Saturday, August 12, 2017

कोई हो पापात्मा हो, पुण्यात्मा हो,स्त्री हो, पुरुष हो, नपुंसक हो,जो भी मुझसे प्यार कर ले। कुछ भी मान के प्यार कर ले। फिर कोई कर्म करे,उसको पाप पुण्य छू नहीं सकता।और अर्जुन!अगर कोई ये सोचे कि मैंने तो शास्त्र-वेद पढ़ा नहीं, नहीं तो मैं जल्दी भगवत्प्राप्ति कर लेता।
अरे—नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।

मैं वेदाध्ययन वगैरह से,पण्डिताई से नहीं मिलता। उससे तो और दूर हो जाता हूँ।क्योंकि उसमें अहंकार हो जाता है।
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
(११-५३, ११-५४)

केवल भक्ति से मिलता हूँ।
------- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।


सब साधन जनु देह सम, रूपध्यान जनु प्राण राधे राधे ।
खात गीध अरु स्वान जनु ,कामादिक शव मान राधे राधे।।

श्रीकृष्ण की प्राप्ति की समस्त साधनायें यम,नियम,कर्म,योग,ज्ञान,व्रतादि प्राणहीन शव के समान है, यदि रूपध्यान रहित हैं ।
All spiritual practices for attaining Shri Krishna such as Gyan, Karma, Yoga, Austerities, and Rituals are like a dead body without a soul if they are done without Roop Dhyan -the Loving Remembrance of Krishna's form.
.......जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

उस ईश्वर को युगों तक परिश्रम करके भी कोई नहीं जान सकता है किंतु उस ईश्वर की जिस पर कृपा हो जाती है वह उसे पूर्णतया जान लेता है एवं कृतार्थ हो जाता है। सर्वात्म-समर्पण से मुक्ति एवम् भगवत्कृपा का लाभ हो सकता है। हमें ईश्वर के शरणागत हो जाना है ऐसी शरणागति के आधार पर ही ईश्वर कृपा निर्भर है। जो-जो जीवात्माएं उसके शरणागत हो गई, वह-वह अपने परम चरम लक्ष्य परमानंद को प्राप्त कर चुकी हैं एवम् जो शरणागत नहीं हुई है उन्ही के ऊपर ईश्वर की कृपा नहीं हुई है एवं वही अपने लक्ष्य से वंचित होकर 84 लाख योनियो में काल, कर्म, स्वभाव, गुणाधीन होकर चक्कर लगा रही हैं।
---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Thursday, August 3, 2017

The Fathomless ocean of the knowledge of all the Vedas, Scriptures and Puranas the supreme Acharaya of this age Bhakti Yog-rasavatar, Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj is the personification of the nectar of Braj-Ras, Divine Bliss.
While revealing the deepest philosophies and devotional secrets of the Vedas and Scriptures, he has used very simple language in his lectures. Shree Maharaji charming and heart enticing style leaves a permanent impression in the hearts of the loving devotees.
The revelation of the sweetest Divine Love of Radha Krishna in the devotional songs written by Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj gives the experience of the Leelas of Radha Krishna to sincere devoted souls.
The world’s spiritual seeker and those who are thirsty for Divine Love make their life devotional through being attracted to Shree Maharajji’s affectionate personality and satsang. As I did, you, too, can experience the sweetness of his Divinity.
JAI SHRI RADHEY.

Always remember that Death will come any Moment. You will not be given a Moment. When the time will come you will be away from this Human Birth. Don't think that you will not Die. All things are Fraud of this world but Death is the ultimate Truth. Remember it everytime and keep your mind in Hari-Guru so that if at the time of Death your mind is in God, you will get Golok. This is the Challenge of 'kripalu'.
.......Jagadguru Shree Kripalu ji Maharaj.
राधा–तत्त्व का वर्णन सर्वथा अनिर्वचनीय है।
शुक, सनकादिक जीवन्मुक्त अमलात्मा परमहंस निर्विकल्प समाधि में ध्यान - द्वारा जिस ज्योतिर्मय ब्रह्म की आराधना करते हैं, वह ब्रह्म श्री किशोरी जी के चरण–कमलों की नखमणि–चंद्रिका ही है अर्थात् किशोरी जी के चरणों की नख–मणि चंद्रिका को ही रसिक लोग निराकार ब्रह्म मानते हैं। उस निराकार ब्रह्म के बारे में ही वेदों का कथन है कि वह ब्रह्म अदृष्ट, अव्यवहार्य, अग्राह्य, अलक्षण एवं अचिन्त्य आदि हैं। फिर वह ब्रह्म भी गीता के अनुसार जिसमें प्रतिष्ठित है, वे ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण हैं । ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि वेदों के अनुसार वे श्रीकृष्ण भी राधिका की उपासना करते हैं । अतएव राधा–तत्त्व को जानने के चक्कर में न पड़कर तुम भी उनकी उपासना करो। वस्तुत: श्री राधा, श्रीकृष्ण की ही आत्मा हैं । अतएव जीवात्माओं की भाँति परमात्मा भी अपनी आत्म–स्वरूपा श्री राधा की आराधना करता है।

( प्रेम रस मदिरा ,श्रीराधा–माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति।
यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत्।
( याज्ञवलक्योपनिषद-१ )
वेद कहता है तुम्हारे मन का लगाव भगवान् में हो गया तो फिर तुम्हारी कोई ड्यूटी नहीं है संसार के रिश्तेदारों के प्रति। जाओ,भगवान् की भक्ति करो,तुम्हारे संसार को उसका संस्कार संभालेगा। सब जीव अपने-अपने संस्कार लेकर आते हैं। ये अहंकार व्यर्थ का है कि हम न हों तो हमारे बेटे को कौन सँभालेगा ? ये सब बकवास है। कितने बाप मर गये,बेटे बड़े-बड़े आदमी हो गये,प्राइम मिनिस्टर तक हो गये। किसी के मरने-जीने,होने न होने से फरक नहीं पड़ता।
तो इसलिये हमें ये फिकर नहीं करना है कि हम नहीं होंगे तो उसका क्या होगा ? उसका क्या होगा ? सबके भीतर भगवान् बैठे हैं,उसके संस्कार हैं। दो चीजें हैं। संस्कार के अनुसार वो अपना संसारी सामान पायेगा,भगवान् की ओर चलेगा,सब संस्कार के अनुसार होगा। प्रवृत्ति हमारी जो होती है वो पूर्व जन्म के संस्कार के अनुसार होती है।फिर उसको हम बढ़ावें या घटावें,ये हमारे ऊपर है,क्रियमाण कर्म पर निर्भर है।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...