Friday, July 14, 2017

नींद जो है वो तमोगुण है। जाग्रत अवस्था में हम सत्वगुण में जा सकते हैं,रजोगुण में भी जा सकते हैं। लेकिन नींद जो है वो प्योर(pure) तमोगुण है। बहुत ही हानिकारक है। अगर लिमिट से अधिक सोओ तो भी शारीरिक हानी होती है। आपके शरीर के जो पार्ट्स हैं उनको खराब करेगा वो अधिक सोना भी। रेस्ट की भी लिमिट है। रेस्ट के बाद व्यायाम आवश्यक है। देखिये शरीर ऐसा बनाया गया है कि इसमें दोनों आवश्यक हैं। तुम्हें संसार में कोई जरूरी काम आ जाए,या कोई तुम्हारा प्रिय मिले तब नींद नहीं आती। इसलिए कोई फ़िज़िकल रीज़न नहीं कारण केवल मानसिक वीकनेस है। लापरवाही,काम न होना,नींद आने का प्रमुख कारण है। हर क्षण यही सोचो की अगला क्षण मिले न मिले अतएव भगवद विषय में उधार न करो।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

The Guru imparts spiritual knowledge, removes the darkness of ignorance and guides you towards the attainment of your supreme goal. Living in the association of a Saint for some time, if you find yourself more deeply attached to God and detached from the world, this is the surest proof that he is a God-realised soul. You could never have imagined giving so much time to devotion of God. It was only made possible due to the grace of your Guru. You should always realise the grace of your Guru to be instrumental in your spiritual progress.
--------JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.

अलबेलो हमारो यार, प्रेम के बंधन में |
नहिं जात समाधिन जोगिन जेइ
नाचत ता थेइ, ता थेइ – थेइ तेइ,
ब्रजनारिन कि तारिन कि तार, प्रेम के बंधन में |
नित खोजत वेद ऋचान जेई,
बनि यशुमति के सुत कान्ह तेई,
बँधे ऊखल में लेहु निहार, प्रेम के बंधन में |
ब्रह्माण्ड अनन्तहिं पाल जेई,
छोरत मुख कौरहिं ग्वाल तेई,
बने घोड़ा गँवारन ग्वार, प्रेम के बंधन में |
अग जग सब जग संहारक जेइ,
डरपत यशुमति की साँटिन तेइ,
धनि लीला ‘कृपालु’ सरकार, प्रेम के बंधन में ||

भावार्थ – हमारे रसिक शिरोमणि प्रियतम श्यामसुन्दर अरी सखी ! प्रेम के बंधन में बँधे हुए हैं | जो योगियों की समाधि में भी नहीं जाते, वे ही ब्रजांगनाओं की हाथ की तालियों की ताल पर ता-थेइ-थेइ करते हुए नाचते हैं | अरी सखी ! प्रेम के बंधन में वे ऐसे बँध जाते हैं कि जिनको निरन्तर वेद की ऋचाएं खोजा करती हैं, वे ही यशोदानन्दन कान्ह बनकर ऊखल में बँध जाते हैं | प्रेम का बंधन ऐसा है कि जो अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों का पालन करता है वही ग्वालों के मुख से ग्रास छीन – छीनकर खाता है एवं खेल में गँवार ग्वालों का घोड़ा बनता है | अरी सखी ! वे तो प्रेम के बंधन में बँधे हैं | जो स्थावर जंगम सब का संहार करते हैं वे ही यशोदा मैया के डंडे से डरते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि मैं अलबेली सरकार की लीला पर बलिहार जाता हूँ क्योंकि वे प्रेम के बंधन में बँधकर मधुरातिमधुर एवं परम विलक्षण लीलाएँ करते हैं |
( प्रेम रस मदिरा प्रकीर्ण - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

KarmaYog means performing worldly duties with your body while your mind is absorbed in the loving remembrance of God and Guru.

मन से हरि गुरु में अनुराग करना एवं तन से संसार का कर्म करना ही कर्मयोग है।

----------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.

महाप्रभु जी कहते हैं—
आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टुमां अदर्शनान्मर्महतां करोतु वा।
यथा तथा वा विदधातु लम्पटो मत्प्राणनाथस्तु स एव नापरः।।

हे श्यामसुन्दर! तुम क्या कर सकते हो? तीन काम कर सकते हो।चाहे मुझसे प्यार कर लो आलिंगन करके और चाहे उदासीन हो जाओ, न्यूट्रल। और चाहे चक्र चला दो। हम सबमें तैयार हैं। हमारे प्यार में कमी नहीं होगी। इसको प्रेम कहते हैं।
क्योंकि वो तत्त्वज्ञ जान चुका हैकि जितना हम प्यार करेंगे,जितनी शरणागति होगी,
उतनी ये भी कर रहे हैं। ये बाहर कुछ भी व्यवहार करें,हम व्यवहार देखेंगे नहीं।
वो बढ़ता जायेगा उसका प्रेम।संसारी मामलों में व्यवहार के अनुसार प्यार बढ़ा-घटा, बढ़ा-घटा, ज़ीरो, अबाउट टर्न।यहाँ नाटक होता रहता है। उधर कोई डाउट(doubt) नहीं।

---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

गलती न मानने का सबसे बड़ा कारण यह है कि लोग अपने को बुद्धिमान कहलाना चाहते हैं । किसी को अगर कोई मूर्ख कहे , यह किसी को बर्दाश्त नहीं होता । अगर कोई विवेकपूर्वक सोचे तो सब अल्पज्ञ ही तो हैं । सब लोगों के पास जो बुद्धि है वह काम चलाऊ ही तो है । गुरु ने भी दोष बताया तो उलटा सोचने लगा । यह प्रमुख गलती है । चाहिये तो शिष्य को यह कि अगर कोई दोष बताया जाय तो निरन्तर उसका चिन्तन करे और भविष्य में वह न होने पाये । कोशिश करने पर अवश्य ही दोष कम होते हैं , लेकिन कोशिश कम होती है अतः दोष भी कम ठीक होते हैं। बराबर वाले और बड़ों से व्यवहार करते समय अपनी वाणी पर कन्ट्रोल रखें , जवाब न दें । गुरु के प्रति तो यही सोचना काफी है कि गलती तो हमारी ही होगी ।
----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

हम कह देते हैं— महाराज जी!
वो मन नहीं लगता।महाराज जी! वो, हम साधना करते हैं,तो मन संसार में जाता है।अरे! अनंत जन्म संसार में ले गये हो।ले गये हो, तो वो जाता है,
क्या करे बेचारा? अरे, भई! मन का काम जाने का है,तुम भगवान् की ओर ले जाओ, उधर जायेगा।जब चप्पल-जूता खाने पर भी वो बार-बार जाने को तैयार है, तुम्हारी आज्ञा से,तो, जो वो आनंद सिन्धु है,उसके पास जाने को क्यों मना करेगा?
उसको मना करने का अधिकार ही नहीं है।
वो तो, जो बुद्धि कहेगी, मन वो करेगा।और बुद्धि क्या कहेगी,ये डिसीजन महापुरुषों की शरण होकर के उनसे लो।शास्त्र-वेद और गुरु यही डॉक्टर हैं,
इनके द्वारा तत्त्वज्ञान प्राप्त करके उसी प्रकार मन को गवर्न करो और एक सेकंड में गवर्न नहीं कर सकोगे हमेशा के लिये।

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...