Friday, July 14, 2017

अरे! इस सृष्टि की क्या बात,स्वर्ग की जो सृष्टि है, उसका जो सम्राट है इन्द्र,वो भी इसी प्रकार काम, क्रोध लोभ, मोह में परेशान है।
सुरपतिर्ब्राह्मं पदं याचते।
वो ब्रह्मा का पद चाहता है। कितने प्राइम मिनिस्टर, उनके बाप भिखारी थे।
कितने अरबपति खरबपति जो, उनके बाप ठेला ले के चलते थे,प्रारब्ध के कारण हो गये इतने बड़े,लेकिन हम पूछते हैं, अन्दर का क्या हाल है?
जितना बड़ा आदमी है, उतना ही परेशान है।

---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

सतयुग वगैरह में हजारों योगी हुए और जब माया को नहीं पार कर सके, तो श्रीकृष्ण की भक्ति करने आये,तो उनके शरणागत होकर,उनसे माया की निवृत्ति की भिक्षा माँगे, क्योंकि—
तपस्विनो दानपरा यशस्विनो मनस्विनो मंत्रविदः सुमङ्गलाः।
क्षेमं न विन्दन्ति विना यदर्पणं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः॥
(२-४-१७, भागवत)
कितना ही बड़ा तपस्वी हो,योगी हो, ज्ञानी हो, कर्मी हो,अगर श्रीकृष्ण की भक्ति नहीं करता,तो पतन अवश्य होगा,माया धर दबोचेगी उसको, बच नहीं सकता कोई।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

सकल धर्म को मूल हैं , एक कृष्ण भगवान्।
मूल तजे सब शूल हैं , कर्म , योग अरु ज्ञान।।६५।।

भावार्थ - समस्त धर्मों का मूलाधार श्रीकृष्ण ही हैं। शेष सब शाखा , उपशाखा , पत्र , पुष्पादि के समान हैं यदि मूल काट दिया जाय तो शेष सब ढह जायेंगे।
भक्ति शतक (दोहा - 65)
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
(सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति)

Sunday, May 28, 2017

The stronger your decision that God alone is mine, the more intense will be your desire to meet Him. The more intense your desire, the deeper will be your resolve to do the things that take you closer to Him. The deeper your resolve, the harder you will try. The harder you try, the more grace you will attract and the closer you will come to Him.
.....SHRI MAHARAJJI.

हे प्राणेश्वर ! कुंजबिहारी श्रीकृष्ण ! तुम ही मेरे जीवन सर्वस्व हो । हमारा – तुम्हारा यह सम्बन्ध सदा से है एवं सदा रहेगा ( अज्ञानतावश मैं इस सम्बन्ध को भूल गयी ) । तुम चाहे मेरा आलिंगन करके मुझे अपने गले से लगाते हुए, मेरी अनादि काल की इच्छा पूर्ण करो, चाहे उदासीन बनकर मुझे तड़पाते रहो, चाहे पैरों से ठोकर मार – मारकर मेरा सर्वथा परित्याग कर दो। प्राणेश्वर ! तुम्हें जिस – जिस प्रकार से भी सुख मिले, वही करो मैं तुम्हारी हर इच्छा में प्रसन्न रहूंगी । ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि निष्काम प्रेम का स्वरूप ही यही है कि अपनी इच्छाओं को न देखते हुए, प्रियतम की प्रसन्नता में ही प्रसन्न रहा जाय । अपने स्वार्थ के लिए प्रियतम से बदला पाने की भावना से प्रेम करना व्यवहार जगत का नाटकीय व्यापार – सा ही है।
--- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
भगवान् संसार में सर्वत्र व्याप्त है," हरि व्यापक सर्वत्र समाना "
लेकिन न हमें भगवान् दिखाई देता है, न उसके शब्द सुनाई देते हैं, अर्थात् हमें संसार में भगवान् का किसी भी प्रकार का अनुभव नहीं होता। हमारी इन्द्रियाँ अर्थात् आँख, कान, नाक, त्वचा, रसना, हमारा मन और हमारी बुद्धि ये सब मायिक हैं और इन्हीं इन्द्रिय, मन, बुद्धि द्वारा हम संसार की प्रत्येक वस्तु का अनुभव करते हैं, लेकिन भगवान् माया से परे दिव्य है, उसे इन इन्द्रिय, मन, बुद्धि द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता। भगवान् जब हमारी इन्द्रिय, मन, बुद्धि को शक्ति प्रदान करते हैं, तब ये सब अपना-अपना कर्म करते हैं, अन्यथा तो ये सब जड़ हैं, अतः माया से बने इन्द्रिय, मन, बुद्धि के द्वारा दिव्य भगवान् का अनुभव होना असम्भव है। जब इन्द्रिय, मन, बुद्धि दिव्य हो जायेंगे, तभी संसार में सर्वत्र व्याप्त भगवान् का अनुभव किया जा सकता है, जैसे गोपियाँ सर्वत्र श्रीकृष्ण का दर्शन करती थीं- जित देखूँ तित श्याममयी है।
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।

"हे श्यामसुंदर! संसार में भटकते भटकते थक गया। हे करुणा वरूनालय! तुमने अकारण करुणा के परिणाम स्वरूप मानव देह दिया ,गुरु के द्वारा तत्वज्ञान कराया कि किसी तरह तुम्हारे सन्मुख हो जाऊँ तथा अनंत दिव्यानन्द प्राप्त करके सदा सदा के लिए मेरी दुख निव्रत्ति हो जाये लेकिन यह मन इतना हठी है कि तुम्हारे शरणागत नहीं होता।"
--- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...