Thursday, August 3, 2017

भगवान् तथा महापुरुष शुद्ध शक्ति हैं। महापुरुष का संग सांसारिक हानि सहकर भी करना श्रेयस्कर है। महापुरुष भले ही प्रेमयुक्त व्यवहार करें , उदासीन रहें अथवा विपरीत व्यवहार ही क्यों न करें । सबमें हमारा कल्याण है।
--------सुश्री श्रीधरी दीदी (प्रचारिका),जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

' हम ' माने जीव। इस 'हम' माने जीव के अतिरिक्त दो तत्व और हैं , एक भगवान् , एक माया। इसके अतिरिक्त और कोई तत्व नहीं है। और हमारे पास एक सामान है , जिस को हम कहीं भी लगा सकते हैं। उस सामान का नाम है , मन।
अर्थात , मन को हम चाहे भगवान् में लगा दें चाहे माया के एरिया में लगा दें। दो में एक जगह लगाना पड़ेगा।
क्यों ? इसलिए की मन का स्वभाव है, प्रतिक्षण वर्क करना। निरंतर कर्म करना। और कर्म क्या करना ?
बिना किसी उद्देश्य के कोई कोई कर्म नहीं होता। बिना कारण के कार्य नहीं होता।
रीजन क्या ? रीजन(Reason) है , आनंद।
हम आनन्द चाहते हैं , शान्ति चाहते हैं , सुख चाहते हैं , हैप्पीनेस(Happiness) चाहते हैं , पीस(Peace) चाहते हैं। यह चाहना पड़ेगा। अगर आप कहें , हम न चाहे आनन्द , ऐसा नहीं हो सकता। क्यों ? इसलिए की हम आनन्द रुपी भगवान् के अंश हैं।
...........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु ।

साधक व् सिद्ध दोनों ही अपने को महापापी कहते हैं। यह भक्तों की अहंकार शून्यता है। अपने आराध्य की महानता के समक्ष वे अपने को क्षुद्र मानते हैं। लेकिन जो घोर संसारी हैं जो अत्यंत पातकी हैं वो अहंकार वश स्वयं को कभी भी पापी स्वीकार नहीं करते।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मैं, मैं, मैं , मैं काहे करे मूढ़ आठु यामा ।
अज जानि काल वृक भेजे यम धामा ।।

भावार्थ- अरे मूर्ख ! बकरे के समान रात दिन मिथ्या अभिमान-वश ' मैं मैं ' क्यों करता है। काल - रूपी भेड़िया तुझे यमलोक भेजने की तैयारी में लगा है ।
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज ।
श्यामा - श्याम गीत (३)
राधा - गोविन्द समिति।

रँगीली राधा रसिकन प्रान |
सरस किशोरी की रसबोरी, भोरी मृदु मुसकान |
सुबरन बरन गौर तनु सुबरन, नील बरन परिधान |
कनकन मुकुट लटनि की लटकनि, भृकुटिन कुटिल कमान |
कनकन कंकन कनकन किंकिनि, कनकन कुंडल कान |
लखि लाजत श्रृंगार लाड़लिहिं, कहँ लौं करिय बखान |
होत ‘कृपालु’ निछावर जापर, सुंदर श्याम सुजान ||

भावार्थ – रंगीली राधा रसिकों को प्राण के समान प्रिय हैं | रसमयी किशोरी जी की प्रेम रस से सरोबार भोली सी मुस्कान अत्यन्त ही मधुर है | किशोरी जी की देह का रंग सुवर्ण के रंग के समान अत्यन्त सुन्दर है | वे नीले रंग की साड़ी पहने हुए हैं | सुवर्ण के मुकुट, घुँघराले बालों की लटक एवं धनुष के समान टेढ़ी भौहें नितांत कमनीय हैं | हाथ में सुवर्ण के कंकण, कमर में सुवर्ण की किंकिणी एवं कानों में सुवर्ण के कुंडल मन को बरबस लुभा रहे हैं | कहाँ तक कहें किशोरी जी की श्रृंगार माधुरी को देखकर स्वयं श्रृंगार भी लज्जित हो रहा है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि सबसे बड़ी बात तो यह है कि त्रिभुवन मोहन मदन मोहन भी स्वयं किशोरी जी के हाथों बिना दाम के बिके हुए हैं |
( प्रेम रस मदिरा श्रीराधा – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

बिना तत्वज्ञान के हम साधना नहीं कर सकते। भगवतप्राप्ति का तो प्रश्न ही नहीं है। तत्वज्ञान के बिना तो हम तर्क, कुतर्क संशय ही करते रहेंगे ,इसी में पूरा जीवन बीत जाएगा,मानव देह व्यर्थ चला जाएगा।
!! जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज !!

प्रेम की परिभाषा में दो बातें खास हैं । एक तो निरंतर हो, और एक, निष्काम हो। अपने सुख की कामना न हो । अपने सुख की कामना आई। तो अपना सुख पूरा हुआ सेंट परसेंट, तो प्यार सेंट परसेंट। अपना अगर उससे कम सिद्ध हुआ, तो प्रेम कम। बिलकुल नहीं सिद्ध हुआ स्वार्थ उससे, प्रेम खत्म। यह तो संसार में होता है, यह तो व्यापार है ।हम चाय में, दूध में एक चम्मच चीनी डालें, थोड़ी मीठी। दो चम्मच डाला, और मीठी हो गयी। तीन चम्मच डाला और मीठी हो गयी। यह तो एक बिजनेस है। यह प्रेम नहीं। इसलिये दिन में दस बार आपका प्रेम स्त्री से, पति से, बाप से, बेटे से, अप-डाउन, अप - डाउन होता रहता है। स्वार्थ की लिमिट के अनुसार। तो सबसे पहली शर्त है, अपने सुख को छोड़ना होगा ।यहीं हम फेल हो जाते हैं। अनंत बार भगवान् मिले हमको, अनन्त बार संत मिले हमको। हम उनके पास गये । लेकिन अपने सुख की कामना, अपने स्वार्थ की कामना को लेकर गये।

.....सुश्री श्रीधरी दीदी (प्रचारिका),जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...