Friday, July 14, 2017

अरे मन ! इस संसार का समस्त व्यवहार झूठा है। जब तक किसी के पास तन, मन, धन एवं सहायकजन रहते हैं तब तक उसे सब संसार पूछता है किन्तु जब इनका अभाव देखता है तब अपना परिवार भी उसे छोड़ देता है। जब तक किसी से स्वार्थ सिद्ध होता रहता है तब तक उससे हजारों नाते जोड़ता है किन्तु जैसे ही अपना काम बनते नहीं देखता वैसे ही वह मित्र भी अपनी मित्रता छोड़ देता है। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अरे मन ! इसलिए तू संसार से किसी प्रकार की आशा न रखते हुए प्रतिक्षण श्यामसुन्दर का भजन कर।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

संसार में जब कोई भूत से आविष्ट हो जाता है, कोई आत्मा किसी आत्मा पर हावी हो जाती है, जिसको आप लोग कहते हैं कोई भूत लगा है, कोई प्रेत लगा है, तो जितनी देर तक वो भूत रहता है, वही वर्क करता है।
महापुरुषों को भी महाभूत लग जाता है, वो नन्दपूत।
तो वही करता है सब काम, फिर महापुरुष कुछ नहीं करता। भगवत्प्राप्ति के बाद नन्दपूत का भूत महापुरुषों के ऊपर हावी हो जाता है। और महापुरुष को कहता है, तुम चुप बैठो, मैं सब कुछ करूँगा:- ‘तस्य कार्यं न विद्यते’।
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येवात्मनः तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥
(३-१७, गीता)
नैव चास्ति किंचित्कर्तव्यमस्ति चेत् न स तत्त्ववित्
(१-२३, जाबालदर्शनोपनिषत्)
अगर कुछ करता है वो महापुरुष, तो महापुरुष नहीं है। महापुरुष का मतलब कृतकृत्य। कृत कृत्य:- करना कर चुका। कृतार्थ, वो जो कुछ पाना था, पा चुका।
अब कुछ भी क्यों करे? हम क्यों करते हैं कोई भी कर्म?
कुछ पाना है, ‘आनन्द’। जो पा चुका, वो कुछ क्यों करे?
अगर करे, तो क्वेश्चन होगा।
लेकिन हर महापुरुष करता है और भगवान् भी करता है।
अरे! भगवान् को क्या पाना है?
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।
अर्जुन! मुझे कुछ पाना नहीं है, लेकिन देख,
मैं भी सब कर्म करता हूँ—
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
(३-२२, ३-२४, गीता)
तो, ये भगवान् और महापुरुष जो कर्म करते हैं,
वह अपने लिये नहीं करते। हम सब जीवों के लिये करते हैं।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
भक्ति के विषय में वैसे तो सब अधिकारी हैं, लेकिन ‘भक्ति रसामृत सिन्धु’ में तीन भाग कर दिये हैं। एक उत्तम अधिकारी, एक मध्यम अधिकारी और एक कनिष्ठ।
उत्तम अधिकारी कौन है?
शास्त्रे युक्तौ च निपुणः सर्वथा दृढ़ निश्चयः।
प्रौढ़श्रद्धोऽधिकारी यः स भक्तामुत्तमो मतः॥
ध्यान दो!
नम्बर एक— शास्त्र-वेद के ज्ञान में निपुण हो। अगर वो निपुण नहीं होगा, तो एक आदमी ने अपने तर्क से उसके दिमाग में भूसा भर दिया और वो अलग हो जायेगा। हमारी बुद्धि तो वैसे ही संशयात्मा है, इसलिये शास्त्र-वेद का ज्ञान परमावश्यक है और वो भी किसी महापुरुष से मिले। पण्डितों से मिलने से वो काम नहीं बनेगा, और दिमाग खराब हो जायेगा।
और, नम्बर दो— ‘सर्वथा दृढ़ निश्चयः’, निश्चय दृढ़ हो, ढुलमुल नहीं। अंदर भगवान् बैठे हैं। क्या पता बैठे हैं कि नहीं? बैठे होते, तो कुछ तो मालूम पड़ता। लेकिन, शास्त्र-वेद झूठे नहीं हैं। हाँ, ये तो ठीक है।लेकिन...लेकिन...लेकिन...लेकिन....। ये भक्ति नहीं कर सकता। दृढ़ निश्चय हो।
वाल्मीकि से कहा—
मरा-मरा कहते रहना, जब तक हम लौट के न आवें,
तो, ये क्वेश्चन नहीं किया, कब लौट के आयेंगे आप? चुप।
बस आज्ञापालन, ‘सर्वथा दृढ़ निश्चयः।’
और,
‘पौढ़ः श्रद्धाः’ और श्रद्धा प्रगाढ़ हो, भूख हो। हमको पाना ही है, इसी जन्म में पाना है। ये उत्तम अधिकारी है।
इसको कोई कुसंग कुछ नहीं कर सकता।

---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मेरी श्यामा मेरे श्याम,विहरत नित वृन्दावन धाम।

मेरी श्यामा मेरे श्याम,इक श्रृंगार एक छविधाम ।

मेरी श्यामा मेरे श्याम,देत 'कृपालु' कृपा बिनु दाम।।

------- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Your rise and fall depend on your thinking.So do not keep your mind idle.Do not let it be influenced by the company of the wrong people.Donot listen to the wrong people.Throw out all their words which you have heard,just as you spit out the grit which was mixed with your food.
Always retain the thought of your 'GURU' in your mind and heart.

-------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.

मैं तुम्हारा हूँ ...!!!
मैं तुम्हारा हूँ फिर निराशा कैसी ?
उनको पतित प्यारे हैं फिर चिंता क्या ?

निराशा साधना में सबसे बड़ी बाधा है। हरि गुरु चिंतन निरंतर चलता रहे , तो कभी निराशा आ ही नहीं सकती। मैं बार - बार , बार - बार समझाता हूँ अपने को दीनहीन अकिंचन मानो , किन्तु यह न सोचो कि नहीं मुझसे तो साधना होगी नहीं। बार - बार सोचो---!!!
श्री राधे जू हमारी सरकार , फिकिर मोहे काहे की।
जब ऐसी दया दरबार , फिकिर मोहे काहे की। जब ऐसी सरल सुकुमार फिकिर मोहे काहे की।

राधा रानी के गुणों का चिंतन करना ही सबसे बड़ी दवाई है। आश्चर्य होता है , जब सुनता हूँ कि डिप्रेशन हो गया , टैंशन हो गया।
हरि गुरु पर यदि अविश्वास है तब ही ऐसा होता है। गुरु आज्ञा पालन सहर्ष करते हुये हर श्वास के साथ साथ राधे नाम का जप करते हुये , कोई जीवन व्यतीत करे , तो किसी प्रकार की अशान्ति हो ही नहीं सकती। अशान्ति तो अविवेक का विषय है इसे पास न फटकने दो। चाहे जैसी भी परिस्थिति हो।

जब ऐसी तुम्हारी रखवार फिकिर तोहे काहे की।
........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।
भगवान् संसार में सर्वत्र व्याप्त है," हरि व्यापक सर्वत्र समाना "
लेकिन न हमें भगवान् दिखाई देता है, न उसके शब्द सुनाई देते हैं, अर्थात् हमें संसार में भगवान् का किसी भी प्रकार का अनुभव नहीं होता। हमारी इन्द्रियाँ अर्थात् आँख, कान, नाक, त्वचा, रसना, हमारा मन और हमारी बुद्धि ये सब मायिक हैं और इन्हीं इन्द्रिय, मन, बुद्धि द्वारा हम संसार की प्रत्येक वस्तु का अनुभव करते हैं, लेकिन भगवान् माया से परे दिव्य है, उसे इन इन्द्रिय, मन, बुद्धि द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता। भगवान् जब हमारी इन्द्रिय, मन, बुद्धि को शक्ति प्रदान करते हैं, तब ये सब अपना-अपना कर्म करते हैं, अन्यथा तो ये सब जड़ हैं, अतः माया से बने इन्द्रिय, मन, बुद्धि के द्वारा दिव्य भगवान् का अनुभव होना असम्भव है। जब इन्द्रिय, मन, बुद्धि दिव्य हो जायेंगे, तभी संसार में सर्वत्र व्याप्त भगवान् का अनुभव किया जा सकता है, जैसे गोपियाँ सर्वत्र श्रीकृष्ण का दर्शन करती थीं- जित देखूँ तित श्याममयी है।
-----जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...