Saturday, August 19, 2017

"My Radha Rani abundantly bestows causeless grace upon the souls. My Radha Rani is the divine mother of the whole universe. "
---- Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj.
DON'T MISS FACEBOOK LIVE BROADCAST:
Divine Sankirtan by Sushri Shreedhari Didi (Preacher of Jagadguruttam Shri Kripalu Ji Maharaj) on Sunday, 20th August, 2017.TIME: 10 A.M.To 12 P.M.
This Satsang Program will be Broadcast 'FaceBook Live' for all Devotees around the Globe on my Timeline ( https://www.facebook.com/sharadgupta1008 ) and in your favourite Group ( https://www.facebook.com/groups/361497357281832/ ) .Video will be shared to other Groups and Pages managed by us.SO DON'T MISS THIS GOLDEN OPPURTUNITY.

Jai Shri Radhey.
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज की प्रचारिका सुश्री श्रीधरी दीदी द्वारा दिव्य रसमय संकीर्तन का FaceBook पर सीधा प्रसारण दिनाँक 20अगस्त, 2017 (रविवार) को सुबह 10 बजे से दोपहर 12 बजे तक किया जायेगा। इस सत्संग कार्यक्रम का आनंद आप घर बैठे ही मेरी Timeline पर ( https://www.facebook.com/sharadgupta1008 ) एवं श्री महाराजजी के दिव्य ज्ञान के प्रचार के लिये बनाये गए आपके अपने सबसे बड़े एवं प्रिय ग्रुप ( https://www.facebook.com/groups/361497357281832/ ) में 'FaceBook Live'(सीधे प्रसारण) के माध्यम से ले सकते हैं। हमारे द्वारा संचालित अन्य Groups/Pages में भी Video शेयर किया जायेगा। अतः स्वर्णिम अवसर का लाभ अवश्य उठायें,चूक न जायें।
जय श्री राधे।

साधनावस्था में कामना करने वाला घोर पतन को प्राप्त हो सकता है यानी उसका जितने पर्सेन्ट(Percent) प्रेम हुआ है श्यामसुन्दर से वह सब ज़ीरो पर आ सकता है और नास्तिक भी हो सकता है।
इसलिए कम से कम 'कृपालु' तो डंके की चोट पर कहता है:- नास्तिक बन जाओ, बने रहो ठीक है,मत जाओ श्यामसुन्दर के पास। अौर अगर जाओ तो खबरदार मोक्ष तक की कामना ले के मत जाना। कामना डेन्जरस(Dangerous) है।

----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Sunday, August 13, 2017

सुश्री श्रीधरी दीदी के श्रीमुख से...!!!
जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज द्वारा निर्मित मंदिरों का महत्त्व।
देवालय अर्थात् मंदिर, कितना पवित्र व सुखद शब्द है जिसके श्रवण मात्र से एक आध्यात्मिक वातावरण हमारे हृदयों में जीवंत हो उठता है, घंटियों की आह्लादकारी ध्वनि कर्णरंध्रों में मुखरित हो उठती है, धूप, अगरबत्ती, पुष्पों की सात्विक सुगंध नासिका में पहुँचकर बरबस हमारी चित्तवृत्ति को भी सात्विक बना देती है और प्रभु के श्री विग्रह के दर्शन पाकर मन के समस्त संताप दूर हो जाते हैं ।
जब साधारण मनुष्यों द्वारा निर्मित मंदिरों में ही जीवों को इतनी शांति प्राप्त होती है तो फिर महापुरुषों द्वारा निर्मित मंदिरों व प्रतिष्ठित विग्रहों में कैसी अद्भुत अलौकिकता व आकर्षण होगा । और फिर जिन देवालयों का निर्माण श्री राधाकृष्ण मिलित वपु श्री कृपालु महाप्रभु के संरक्षण में हुआ हो, जिन्होंने स्वयं श्री युगल विग्रहों की प्राणप्रतिष्ठा की हो उन देवालयों की महिमा क्या होगी ? इनकी महिमा का वर्णन शब्दों में नहीं हो सकता ।
श्री महाराज जी की दिव्य प्राकट्य स्थली में स्थित श्री भक्ति मंदिर, भक्ति महादेवी का ही मूर्त स्वरुप है। जिस भक्ति महादेवी को हम अपने हृदय में धारण करना चाहते हैं, जो भगवान को भी अपने वशीभूत करने में समर्थ हैं, वे ही भक्ति महादेवी इस मंदिर के रूप में मनगढ़ धाम में विराजित हैं जो सदा भुजायें पसारे जीवों के अपने अंक में आने की प्रतीक्षा करती रहती हैं । इस दिव्य मंदिर में भक्ति तत्व की दिव्य तरंगें सदा प्रवाहमान रहती हैं ।
और फिर गुरुधाम में तो समस्त तीर्थ समाहित होते हैं । यहाँ तक कि दिव्य गुरुधाम पर तीर्थ शिरोमणि श्री वृंदावन धाम भी न्यौछावर किया जा सकता है । ऐसी परम पावन भूमि पर यह मंदिर स्थित है । एक तो ये धाम स्वयं ही अलौकिक है, फिर इस धाम में भी हमारे गुरुवर की प्राकट्य स्थली है ये दिव्य भक्ति मंदिर । भक्ति मंदिर का गर्भ गृह ही श्री महाराज जी की प्रमुख प्राकट्य स्थली है श्री महाराज जी ने स्वयं कुछ दोहों के रूप में इसकी महिमा का दिग्दर्शन कराया है –
सेवा भक्ति मंदिर गोविन्द राधे ।
श्रद्धा रति भक्ति तीनों क्रम से दिला दे ॥
हमारे शास्त्रों में जैसी महिमा सत्संग की गाई गई है –
सतां प्रसंगान मम वीर्य संविदो , भवन्ति हृत्कर्ण रसायना: कथा:। तज्जोषणादा श्वपवर्ग वर्त्मनि श्रद्धा रतिर्भक्ति रनुक्रमिष्यति।
( भागवत 3/25/25)
अर्थात् महापुरुषों के निरंतर सान्निध्य से धीरे धीरे स्वत: ही जीवों के हृदय में क्रमश: श्रद्धा, प्रेम, व भक्ति उत्पन्न होने लगती है।
ठीक यही प्रभाव जो सत्संगति का यहाँ बताया गया है वही प्रभाव महापुरुषों द्वारा निर्मित देवालयों का भी होता है । उन मंदिरों के सेवन से धीरे धीरे स्वत: ही श्रद्धा, प्रेम, भक्ति क्रमश: प्राप्त होते हैं । यही श्री महाराज जी उपर्युक्त दोहे में बता रहे हैं ।
पुन: वे कहते हैं –
मेरा भक्ति मंदिर गोविन्द राधे ।
भक्ति दिला दे भगवान मिला दे ॥
मेरा भक्ति मंदिर गोविन्द राधे ।
भक्ति रहित को भी भक्त बना दे ॥
मेरा भक्ति मंदिर गोविन्द राधे ।
भक्त बना दे भगवान से मिला दे ॥
हमारा ये भक्ति मंदिर युगों – युगों तक भक्ति की अज्रस धारा प्रवाहित करता रहेगा ।

इसी प्रकार श्री महाराज जी द्वारा श्री वृंदावन धाम में निर्मित प्रेम मंदिर भी पंचम पुरुषार्थ प्रेम का ही साक्षात स्वरूप है । इसी प्रेम तत्व की महिमा को जगत में प्रकाशित करने के लिए ही श्री महाराज जी ने इसका नाम प्रेम मंदिर रखा है ।
प्रेमाधीन ब्रह्म श्याम वेद ने बताया ।
याते याय नाम प्रेम मंदिर धराया ॥
श्री महाराज जी द्वारा किये गये इन मंदिरों के नामकरण भी अद्वितीय हैं । संसार में अन्य मंदिरों के नाम या तो भगवान से संबद्ध होते हैं यथा लक्ष्मीनारायण मंदिर, श्री राधा वल्लभ मंदिर इत्यादि या फिर साधारण मनुष्य जो इन मंदिरों का निर्माण करवाते हैं वे प्रसिद्धि के लिए अपने नामों पर इनका नामकरण करते हैं यथा बिड़ला मंदिर, जे. के. मंदिर । लेकिन बहुत कम लोग ही जानते हैं कि भगवान को भी अपने वश में कर लेने वाला प्रेम तत्त्व भगवान से भी बड़ा है । इसीलिए इसी प्रेम तत्व की महत्ता को जगत में प्रकट करने के लिए इस मंदिर का नाम प्रेम मंदिर रखा, इसी प्रकार प्रेम का ही पर्याय है भक्ति जो भगवान से भी बड़ी है इसीलिए मनगढ़ में स्थित मंदिर का नाम भक्ति मंदिर रखा । ऐसे अद्भुत भगवत्स्वरूप मंदिर विश्व में और कहीं नहीं हैं, कुछ मंदिर बहिरंग रूप से दिखने में भव्य हो सकते हैं लेकिन चूंकि वो किसी महापुरुष द्वारा निर्मित नहीं है, वहाँ के विग्रह किसी महापुरुष द्वारा प्रतिष्ठित नहीं हैं इसलिए वहाँ से वो अलौकिक रस नहीं मिल सकता जो श्री महाराज जी का सान्निध्य प्राप्त इन धरोहरों में है।
यद्यपि समस्त देवालय परम पवित्र एवं वंदनीय होते हैं क्योंकि 'प्रभु व्यापक सर्वत्र समाना' इसलिए कोई मंदिर छोटा बड़ा नहीं होता लेकिन फिर भी जैसे भगवान तो कण कण में व्याप्त हैं –
देश काल अरु विदिसहुँ माहीं । कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं
ऐसा कौनसा स्थान हैं, कौनसा कण है , जहाँ भगवान नहीं हैं । वो तो पाखाने में भी हैं, मयखाने में भी हैं, सर्वत्र हैं लेकिन फिर भी मयखाने और मंदिर में अंतर हो जाता है । जो लाभ हम मंदिर के आध्यात्मिक वातावरण में जाकर ले सकते हैं वो मयखाने में जाकर नहीं ले सकते जब तक कोई बहुत उच्च कोटि का साधक या सिद्ध न हो । इसी प्रकार मंदिर मंदिर में भी अंतर होता है, विग्रह विग्रह में भी अंतर हो जाता है ।
जो मंदिर जो विग्रह किसी महापुरुष द्वारा प्रकटित होते हैं, प्रतिष्ठित होते हैं उनके दर्शन, स्पर्श, प्रदक्षिणा इत्यादि से विशेष लाभ प्राप्त होता है जो अन्य साधारण मनुष्यों द्वारा निर्मित मंदिरों से नहीं होता ।
भक्ति मंदिर व प्रेम मंदिर श्री महाराज जी द्वारा समस्त विश्व को प्रदत्त अनमोल धरोहर हैं दिव्य प्रेमोपहार हैं । जितने लोग यहाँ दर्शन करने के लिए आते हैं यहाँ के अलौकिक वातावरण से अभिभूत हो जाते हैं । श्री राधाकृष्ण एवं युगल सरकार श्री सीताराम के दर्शन करके मंत्रमुग्ध हो जाते हैं । और बरबस कह उठते हैं कि प्रभु की ऐसी अनुपम छवि तो हमने कहीं नहीं देखी, प्रेम मंदिर के दर्शन करके तो लोग यहाँ तक कहते हैं ये तो ऐसा प्रतीत होता है मानो गोलोक से ही नीचे उतरा है किसी ने बनवाया नहीं है ।
इन सभी दिव्य अनुभूतियों का कारण श्री महाराज जी की दिव्यता ही है । भगवत्स्वरूप श्री कृपालु महाप्रभु ने स्वयं अपने सान्निध्य में इन युगल विग्रहों की प्राण – प्रतिष्ठा करवाई है, हर विधि - विधान में वे स्वयं सम्मिलित हुए हैं । मंदिर की नींव रखने से लेकर शिखर स्थापना एवं ध्वजारोहण तक प्रत्येक क्रिया के साक्षी बने हैं, कलश, ध्वजा इत्यादि सभी वस्तुओं को उनका दिव्य स्पर्श प्राप्त हुआ है । इसलिए यहाँ का एक – एक कण दिव्य है, उन्होंने स्वयं अनेकों बार इन्हीं मंदिरों में बैठकर संकीर्तन रस बरसाया है, प्रवचन दिया है।
हमें शिक्षा देने के लिए स्वयं दोनों समय ( प्रात: व संध्या ) मंदिर आकर स्वयं युगलरूप होकर भी इन युगल विग्रहों को प्रणाम किया है, इनके श्रृंगार का निरीक्षण किया है, निर्देशन दिये हैं, हर पर्व पर इनका अभिषेक किया है, आरती उतारी है, साधकों को साथ लेकर प्रदक्षिणा
की है । स्वयं अपने करकमलों से गंगाजल इत्यादि द्वारा इन मंदिरों का मार्जन किया है।
श्री महाराज जी द्वारा प्रतिष्ठित इन दिव्य विग्रहों के दर्शन अगर कोई समाहित चित्त होकर करे तो जिनके नेत्रों से प्रेम रस छलक रहा है ऐसे श्री युगलसरकार को साक्षात अपने समीप ही पायेगा ।
श्री महाराज जी के सत्य संकल्प का, उनकी अकारण करुणा का ही जीवंत स्वरूप हैं ये मंदिर ।
श्री कृपालु महाप्रभु द्वारा प्रतिष्ठित इन मंदिरों के दिव्य विग्रह पाषाण हृदय व्यक्तियों के भीतर भी बरबस प्रेम रस का संचार कर देते हैं ।
इन दोनों मंदिरों के कण – कण को जगद्गुरूत्तम का स्पर्श प्राप्त है, उनका सान्निध्य प्राप्त है यहाँ के युगल विग्रह उन्हीं के द्वारा प्रतिष्ठित हैं इसलिए जो अलौकिक शक्ति अथवा विलक्षण रस इन मंदिरों में है, पापों को नष्ट करने की, हमारे मलिन अंत:करणों को पावन बनाने की जो शक्ति इन मंदिरों में हैं वो किसी साधारण मनुष्य द्वारा बनवाये गये मंदिरों मे नहीं हो सकती ।
यद्यपि भगवान वहाँ भी हैं , कण – कण में व्याप्त हैं और साधकों की भावना के अनुरूप ही उनको फल भी मिलता है लेकिन फिर भी रस वैलक्षण्य है, शक्ति भेद है। वही भेद जो ब्रह्म व भगवान के स्वरूपों में अभेद होते हुए भी ब्रह्मानंद व प्रेमानंद में बताया गया है ।
प्रेमानंद बिंदु पर वारौं कोटि ब्रह्मानंद ( श्री महाराज जी ) प्रेमानंद के एक बिंदु पर करोडों ब्रह्मानंद न्यौछावर किये जा सकते हैं यद्यपि दोनों अनंत मात्रा के दिव्यानंद हैं उनमें छोटे बड़े का प्रश्न नहीं हो सकता तथापि इतना अन्तर है
ब्रह्मानंदो भवेदेष चेत्परार्ध गुणीकृत:
नैति भक्ति सुखाम्भोधे: परमाणुतुलामपि ( भक्ति रसामृत सिंधु )
अर्थात् परार्ध से गुणा किये जाने पर भी ब्रह्मानंद प्रेमानंद के एक कण के समान भी नहीं हो सकता । ऐसा ही रस अथवा शक्ति भेद श्री महाराज जी द्वारा निर्मित मंदिरों व अन्य साधारण मनुष्यों द्वारा निर्मित मंदिरों में हैं ।
अन्य कई उदाहरणों द्वारा भी इस भेद को समझा जा सकता है यथा भगवान का दिव्य देह सच्चिदानंद स्वरूप होता है, उनके प्रत्येक अंग की माधुरी नित्य नवायमान है । फिर भी सभी अंग "आनंदमात्रकरपादमुखोदरादि" अर्थात् आनंद तत्व से निर्मित होते हुए भी समस्त शास्त्रों में भगवान के चरणों की महिमा विशेष रूप से गाई गई है । ऐसे ही समस्त देवालयों में अभेद होते हुए भी श्री महाराज जी द्वारा निर्मित देवालय विशिष्ट हैं ।
जैसे वही एक भगवन्नाम एक साधारण मनुष्य के मुँह से सुना जाये और वही राधे नाम एक महापुरुष के मुखारविंद से श्रवण किया जाये तो उस नाम की मधुरता में उसकी शक्ति में आकाश पाताल का अन्तर हो जाता है । यद्यपि राधे नाम वही है अनंत शक्ति संपन्न लेकिन फिर भी किसी महापुरुष के मुखारविंद से नि:सृत होने पर उसकी विलक्षणता उसकी अलौकिकता का अलग ही प्रभाव पड़ता है, उनकी वाणी सीधे हमारे हृदय को जाकर भेदती है, अपनी ओर खींचती है । एक विलक्षण रस का ही आस्वादन हम करते हैं ।
ऐसे ही समस्त मंदिरों में अभेद होते हुए भी, किसी महापुरुष द्वारा प्रकटित मंदिरों, उनके द्वारा प्रतिष्ठित विग्रहों में विशेषता, विलक्षणता भिन्न होती है, फिर यहाँ तो स्वयं युगलस्वरूप जगद्गुरूत्तम द्वारा ये मंदिर निर्मित है ऐसे में इन अतुलनीय मंदिरों की महिमा का वर्णन शब्दों में किस प्रकार हो सकता है ?
इन दिव्य मंदिरों में श्री कृपालु महाप्रभु के दिव्य वपु की, उनकी दिव्य वाणी की दिव्य तरंगे सदा प्रवाहित होती रहती हैं। उन्हीं दिव्य तरंगों के पुंज स्वरुप ही हैं ये परम पावन देवालय ।
इसलिए जो लाभ हम इनके सेवन से ले सकते हैं वो अन्यत्र मिलना दुर्लभ है ।
ऐसे ही एक अद्वितीय मंदिर ‘कीर्ति मंदिर’ का निर्माण रंगीली महल, बरसाना में हो रहा है जो शीघ्रातिशीघ्र पूर्ण होने वाला है । यह अनुपमेय मंदिर समस्त विश्व में कीर्ति मैया का प्रथम मंदिर होगा जिन्हें महारास रस की अधिष्ठात्री राधारानी की जननी बनने का गौरव प्राप्त हुआ । यहाँ किशोरी जी कीर्ति मैया की गोद में अपने बालरुप में दर्शन देकर भक्तों को कृतार्थ करेंगी

अस्तु , हम सभी को श्री महाराज जी द्वारा निर्मित इन देवालयों का महत्व समझकर, बारंबार इनका सेवन करके अपने अंत:करण को शुद्ध करने का प्रयास करना चाहिए ।
श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय।
श्रीमद् युगल सरकार की जय।
श्री प्रेम मंदिर की जय।
श्री भक्ति मंदिर की जय।
श्री कीर्ति मंदिर की जय।

----#सुश्रीश्रीधरीदीदी{प्रचारिका,जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज}.
यह मनुष्य का शरीर बार–बार नहीं मिलता। दयामय भगवान् चौरासी लाख योनियों में भटकने के पश्चात् दया करके कभी मानव देह प्रदान करते हैं। मानव देह देने के पूर्व ही संसार के वास्तविक स्वरूप का परिचय कराने के लिए गर्भ में उल्टा टाँग कर मुख तक बाँध देते हैं। जब गर्भ में बालक के लिए कष्ट असह्य हो जाता है तब उसे ज्ञान देते हैं और वह प्रतिज्ञा करता है कि मुझे गर्भ से बाहर निकाल दीजिये, मैं केवल आपका ही भजन करूँगा । जन्म के पश्चात् जो श्यामसुन्दर को भूल जाता है, उसकी वर्तमान जीवन में भी गर्भस्थ अवस्था के समान ही दयनीय दशा हो जाती है। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि यह मानव देह देवताओं के लिये भी दुर्लभ है, इसीलिये सावधान हो कर श्यामसुन्दर का स्मरण करो |
( प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त–माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति।
कुछ समय का नियम बनाकर प्रतिदिन श्यामसुंदर का स्मरण करते हुए रोकर उनके नाम-लीला-गुण आदि का संकीर्तन एवं स्मरण करो एवं शेष समय में संसार का आवश्यक कार्य करते हुए बार-बार यह महसूस करो कि श्यामसुंदर हमारे प्रत्येक कार्य को देख रहें हैं, और उन्हें आप दिखा-दिखा कर कार्य कर रहे हैं। इस प्रकार कर्म भी न्यायपूर्ण होगा एवं थकावट भी न होगी। एक बार करके देखिये।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

जगद्गुरु वंदना:
भक्तियोगरसावतार भगवतीनंदन सद्गुरु के मार्गदर्शन में भक्तियोग की साधना करने वाले भक्तों द्वारा भक्ति स्वरुप गुरुवर को कोटि कोटि प्रणाम।
भक्ति की अविरल धारा प्रवाहित करके असंख्य जीवों का कल्याण करने वाले सदगुरु देव को कोटि कोटि प्रणाम।
भक्ति महादेवी को जन जन के हृदय में स्थापित करके भक्तियोग रसावतार स्वरुप को प्रमाणित करने वाले भक्तिरस सिंधु प्रिय गुरुवर को सहस्त्रों भक्तों का भक्ति युक्त प्रणाम।
साधना का प्राण 'रूपध्यान' है, यह बुद्धि में बैठा कर श्री श्यामा श्याम की मनोमयी मूर्ति सबके हृदय में प्रतिष्ठापित करने हेतु असंख्य कीर्तन,पद,दोहे लिखकर ,उनका मधुर गान कराने वाले संकीर्तन सम्राट ,प्रेम रस रसिक प्रिय गुरुवर को कोटि कोटि प्रणाम।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...