्सर्य ईर्ष्या द्वेष सबकी तो मरीज़ हो,गुलाम हो। मालकिन किस बात की हो? मालिक तो एक भगवान है, महापुरुष है बस। तुम कहाँ मालकिन बनोगी? तुम तो इच्छाओं की गुलाम हो,ख़्वाहिशों की दासी हो। तो क्या गलत बोला उसने?
यह बीमारी निकाल देगा जब मनुष्य तभी वह normal होगा। वरना चाहे करोड़पति हो जाय,वह आगे ही बढ्ने की सोचेगा और हमेशा tension में रहेगा। कभी शांति नहीं मिल सकती। यह बीमारी मिटा दो। कोई किसी को कभी अच्छा नहीं कह सकता न मान सकता है चाहे वह जिस भी तरीके से रहे। तो फिर क्यों गुलामी करें हम दुनिया की अनावश्यक? हमको लोग अच्छा कहें- इस चक्कर में न पड़के अच्छा बनने के लिए चेष्टा करें।
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