Monday, November 13, 2017


आपको परमानन्द प्राप्त करना है। परमानन्द एक मात्र ईश्वर में ही है , अतएव ईश्वर को प्राप्त करना है।
ईश्वर इन्द्रिय , मन , बुद्धि से अप्राप्य है किन्तु वह जिस पर कृपा कर देता है , वह उसे प्राप्त कर लेता है।
उसकी कृपा शरणागत पर ही होती है। शरणागति मन की करनी है। मन अनादिकाल से संसार में ही सुख मानता आया अतएव संसार का स्वरुप गंभीरतापूर्वक समझना है।
संसार का स्वरुप समझकर उस पर बार - बार बिचार करना है यानी मनन करना है।
तब संसार से वैराग्य होगा। अर्थात मन राग-द्वेष-रहित होगा। तब महापुरुष को पहिचानना है।
जब महापुरुष मिल जाय, तब यह प्रशन पैदा होता है कि ईश्वर शरणागति के हेतु कौन - सा मार्ग अपनाया जाय अर्थात ईश्वर प्राप्ति के उपायों को जानना है।


........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

Wednesday, October 11, 2017

प्रारब्ध क्या होता है?
भगवान् हमारे अनंत पुण्य व अनंत पापों में से थोडा-थोडा लेकर हमारे किसी एक जन्म का प्रारब्ध तैयार करते हैं और मानव जीवन के रूप में हमें एक अवसर देते हैं ताकि हम अपने आनंद प्राप्ति के परम चरम लक्ष्य को पा लें।
प्रारब्ध सबको भोगना पड़ता है।
भगवद् प्राप्ति के बाद जब कोई जीव महापुरुष बन जाता है,
तब भगवान् उसके तमाम पिछले जन्मों के एवं उस जन्म के भी समस्त पाप-पुण्यों तो भस्म कर देते हैं, लेकिन वे उसके उस जीवन के शेष बचे हुए प्रारब्ध में कोई छेड़छाड़ नहीं करते।
इसका अभिप्राय यह है कि भगवान् को पा चुके मुक्त आत्मा संतों/भक्तों को भी अपना उस जन्म का पूरा प्रारब्ध भोगना ही पड़ता है।
उसमें इतना अंतर अवश्य आ जाता है कि अब वह नित्य आनंद में लीन रहने से किसी सुख-दुःख की फ़ीलिंग नहीं करता। लेकिन फिर भी एक्टिंग में उसे सब भोगना पड़ता है।

किसी के प्रारब्ध को मिटाना भगवान् के कानून में नहीं है।
वे लोग बहुत भोले हैं, जो यह समझते हैं कि अमुक देवी जी, अमुक बाबा जी अपनी कृपा से मेरे कष्ट को दूर कर देंगे। या मुझे धन, वैभव, पुत्र आदि दे देंगे।
जो प्रारब्ध में लिखा होगा, वह नित्य भगवान् को गालियाँ देने से भी अवश्य मिलेगा।
जो प्रारब्ध में नहीं लिखा होगा, वह दिन-रात पूजा पाठ करने से भी न मिलेगा।

भगवान् की भक्ति करने से संसारी सामान नहीं मिला करता, जीव के प्रारब्ध जन्य दुःख दूर नहीं होते, बल्कि भक्ति से तो स्वयं भगवान् की ही प्राप्ति हुआ करती है।
यह बात अलग है कि कोई मूर्ख अपनी भक्ति से भगवान् को पा लेने पर भी वरदान के रूप में उनसे उन्हीं को न माँगकर संसार ही माँग बैठे।
यहाँ यह बात भी विचारणीय है कि जिसको भगवान् की प्राप्ति हो चुकी, उसके लिए प्रारब्ध के सुख-दुःख खिलवाड़ मात्र रह जाते हैं।
...........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

एक साधक का प्रश्न :- भगवान् का चिन्तन कैसे होगा ?
श्री महाराज जी द्वारा उत्तर :- भगवान् का चिन्तन होता नहीं है , करना पड़ता है। जो कुछ होता है वह पहले का किया हुआ चिन्तन हो रहा है। संसार का चिन्तन बिना किये हो जाता है क्योंकि पहले का हमारा अभ्यास है। अब यदि भगवान् का चिन्तन करना है तो उसका अभ्यास प्रारंभ करना होगा। अभ्यास द्वारा वह भी होने लगेगा।

O mind! Absorb yourself in chanting the holy name of 'Shri RadhaRani'. This human body is short-lived and can be snatched away at any moment.
----- Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj.

तुम लोग अपने मन को अपने शरण्य में रखो। परस्पर प्यार से रहो एवं स्वयं में दोष देखो, अपनी-अपनी सेवा करो। यदि मुझे सुख देना चाहते हो तो, सदा अपने मन को राग द्वेष रहित रखो एवं शरण्य से प्यार बढ़ाओ। मैं सदा तुम लोगो को याद करता हूँ, तथा एक-एक क्षण का आइडिया नोट करता हूँ। वेद से लेकर रामायण तक अनंत कोटि-कल्प तक अध्ययन करके देख लो यही पाओगे कि गुरु और भगवान एक ही है अत: गुरु सेवा ही सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य है।
****जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाप्रभु ****

People just lie that God fulfils their every desire, because they ignorantly think that any benefit received as a result of one’s destiny is due to God’s grace. There is some benefit in this belief because the individual realises God’s grace on this basis. But the harmful consequence of this belief is that, when the material desires are not fulfilled, this faith in God immediately disappears.
.....SHRI MAHARAJJI.

एक साधक का प्रश्न - क्या प्रेम किसी साधना से मिल सकता है ?
श्री महाराज जी द्वारा उत्तर : असंभव ।श्री कृष्ण का प्रेम नित्य सिद्ध है , वो साधन साध्य नहीं है । कोई भी साधन श्री कृष्ण प्रेम का मूल्य नहीं हो सकता । क्योंकि वो प्रेम तो दिव्य है जिसके स्वयं श्री कृष्ण भी आधीन रहते हैं । तो कौन साधन से कोई उसको पा लेगा ? क्योंकि साधन जो भी होगा , वो इन्द्रिय ,मन , बुद्धि से होगा अर्थात मायिक होगा । उस मायिक साधना से दिव्य वस्तु कैसे मिलेगी ? भगवान् ही नहीं , उनका दर्शन भी असंभव है फिर उनका प्रेम तो और भी अधिक मूल्यवान है।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...