Friday, July 14, 2017

जय हो जय हो अलबेलो सरकार, बलिहार बलिहार।
जय हो नागर नंदकुमार, बलिहार बलिहार।
जय हो राधा प्राणाधार, बलिहार बलिहार।
जय हो सखिन प्राण साकार ,बलिहार बलिहार।
जय हो रसिकन को सरदार, बलिहार बलिहार।
जय हो दिव्य प्रेम अवतार, बलिहार बलिहार।
जय हो मम 'कृपालु' सरकार, बलिहार बलिहार।।

------ जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
हे प्राणेश्वर ! कुंजबिहारी श्रीकृष्ण ! तुम ही मेरे जीवन सर्वस्व हो । हमारा–तुम्हारा यह सम्बन्ध सदा से है एवं सदा रहेगा (अज्ञानतावश मैं इस सम्बन्ध को भूल गयी)।तुम चाहे मेरा आलिंगन करके मुझे अपने गले से लगाते हुए, मेरी अनादि काल की इच्छा पूर्ण करो, चाहे उदासीन बनकर मुझे तड़पाते रहो, चाहे पैरों से ठोकर मार-मारकर मेरा सर्वथा परित्याग कर दो। प्राणेश्वर ! तुम्हें जिस-जिस प्रकार से भी सुख मिले, वही करो मैं तुम्हारी हर इच्छा में प्रसन्न रहूंगी । ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि निष्काम प्रेम का स्वरूप ही यही है कि अपनी इच्छाओं को न देखते हुए, प्रियतम की प्रसन्नता में ही प्रसन्न रहा जाय । अपने स्वार्थ के लिए प्रियतम से बदला पाने की भावना से प्रेम करना व्यवहार जगत का नाटकीय व्यापार सा ही है।
--- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

अरे मन ! इस संसार का समस्त व्यवहार झूठा है। जब तक किसी के पास तन, मन, धन एवं सहायकजन रहते हैं तब तक उसे सब संसार पूछता है किन्तु जब इनका अभाव देखता है तब अपना परिवार भी उसे छोड़ देता है। जब तक किसी से स्वार्थ सिद्ध होता रहता है तब तक उससे हजारों नाते जोड़ता है किन्तु जैसे ही अपना काम बनते नहीं देखता वैसे ही वह मित्र भी अपनी मित्रता छोड़ देता है। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अरे मन ! इसलिए तू संसार से किसी प्रकार की आशा न रखते हुए प्रतिक्षण श्यामसुन्दर का भजन कर।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

संसार में जब कोई भूत से आविष्ट हो जाता है, कोई आत्मा किसी आत्मा पर हावी हो जाती है, जिसको आप लोग कहते हैं कोई भूत लगा है, कोई प्रेत लगा है, तो जितनी देर तक वो भूत रहता है, वही वर्क करता है।
महापुरुषों को भी महाभूत लग जाता है, वो नन्दपूत।
तो वही करता है सब काम, फिर महापुरुष कुछ नहीं करता। भगवत्प्राप्ति के बाद नन्दपूत का भूत महापुरुषों के ऊपर हावी हो जाता है। और महापुरुष को कहता है, तुम चुप बैठो, मैं सब कुछ करूँगा:- ‘तस्य कार्यं न विद्यते’।
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येवात्मनः तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥
(३-१७, गीता)
नैव चास्ति किंचित्कर्तव्यमस्ति चेत् न स तत्त्ववित्
(१-२३, जाबालदर्शनोपनिषत्)
अगर कुछ करता है वो महापुरुष, तो महापुरुष नहीं है। महापुरुष का मतलब कृतकृत्य। कृत कृत्य:- करना कर चुका। कृतार्थ, वो जो कुछ पाना था, पा चुका।
अब कुछ भी क्यों करे? हम क्यों करते हैं कोई भी कर्म?
कुछ पाना है, ‘आनन्द’। जो पा चुका, वो कुछ क्यों करे?
अगर करे, तो क्वेश्चन होगा।
लेकिन हर महापुरुष करता है और भगवान् भी करता है।
अरे! भगवान् को क्या पाना है?
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।
अर्जुन! मुझे कुछ पाना नहीं है, लेकिन देख,
मैं भी सब कर्म करता हूँ—
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
(३-२२, ३-२४, गीता)
तो, ये भगवान् और महापुरुष जो कर्म करते हैं,
वह अपने लिये नहीं करते। हम सब जीवों के लिये करते हैं।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
भक्ति के विषय में वैसे तो सब अधिकारी हैं, लेकिन ‘भक्ति रसामृत सिन्धु’ में तीन भाग कर दिये हैं। एक उत्तम अधिकारी, एक मध्यम अधिकारी और एक कनिष्ठ।
उत्तम अधिकारी कौन है?
शास्त्रे युक्तौ च निपुणः सर्वथा दृढ़ निश्चयः।
प्रौढ़श्रद्धोऽधिकारी यः स भक्तामुत्तमो मतः॥
ध्यान दो!
नम्बर एक— शास्त्र-वेद के ज्ञान में निपुण हो। अगर वो निपुण नहीं होगा, तो एक आदमी ने अपने तर्क से उसके दिमाग में भूसा भर दिया और वो अलग हो जायेगा। हमारी बुद्धि तो वैसे ही संशयात्मा है, इसलिये शास्त्र-वेद का ज्ञान परमावश्यक है और वो भी किसी महापुरुष से मिले। पण्डितों से मिलने से वो काम नहीं बनेगा, और दिमाग खराब हो जायेगा।
और, नम्बर दो— ‘सर्वथा दृढ़ निश्चयः’, निश्चय दृढ़ हो, ढुलमुल नहीं। अंदर भगवान् बैठे हैं। क्या पता बैठे हैं कि नहीं? बैठे होते, तो कुछ तो मालूम पड़ता। लेकिन, शास्त्र-वेद झूठे नहीं हैं। हाँ, ये तो ठीक है।लेकिन...लेकिन...लेकिन...लेकिन....। ये भक्ति नहीं कर सकता। दृढ़ निश्चय हो।
वाल्मीकि से कहा—
मरा-मरा कहते रहना, जब तक हम लौट के न आवें,
तो, ये क्वेश्चन नहीं किया, कब लौट के आयेंगे आप? चुप।
बस आज्ञापालन, ‘सर्वथा दृढ़ निश्चयः।’
और,
‘पौढ़ः श्रद्धाः’ और श्रद्धा प्रगाढ़ हो, भूख हो। हमको पाना ही है, इसी जन्म में पाना है। ये उत्तम अधिकारी है।
इसको कोई कुसंग कुछ नहीं कर सकता।

---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मेरी श्यामा मेरे श्याम,विहरत नित वृन्दावन धाम।

मेरी श्यामा मेरे श्याम,इक श्रृंगार एक छविधाम ।

मेरी श्यामा मेरे श्याम,देत 'कृपालु' कृपा बिनु दाम।।

------- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Your rise and fall depend on your thinking.So do not keep your mind idle.Do not let it be influenced by the company of the wrong people.Donot listen to the wrong people.Throw out all their words which you have heard,just as you spit out the grit which was mixed with your food.
Always retain the thought of your 'GURU' in your mind and heart.

-------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...