This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Thursday, August 3, 2017
प्रेम
की परिभाषा में दो बातें खास हैं । एक तो निरंतर हो, और एक, निष्काम हो।
अपने सुख की कामना न हो । अपने सुख की कामना आई। तो अपना सुख पूरा हुआ सेंट
परसेंट, तो प्यार सेंट परसेंट। अपना अगर उससे कम सिद्ध हुआ, तो प्रेम कम।
बिलकुल नहीं सिद्ध हुआ स्वार्थ उससे, प्रेम खत्म। यह तो संसार में होता है,
यह तो व्यापार है ।हम चाय में, दूध में एक चम्मच चीनी डालें, थोड़ी मीठी।
दो चम्मच डाला, और मीठी हो गयी। तीन चम्मच डाला और मीठी हो गयी। यह तो एक
बिजनेस है। यह प्रेम नहीं। इसलिये दिन में दस बार
आपका प्रेम स्त्री से, पति से, बाप से, बेटे से, अप-डाउन, अप - डाउन होता
रहता है। स्वार्थ की लिमिट के अनुसार। तो सबसे पहली शर्त है, अपने सुख को
छोड़ना होगा ।यहीं हम फेल हो जाते हैं। अनंत बार भगवान् मिले हमको, अनन्त
बार संत मिले हमको। हम उनके पास गये । लेकिन अपने सुख की कामना, अपने
स्वार्थ की कामना को लेकर गये।
.....सुश्री श्रीधरी दीदी (प्रचारिका),जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
भगवान् संसार में सर्वत्र व्याप्त है," हरि व्यापक सर्वत्र समाना "
लेकिन न हमें भगवान् दिखाई देता है, न उसके शब्द सुनाई देते हैं, अर्थात् हमें संसार में भगवान् का किसी भी प्रकार का अनुभव नहीं होता। हमारी इन्द्रियाँ अर्थात् आँख, कान, नाक, त्वचा, रसना, हमारा मन और हमारी बुद्धि ये सब मायिक हैं और इन्हीं इन्द्रिय, मन, बुद्धि द्वारा हम संसार की प्रत्येक वस्तु का अनुभव करते हैं, लेकिन भगवान् माया से परे दिव्य है, उसे इन इन्द्रिय, मन, बुद्धि द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता। भगवान् जब हमारी इन्द्रिय, मन, बुद्धि को शक्ति प्रदान करते हैं, तब ये सब अपना-अपना कर्म करते हैं, अन्यथा तो ये सब जड़ हैं, अतः माया से बने इन्द्रिय, मन, बुद्धि के द्वारा दिव्य भगवान् का अनुभव होना असम्भव है। जब इन्द्रिय, मन, बुद्धि दिव्य हो जायेंगे, तभी संसार में सर्वत्र व्याप्त भगवान् का अनुभव किया जा सकता है, जैसे गोपियाँ सर्वत्र श्रीकृष्ण का दर्शन करती थीं- जित देखूँ तित श्याममयी है।
लेकिन न हमें भगवान् दिखाई देता है, न उसके शब्द सुनाई देते हैं, अर्थात् हमें संसार में भगवान् का किसी भी प्रकार का अनुभव नहीं होता। हमारी इन्द्रियाँ अर्थात् आँख, कान, नाक, त्वचा, रसना, हमारा मन और हमारी बुद्धि ये सब मायिक हैं और इन्हीं इन्द्रिय, मन, बुद्धि द्वारा हम संसार की प्रत्येक वस्तु का अनुभव करते हैं, लेकिन भगवान् माया से परे दिव्य है, उसे इन इन्द्रिय, मन, बुद्धि द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता। भगवान् जब हमारी इन्द्रिय, मन, बुद्धि को शक्ति प्रदान करते हैं, तब ये सब अपना-अपना कर्म करते हैं, अन्यथा तो ये सब जड़ हैं, अतः माया से बने इन्द्रिय, मन, बुद्धि के द्वारा दिव्य भगवान् का अनुभव होना असम्भव है। जब इन्द्रिय, मन, बुद्धि दिव्य हो जायेंगे, तभी संसार में सर्वत्र व्याप्त भगवान् का अनुभव किया जा सकता है, जैसे गोपियाँ सर्वत्र श्रीकृष्ण का दर्शन करती थीं- जित देखूँ तित श्याममयी है।
-----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।
न्याय अब तुम ही करो ब्रजराज !
हम पतितन सरताज, तुमहिँ कह, पतितन को सरताज |
दोउ राजा निज प्रजा पूज्य अति, साजे निज निज साज |
पतितन प्यार करत दोउन को, कबहुँ न आई लाज |
पतितन ही सों हमरो तुम्हरो, नाम बड़ो जग आज |
पुनि ‘कृपालु’ तुम कत बिनु पातक, हम पातकन जहाज ||
हम पतितन सरताज, तुमहिँ कह, पतितन को सरताज |
दोउ राजा निज प्रजा पूज्य अति, साजे निज निज साज |
पतितन प्यार करत दोउन को, कबहुँ न आई लाज |
पतितन ही सों हमरो तुम्हरो, नाम बड़ो जग आज |
पुनि ‘कृपालु’ तुम कत बिनु पातक, हम पातकन जहाज ||
भावार्थ – हे ब्रजराज ! हमारे तुम्हारे निम्नलिखित झगड़े का निर्णय हम
तुम्हीं से चाहते हैं | हम भी यदि पापियों के सरताज हैं तो तुम भी तो पतित
पावन रूप से पापियों के सरताज हो | हम और तुम दोनों ही पतित जनों के अति ही
पूज्य हैं, भले ही साज पृथक् – पृथक् क्यों न हों अर्थात् जो पतित
तुम्हारी शरण नहीं गये, उन सबके पूज्य हम हैं, तथा जो पतित तुम्हारी ही शरण
में चले गये हैं उनके पूज्य तुम हो | हम और तुम दोनों पतितों से प्यार
करने में थोड़ा भी संकोच नहीं करते | पतितों से ही हमारा और तुम्हारा दोनों
का ही नाम संसार में प्रख्यात है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि फिर तुम
किस प्रकार पतितों के समस्त पापों को लेकर भी निष्पाप बने रहते हो और मैं
प्रतिक्षण पापों के बोझों से दबा जा रहा हूँ |
( प्रेम रस मदिरा दैन्य – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
( प्रेम रस मदिरा दैन्य – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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