Friday, July 14, 2017

भक्ति के विषय में वैसे तो सब अधिकारी हैं, लेकिन ‘भक्ति रसामृत सिन्धु’ में तीन भाग कर दिये हैं। एक उत्तम अधिकारी, एक मध्यम अधिकारी और एक कनिष्ठ।
उत्तम अधिकारी कौन है?
शास्त्रे युक्तौ च निपुणः सर्वथा दृढ़ निश्चयः।
प्रौढ़श्रद्धोऽधिकारी यः स भक्तामुत्तमो मतः॥
ध्यान दो!
नम्बर एक— शास्त्र-वेद के ज्ञान में निपुण हो। अगर वो निपुण नहीं होगा, तो एक आदमी ने अपने तर्क से उसके दिमाग में भूसा भर दिया और वो अलग हो जायेगा। हमारी बुद्धि तो वैसे ही संशयात्मा है, इसलिये शास्त्र-वेद का ज्ञान परमावश्यक है और वो भी किसी महापुरुष से मिले। पण्डितों से मिलने से वो काम नहीं बनेगा, और दिमाग खराब हो जायेगा।
और, नम्बर दो— ‘सर्वथा दृढ़ निश्चयः’, निश्चय दृढ़ हो, ढुलमुल नहीं। अंदर भगवान् बैठे हैं। क्या पता बैठे हैं कि नहीं? बैठे होते, तो कुछ तो मालूम पड़ता। लेकिन, शास्त्र-वेद झूठे नहीं हैं। हाँ, ये तो ठीक है।लेकिन...लेकिन...लेकिन...लेकिन....। ये भक्ति नहीं कर सकता। दृढ़ निश्चय हो।
वाल्मीकि से कहा—
मरा-मरा कहते रहना, जब तक हम लौट के न आवें,
तो, ये क्वेश्चन नहीं किया, कब लौट के आयेंगे आप? चुप।
बस आज्ञापालन, ‘सर्वथा दृढ़ निश्चयः।’
और,
‘पौढ़ः श्रद्धाः’ और श्रद्धा प्रगाढ़ हो, भूख हो। हमको पाना ही है, इसी जन्म में पाना है। ये उत्तम अधिकारी है।
इसको कोई कुसंग कुछ नहीं कर सकता।

---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मेरी श्यामा मेरे श्याम,विहरत नित वृन्दावन धाम।

मेरी श्यामा मेरे श्याम,इक श्रृंगार एक छविधाम ।

मेरी श्यामा मेरे श्याम,देत 'कृपालु' कृपा बिनु दाम।।

------- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Your rise and fall depend on your thinking.So do not keep your mind idle.Do not let it be influenced by the company of the wrong people.Donot listen to the wrong people.Throw out all their words which you have heard,just as you spit out the grit which was mixed with your food.
Always retain the thought of your 'GURU' in your mind and heart.

-------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.

मैं तुम्हारा हूँ ...!!!
मैं तुम्हारा हूँ फिर निराशा कैसी ?
उनको पतित प्यारे हैं फिर चिंता क्या ?

निराशा साधना में सबसे बड़ी बाधा है। हरि गुरु चिंतन निरंतर चलता रहे , तो कभी निराशा आ ही नहीं सकती। मैं बार - बार , बार - बार समझाता हूँ अपने को दीनहीन अकिंचन मानो , किन्तु यह न सोचो कि नहीं मुझसे तो साधना होगी नहीं। बार - बार सोचो---!!!
श्री राधे जू हमारी सरकार , फिकिर मोहे काहे की।
जब ऐसी दया दरबार , फिकिर मोहे काहे की। जब ऐसी सरल सुकुमार फिकिर मोहे काहे की।

राधा रानी के गुणों का चिंतन करना ही सबसे बड़ी दवाई है। आश्चर्य होता है , जब सुनता हूँ कि डिप्रेशन हो गया , टैंशन हो गया।
हरि गुरु पर यदि अविश्वास है तब ही ऐसा होता है। गुरु आज्ञा पालन सहर्ष करते हुये हर श्वास के साथ साथ राधे नाम का जप करते हुये , कोई जीवन व्यतीत करे , तो किसी प्रकार की अशान्ति हो ही नहीं सकती। अशान्ति तो अविवेक का विषय है इसे पास न फटकने दो। चाहे जैसी भी परिस्थिति हो।

जब ऐसी तुम्हारी रखवार फिकिर तोहे काहे की।
........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।
भगवान् संसार में सर्वत्र व्याप्त है," हरि व्यापक सर्वत्र समाना "
लेकिन न हमें भगवान् दिखाई देता है, न उसके शब्द सुनाई देते हैं, अर्थात् हमें संसार में भगवान् का किसी भी प्रकार का अनुभव नहीं होता। हमारी इन्द्रियाँ अर्थात् आँख, कान, नाक, त्वचा, रसना, हमारा मन और हमारी बुद्धि ये सब मायिक हैं और इन्हीं इन्द्रिय, मन, बुद्धि द्वारा हम संसार की प्रत्येक वस्तु का अनुभव करते हैं, लेकिन भगवान् माया से परे दिव्य है, उसे इन इन्द्रिय, मन, बुद्धि द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता। भगवान् जब हमारी इन्द्रिय, मन, बुद्धि को शक्ति प्रदान करते हैं, तब ये सब अपना-अपना कर्म करते हैं, अन्यथा तो ये सब जड़ हैं, अतः माया से बने इन्द्रिय, मन, बुद्धि के द्वारा दिव्य भगवान् का अनुभव होना असम्भव है। जब इन्द्रिय, मन, बुद्धि दिव्य हो जायेंगे, तभी संसार में सर्वत्र व्याप्त भगवान् का अनुभव किया जा सकता है, जैसे गोपियाँ सर्वत्र श्रीकृष्ण का दर्शन करती थीं- जित देखूँ तित श्याममयी है।
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।

अरे भाई! कुछ कमा लो,जैसे पहले कुछ कमाया था तो मनुष्य का शरीर मिला और भगवान में थोड़ी सी प्रव्रत्ति हुई।

......श्री महाराजजी।


श्री राधे जू को, अधाधुंध दरबार |
जिन वनचरिन आचरन कुत्सित, जग जेहि कह ब्यभिचार |
तिन कहँ निज सहचरि करि हरि सों, करवावति मनुहार |
जेहि रासहिं तरसति ‘कमला’ सी, तप करि – करि गइ हार |
तेहि वनचरिहिं सखिन किय रासहिं, को अस सरल उदार |
कह ‘कृपालु’ यह जानि गहहु मन ! शरण गौर सरकार ||

भावार्थ – श्री किशोरी जी के दरबार में छप्पर – फाड़ कृपा होती है | जिन वनचारियों का आचरण निन्दनीय था, संसार जिसे व्यभिचार की संज्ञा देता है ( पूर्णतम पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण को उस रूप में न जानते हुए भी पर – पुरुष मानकर ही अनन्य – प्रेम किया | जिस प्रकार औषधि अनजाने में भी पूर्ण लाभ देती है, उसी प्रकार गोपियों को भी भगवल्लाभ हुआ ) किशोरी जी ने उन वनचरियों को अपनी सहचरी बनाया एवं ब्रह्म श्याम से भी उनकी खुशामद करवायी | जिस महारास में युगों तप करने पर भी महालक्ष्मी सरीखी प्रवेश तक नहीं पा सकीं, उसी रास में किशोरी जी ने उन वनचरियों को अपनी प्राणसखी बनाकर अपनी अद्वितीय उदारता का परिचय दिया | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं – अरे मन ! ऐसे उदार दरबार के रहस्य को जानकर अलबेली सरकार के युगल – चरणों की शरण ग्रहण कर |
( प्रेम रस मदिरा श्रीराधा – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...