Wednesday, October 11, 2017

मन एवं सांसारिक पदार्थ सजातीय होने के कारण एक दूसरे के सहयोगी हैं।
----श्री महाराजजी।

उस ईश्वर को युगों तक परिश्रम करके भी कोई नहीं जान सकता है किंतु उस ईश्वर की जिस पर कृपा हो जाती है वह उसे पूर्णतया जान लेता है एवं कृतार्थ हो जाता है। सर्वात्म-समर्पण से मुक्ति एवम् भगवत्कृपा का लाभ हो सकता है। हमें ईश्वर के शरणागत हो जाना है ऐसी शरणागत के आधार पर ही ईश्वर कृपा निर्भर है। जो-जो जीव आत्माएं उसके शरणागत हो गई, वह-वह अपने परम चरम लक्ष्य परमानंद को प्राप्त कर चुकी हैं एवम् जो शरणागत नहीं हुई है उन्ही के ऊपर ईश्वर की कृपा नहीं हुई है एवं वही अपने लक्ष्य से वंचित होकर 84 लाख योनियो में काल, कर्म, स्वभाव, गुणाधीन होकर चक्कर लगा रही हैं।
---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Spend every second of your life in Meditation(Sadhana) and in service of God and Guru. You may not have today's opportunity again, you may not have human body again. Right now, you have the human body and have also found the Guru. Then why are you careless?
The golden opportunity that you have will not come again so easily, Think about it.
एक साधक का प्रशन:- भगवान् सर्वव्यापक होते हुए भी अभी तक क्यों नहीं मिले ?

श्री महाराज जी द्वारा उत्तर:- तुमने चाहा नहीं ! चाहने में अनेक स्तर हैं । ऐसा चाहो कि उसके पाये बिना रहा न जाय । उससे मिले बिना एक क्षण युग के समान लगे । जैसे - जैसे व्याकुलता बढ़ेगी तुम भगवान् के पास पहुँचते जाओगे। व्याकुलता ही श्याम मिलन का आधार है । अपने को अधम पतित मान कर मनुहार करो और आँसू बहाकर भगवान् के निष्काम प्रेम कि याचना करो । संसार न माँगो। तब भगवान् महापुरुष के द्वारा अपना दिव्य स्वरूप दिखायेंगे।

कृपासिन्धु गुरुवर तो किसी से कुछ अपेक्षा ही नहीं करते वो तो पुनः-पुनः यही कहते हैं कि मुझे प्रसन्न करना चाहते हो, मुझे बधाई देना चाहते हो तो एक ही प्रतिज्ञा करो-
श्यामा श्याम नाम रुप लीला गुण धामा ।
गाओ रोके रुपध्यान युक्त आठों यामा ॥

हर क्षण , हर पल, श्री महाराजजी का चिन्तन, मनन, स्मरण यही रहता है किस प्रकार कलियुग में इन जीवों का निरन्तर हरि-गुरु स्मरण हो और ये निष्काम अनन्य भक्ति द्वारा शीघ्रातिशीघ्र अपने लक्ष्य को प्राप्त करें।

Tuesday, September 5, 2017

अरे मूर्ख मन ! इस परम अन्तरंग तत्वज्ञान को समझ ले। तीन तत्व नित्य हैं – पहला ईश्वर, दूसरा जीव, एवं तीसरा तत्व माया । इनमें माया चिदानन्दमय ईश्वर की जड़ शक्ति है एवं जीव चिदानन्दमय ईश्वर का सनातन दास है, जिसे वेदादिकों में अंश शब्द से विहित किया गया है। जीवात्मा देही है तू उसको देह मान रहा है, बस यही अनादिकालीन तेरा अज्ञान है । जो इस बात को जितना जान लेता है, उतना ही उस पर विश्वास भी कर लेता है, उसके जानने की यही पहिचान है। पुन: जो जितनी मात्रा में उपर्युक्त बात पर विश्वास कर लेता है, उतनी ही मात्रा में अपने आप उसका श्यामसुन्दर के चरणों में अनुराग हो जाता है।‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं :- अरे मन ! अब मनमानी छोड़ दे, एवं मनमोहन में रूपध्यान द्वारा अपने आप को अनुरक्त कर ।
( प्रेम रस मदिरा: सिद्धान्त–माधुरी )
---जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
--- सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति।

Shri Krishn does not need our service, but He kindly accepts it. When Shri Krishn asks us to surrender unto Him (Sarva-dharmaan parityajya maam ekam saranam vraja), this does not mean that Shri Krishn is lacking servants and that if we surrender He will profit. Shri Krishn can create millions of servants by His mere desire. So that is not the point. But, if we surrender to Shri Krishn, we shall be saved, for Shri Krishn says ‘aham tvaam sarva paapebhyo moksayisyami : ‘I shall free you from all sinful reactions’.
Radhey-Radhey.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...