Friday, July 14, 2017

महाप्रभु जी कहते हैं—
आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टुमां अदर्शनान्मर्महतां करोतु वा।
यथा तथा वा विदधातु लम्पटो मत्प्राणनाथस्तु स एव नापरः।।

हे श्यामसुन्दर! तुम क्या कर सकते हो? तीन काम कर सकते हो।चाहे मुझसे प्यार कर लो आलिंगन करके और चाहे उदासीन हो जाओ, न्यूट्रल। और चाहे चक्र चला दो। हम सबमें तैयार हैं। हमारे प्यार में कमी नहीं होगी। इसको प्रेम कहते हैं।
क्योंकि वो तत्त्वज्ञ जान चुका हैकि जितना हम प्यार करेंगे,जितनी शरणागति होगी,
उतनी ये भी कर रहे हैं। ये बाहर कुछ भी व्यवहार करें,हम व्यवहार देखेंगे नहीं।
वो बढ़ता जायेगा उसका प्रेम।संसारी मामलों में व्यवहार के अनुसार प्यार बढ़ा-घटा, बढ़ा-घटा, ज़ीरो, अबाउट टर्न।यहाँ नाटक होता रहता है। उधर कोई डाउट(doubt) नहीं।

---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

गलती न मानने का सबसे बड़ा कारण यह है कि लोग अपने को बुद्धिमान कहलाना चाहते हैं । किसी को अगर कोई मूर्ख कहे , यह किसी को बर्दाश्त नहीं होता । अगर कोई विवेकपूर्वक सोचे तो सब अल्पज्ञ ही तो हैं । सब लोगों के पास जो बुद्धि है वह काम चलाऊ ही तो है । गुरु ने भी दोष बताया तो उलटा सोचने लगा । यह प्रमुख गलती है । चाहिये तो शिष्य को यह कि अगर कोई दोष बताया जाय तो निरन्तर उसका चिन्तन करे और भविष्य में वह न होने पाये । कोशिश करने पर अवश्य ही दोष कम होते हैं , लेकिन कोशिश कम होती है अतः दोष भी कम ठीक होते हैं। बराबर वाले और बड़ों से व्यवहार करते समय अपनी वाणी पर कन्ट्रोल रखें , जवाब न दें । गुरु के प्रति तो यही सोचना काफी है कि गलती तो हमारी ही होगी ।
----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

हम कह देते हैं— महाराज जी!
वो मन नहीं लगता।महाराज जी! वो, हम साधना करते हैं,तो मन संसार में जाता है।अरे! अनंत जन्म संसार में ले गये हो।ले गये हो, तो वो जाता है,
क्या करे बेचारा? अरे, भई! मन का काम जाने का है,तुम भगवान् की ओर ले जाओ, उधर जायेगा।जब चप्पल-जूता खाने पर भी वो बार-बार जाने को तैयार है, तुम्हारी आज्ञा से,तो, जो वो आनंद सिन्धु है,उसके पास जाने को क्यों मना करेगा?
उसको मना करने का अधिकार ही नहीं है।
वो तो, जो बुद्धि कहेगी, मन वो करेगा।और बुद्धि क्या कहेगी,ये डिसीजन महापुरुषों की शरण होकर के उनसे लो।शास्त्र-वेद और गुरु यही डॉक्टर हैं,
इनके द्वारा तत्त्वज्ञान प्राप्त करके उसी प्रकार मन को गवर्न करो और एक सेकंड में गवर्न नहीं कर सकोगे हमेशा के लिये।

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

गुरु द्वारा दिया गया 'तत्त्वज्ञान' हमारे लिये रिवॉल्वर का काम करेगा। बड़ा भारी पहलवान आ रहा है वह हमें मार देगा। अरे! क्या मार देगा। रिवॉल्वर जेब में है तो भागेगा डर के मारे वो पहलवान। तो वो शक्ति है गुरु के उपदेश में कि संसार की बड़ी से बड़ी कठिन परिस्थिति का सामना भी आसानी से कर सकते हो। गुरु की आज्ञा का अगर हम पालन करते तो हम लापरवाही न करते। इसलिए अपने पतन में हम स्वयं कारण है, हमारी बुद्धि, हमारी लापरवाही और उत्थान में गुरु कृपा मानो ,हमारी बुद्धि से उत्थान कभी नहीं हुआ आजतक न होगा ,हमारी बुद्धि तो मायिक है ये तो ईश्वरीय बुद्धि महापुरुष ने दान दी कि ऐसा करो, ऐसा करो, ऐसा न करो, इस बुद्धि के दान के द्वारा भगवननाम लिया, भगवान के लिये आँसू बहाया जो कुछ भी अच्छी चीजें हमारे पास आई वो महापुरुष के द्वारा ही आई। उसकी कृपा से अच्छे काम हो रहें है और गलत काम इसलिए हो रहें है कि महापुरुष के आदेश को, उपदेश को छोड़ दिया और अपनी बुद्धि के बल पर आ गये तो हमारी बुद्धि तो गड़बड़ ही थी, उसने हमें गड़बड़ में डाल दिया बस अब मर गये, अब हम दोष दे रहें है महापुरुष को, भगवान को, इसलिए सदा यह ज्ञान रहना चाहिए कि अच्छे कार्य उनकी ही कृपा से हो रहें है लेकिन गलत कार्य में अपना दोष ही समझना चाहिये क्योकि हमने उनके आदेशों का उल्लंघन किया लापरवाही की और अपनी बुद्धि के बल पर हमने कार्य किया इसलिए पतन हो गया हमारा।
-------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाराज।

हमारे गुरुदेव.........'हमारे कृपालु गुरुवर'....'हमारे रखवार'...'हमारी सरकार'...!!!

हमारे गुरुदेव का आध्यात्मिक परिचय तो केवल उनकी कृपा से ही थोड़ा बहुत जाना जा सकता है।उनके दिव्य स्वरूप,उनकी क्षमता एवं भगवद विषय में दक्षता के विविध पक्ष हैं जो केवल साधक की शरणागति एवं अंत:करण की शुद्धता की अवस्था पर ही उनकी कृपा से अनुभव में आ सकता है अन्यथा बुद्धि-कौशल से या तर्क-वितर्क कुतर्क से महापुरुष को जानने की चेष्टा करना ही पागलपन है। वह कभी पकड़ में नहीं आ सकता। जब कभी किसी जीव के मन में उनके प्रति सच्ची जिज्ञासा होगी या भगवान के प्रति तीव्र लालसा का उदय होगा वह 'कृपालु महाप्रभु' तक आ ही जाता है या यूँ कहें की वो स्वयं चल कर उस तक पहुँच ही जाते हैं। लेकिन सावधान..... अगर मायावश उनसे किसी ने संसार मांग लिया जैसे मान-सम्मान,आर्थिक लाभ,रिद्धी-सिद्धि,स्वास्थ्य लाभ आदि तो फिर गुरुदेव अपने आपको छिपा लेते हैं तथा उस जीव के साथ ऐसा व्यवहार होगा कि वह वापस होकर ही रहेगा।
यहाँ तो जिसे भक्ति चाहिये,भगवत प्रेम चाहिये केवल वही टिक सकता है ऐसा अगर न होता तो अबतक इनके सत्संग में करोड़ो-अरबों की भीड़ होती। यहाँ कृपालु दरबार में भीड़ का काम नहीं यहाँ तो 'श्रीराधेश्याम ' की निष्काम भक्ति व नित उनकी सेवा मांगने वाले ही टिक सकते हैं।

गुरु के वचन,प्रवचन व दिशा निर्देश केवल मायिक शब्द या अर्थ नहीं होते। वह तो दिव्य चिन्मय एवं भगवद भाव से परिपूर्ण होते हैं। गुरु की कृपा से तो अंगूठा छाप को भी तत्त्वज्ञान हो जाता है वरना तो वही वचन ब्रहस्पति,सरस्वती की भी बुद्धि कुंठित कर दे। जो जिस कोटि का साधक होता है वह अपनी स्थिति के अनुसार गुरु के आदेश अथवा प्रवचन को आत्मसात कर पाता है। वैसे तो सभी का अनुभव येही है की ऐसा दिव्य विलक्षण प्रवचन आजतक तो पहले कभी कहीं नहीं सुना।ऐसा लगता है जैसे सभी आप्त ग्रंथ,ऋचाएँ सामने खड़ी हों कि उनके कुछ छंध,कुछ दोहे,कुछ श्लोक,कुछ आयते श्री महाराजजी अपने श्रीमुख से बोल दें और वे धन्य हो जायें। भगवत तत्त्व के प्रतिपादन में उद्धरणों (quotations) की भरमार रहती है,वेद,पुराण,गीता,भागवत,बाइबल,रामायण,क़ुरान आदि से उदाहरण प्रस्तुत करके गुरुदेव सबका समन्वय करते हैं। ऐसे समन्वयवादी गुरु को जगद्गुरुत्तम की उपाधि प्रदान कर आध्यात्मिक जगत गौरवान्वित हुआ है।

अरे! इस सृष्टि की क्या बात,स्वर्ग की जो सृष्टि है, उसका जो सम्राट है इन्द्र,वो भी इसी प्रकार काम, क्रोध लोभ, मोह में परेशान है।
सुरपतिर्ब्राह्मं पदं याचते।
वो ब्रह्मा का पद चाहता है। कितने प्राइम मिनिस्टर, उनके बाप भिखारी थे।
कितने अरबपति खरबपति जो, उनके बाप ठेला ले के चलते थे,प्रारब्ध के कारण हो गये इतने बड़े,लेकिन हम पूछते हैं, अन्दर का क्या हाल है?
जितना बड़ा आदमी है, उतना ही परेशान है।

---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

सतयुग वगैरह में हजारों योगी हुए और जब माया को नहीं पार कर सके, तो श्रीकृष्ण की भक्ति करने आये,तो उनके शरणागत होकर,उनसे माया की निवृत्ति की भिक्षा माँगे, क्योंकि—
तपस्विनो दानपरा यशस्विनो मनस्विनो मंत्रविदः सुमङ्गलाः।
क्षेमं न विन्दन्ति विना यदर्पणं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः॥
(२-४-१७, भागवत)
कितना ही बड़ा तपस्वी हो,योगी हो, ज्ञानी हो, कर्मी हो,अगर श्रीकृष्ण की भक्ति नहीं करता,तो पतन अवश्य होगा,माया धर दबोचेगी उसको, बच नहीं सकता कोई।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...