Saturday, May 6, 2017

God possesses innumerable mutual contradictions within Him. He is bigger than the biggest, yet smaller than the smallest. He is without name and form, but also with name and form. He is farther than the farthest, yet nearer than the nearest. God does not take birth, yet takes birth innumerable times. For all these reasons and more, it is impossible to know God with material senses, mind and intellect.
----- JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.
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कभी कभी लोग हमसे कहते हैं कि महाराजजी हमारा बड़ा दुर्भाग्य है । हमें हँसी आती है और आश्चर्य भी होता है कि यदि मनुष्य अभागा है तो क्या ये कुत्ता बिल्ली गधे भाग्य वाले हैं। अरे! तुम्हें चौरासी लाख योनियों मे सबसे ऊपर मानव देह मिला । भारत जैसे देश में जन्म मिला जहाँ भगवान के इतने अवतार हुए और संत भी बहुत आए । फिर तत्त्वज्ञान कराने वाला गुरु भी मिला। अनंत जीवों में कितनो को ये सौभाग्य मिला सोचो।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

कृपा करु बरसाने वारी,तेरी कृपा का भरोसा भारी।

कोउ हो या न हो अधिकारी, सब पर कृपा करें प्यारी।।

-------सुश्री श्रीधरी दीदी (जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज की प्रचारिका)।


भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि—
विषयान् ध्यायतश्चित्तं विषयेषु विषज्जते।
तुमने अब तक संसार में जहाँ बार-बार चिंतन किया, उसका फल भोगा। एक बार मुझमें आनंद है,ये चिंतन बार-बार करके देख लो फिर मैं मिल जाऊँ। और कुछ करना ही नहीं है। चिंतन, मनन, स्मरण, बस (भागवत, ११-१४-२७)।
---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

जगत की प्राप्ति जीव का लक्ष्य नहीं हैं। जीव भगवान् का अंश है अतः अपने अंशी को प्राप्त कर ही आत्मा की शांति को प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार का वास्तविक विवेक गुरु की कृपा से ही प्राप्त होता है। ऐसा विवेक जाग्रत करने वाले गुरु को अपने करोड़ों प्राण देकर भी कोई उनके ऋण से उऋण होना चाहे तो यह जीव का मिथ्या अभिमान है।
..........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

गुरु की सेवा भगवान् की सेवा से बड़ी मनी गई है हर ग्रन्थ ,हर शास्त्र में । सेवा तो बहुत बड़ी चीज़ है । लेकिन सेवा करने वाले को ये ध्यान रखना चाहिये कि वो सेवा मन से हो । हमको ये सेवा मिली है सौभाग्य से ये फीलिंग होते हुये।
–––जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

श्रीधाम मनगढ़ (26/10/1980)
उस दिन जब आप लोग कीर्तन कर रहे थे , तो मैं बैठा - बैठा देख रहा था । सबका अपना - अपना नेचर होता है । कुछ लोगो का नेचर होता है दूसरों के दोष देखना । बहुत बुरी बात है । लेकिन मेरा धन्धा यही है, मैं क्या करूँ । जितनी देर यहाँ बैठा रहता हूँ।आप लोगो को रीड करता रहता हूँ । आप लोग तो चाहे गोलोक , बैकुण्ठ लोक जायेंगे मेरा क्या होगा , पता नहीं । क्योकि मैं तो ये ही करता हूँ । भगवान् वगभान् का ध्यान तो करता नहीं , मैं आप लोगों का ध्यान करता हूँ । कौन मक्कारी कर रहा है ? कौन थोड़ा प्रयत्न कर रहा है , कौन पूरी ताकत लगा रहा है ? पूरी ताकत लगाना है बस । वो कितना आप कर पायेंगे , ये सब आगे की बाते हैं । किन्तु हमें अपनी मेहनत तो पूरी करनी चाहिये न । आपकी मेहनत पूरी समझ लेगा अगर आपका शरण्य गुरु तो बस कृपा कर देगा । आपके पास कुछ थोड़े ही है जो कमाल कर दिखायेंगे । लेकिन जितनी पावर है उसका तो उपयोग कीजिये । शरणागति वो तो पूरी दिखा दीजिये । जो तुम्हे ज्ञान दिया जा रहा है उसको तो मान लीजिए । प्रैक्टीकल लाइफ में उतारिये उसको । बस सीधी सी बात है ।
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...