Thursday, August 3, 2017

रँगीली राधा रसिकन प्रान |
सरस किशोरी की रसबोरी, भोरी मृदु मुसकान |
सुबरन बरन गौर तनु सुबरन, नील बरन परिधान |
कनकन मुकुट लटनि की लटकनि, भृकुटिन कुटिल कमान |
कनकन कंकन कनकन किंकिनि, कनकन कुंडल कान |
लखि लाजत श्रृंगार लाड़लिहिं, कहँ लौं करिय बखान |
होत ‘कृपालु’ निछावर जापर, सुंदर श्याम सुजान ||

भावार्थ – रंगीली राधा रसिकों को प्राण के समान प्रिय हैं | रसमयी किशोरी जी की प्रेम रस से सरोबार भोली सी मुस्कान अत्यन्त ही मधुर है | किशोरी जी की देह का रंग सुवर्ण के रंग के समान अत्यन्त सुन्दर है | वे नीले रंग की साड़ी पहने हुए हैं | सुवर्ण के मुकुट, घुँघराले बालों की लटक एवं धनुष के समान टेढ़ी भौहें नितांत कमनीय हैं | हाथ में सुवर्ण के कंकण, कमर में सुवर्ण की किंकिणी एवं कानों में सुवर्ण के कुंडल मन को बरबस लुभा रहे हैं | कहाँ तक कहें किशोरी जी की श्रृंगार माधुरी को देखकर स्वयं श्रृंगार भी लज्जित हो रहा है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि सबसे बड़ी बात तो यह है कि त्रिभुवन मोहन मदन मोहन भी स्वयं किशोरी जी के हाथों बिना दाम के बिके हुए हैं |
( प्रेम रस मदिरा श्रीराधा – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

बिना तत्वज्ञान के हम साधना नहीं कर सकते। भगवतप्राप्ति का तो प्रश्न ही नहीं है। तत्वज्ञान के बिना तो हम तर्क, कुतर्क संशय ही करते रहेंगे ,इसी में पूरा जीवन बीत जाएगा,मानव देह व्यर्थ चला जाएगा।
!! जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज !!

प्रेम की परिभाषा में दो बातें खास हैं । एक तो निरंतर हो, और एक, निष्काम हो। अपने सुख की कामना न हो । अपने सुख की कामना आई। तो अपना सुख पूरा हुआ सेंट परसेंट, तो प्यार सेंट परसेंट। अपना अगर उससे कम सिद्ध हुआ, तो प्रेम कम। बिलकुल नहीं सिद्ध हुआ स्वार्थ उससे, प्रेम खत्म। यह तो संसार में होता है, यह तो व्यापार है ।हम चाय में, दूध में एक चम्मच चीनी डालें, थोड़ी मीठी। दो चम्मच डाला, और मीठी हो गयी। तीन चम्मच डाला और मीठी हो गयी। यह तो एक बिजनेस है। यह प्रेम नहीं। इसलिये दिन में दस बार आपका प्रेम स्त्री से, पति से, बाप से, बेटे से, अप-डाउन, अप - डाउन होता रहता है। स्वार्थ की लिमिट के अनुसार। तो सबसे पहली शर्त है, अपने सुख को छोड़ना होगा ।यहीं हम फेल हो जाते हैं। अनंत बार भगवान् मिले हमको, अनन्त बार संत मिले हमको। हम उनके पास गये । लेकिन अपने सुख की कामना, अपने स्वार्थ की कामना को लेकर गये।

.....सुश्री श्रीधरी दीदी (प्रचारिका),जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Dear Devotees,
Practice, Practice and Practice!
Withdraw your mind from the world and engage it in God. Make it your spiritual practice to do so again and again.
........SHRI MAHARAJ JI.

भगवान् संसार में सर्वत्र व्याप्त है," हरि व्यापक सर्वत्र समाना "
लेकिन न हमें भगवान् दिखाई देता है, न उसके शब्द सुनाई देते हैं, अर्थात् हमें संसार में भगवान् का किसी भी प्रकार का अनुभव नहीं होता। हमारी इन्द्रियाँ अर्थात् आँख, कान, नाक, त्वचा, रसना, हमारा मन और हमारी बुद्धि ये सब मायिक हैं और इन्हीं इन्द्रिय, मन, बुद्धि द्वारा हम संसार की प्रत्येक वस्तु का अनुभव करते हैं, लेकिन भगवान् माया से परे दिव्य है, उसे इन इन्द्रिय, मन, बुद्धि द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता। भगवान् जब हमारी इन्द्रिय, मन, बुद्धि को शक्ति प्रदान करते हैं, तब ये सब अपना-अपना कर्म करते हैं, अन्यथा तो ये सब जड़ हैं, अतः माया से बने इन्द्रिय, मन, बुद्धि के द्वारा दिव्य भगवान् का अनुभव होना असम्भव है। जब इन्द्रिय, मन, बुद्धि दिव्य हो जायेंगे, तभी संसार में सर्वत्र व्याप्त भगवान् का अनुभव किया जा सकता है, जैसे गोपियाँ सर्वत्र श्रीकृष्ण का दर्शन करती थीं- जित देखूँ तित श्याममयी है।
-----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

जब तक तुम्हें श्यामा श्याम नहीं मिल जाते उनसे मिलने की निरन्तर व्याकुलता बढ़ाते जाओ।

---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
सत्संग मन ते हो गोविन्द राधे।
ज्ञान वैराग्य भक्ति तीनों दिला दे।।

भावार्थः ईश्वरीय क्षेत्र में मन का की महत्त्व है। केवल शारीरिक रूप से सत्संग करने का विशेष लाभ नहीं है। मन से श्रद्धायुक्त होकर सत्संग जीव को ज्ञान,वैराग्य, भक्ति सब कुछ दिला देगा।
---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...