Monday, November 13, 2017

मेरे प्रिय साधक ,
तत्वज्ञान तो इतना ही है कि सेवक धर्म में केवल सेव्य की इच्छानुसार सेवा करना है। किन्तु अभ्यास एवं वैराग्य से ही सेवा का सही रूप बनेगा। अभ्यास यह है कि क्षण - क्षण सावधान रहो। वैराग्य यह कि शरीर के सुखों की इच्छा न हो। स्टेशन मास्टर या कारखाने का कर्मचारी रात भर नहीं सोता। बीमार शिशु की माँ रात भर नहीं सोती। यह महत्व मानने पर निर्भर करता है। लापरवाही ही अनन्त जन्म नष्ट कर चुकी है। अतः तत्वज्ञानी को परवाह करनी चाहिए। यह सौभाग्य सदा न मिलेगा। जब तक मिला है परवाह करके ले लें।

---तुम्हारा जगद्गुरु कृपालु।

दीनानाथ मोहिं काहे बिसारे । हमरिहिं बार मौन कस धारे।
नाथ ! अगति के गति अनाथ हम, कहहु कौन गति मोरि विचारे।
गणिका गीध अजामिल आदिक, सुनत अमित पतितन तुम प्यारे।
इन सम अगनित पतित रोम प्रति, वारत पतित विरद रखवारे ।
दंभ कोटि शत कालनेमि सम, कोटिन रावन सम मद धारे ।
लाजहुँ जासु लजाति अधम अस, हैं न हुये न तु ह्वैहैं भारे ।
कौने मुख ‘कृपालु’ प्रभु सन कछु, कहिय नाथ अब हाथ तिहारे ।।

भावार्थ:– हे श्यामसुन्दर ! तुमने मुझे क्यों भुला दिया ? हमारी ही बार कैसे मौन धारण कर लिया ? हे नाथ ! हम अनाथ हैं और तुम अगति–के गति हो । बताओ तो सही, तुमने हमारे लिए क्या सोचा है ? गणिका ( वेश्या ), गीध, अजामिल इत्यादि अनन्त पापियों से तुमने प्यार किया है, ऐसा सुनता हूँ । किन्तु हे पतितों की रक्षा का भार लेने वाले ! पतित – पावन विरद को धारण करने वाले ! इन सरीखे तो अनन्त पापी मेरे प्रत्येक रोम पर न्यौछावर किये जा सकते हैं । फिर मेरा क्या होगा ? सैकड़ों करोड़ कालनेमि के समान मेरे अन्दर पाखण्ड भरा हुआ है, एवं करोड़ों रावण के समान अभिमानी भी हूँ । कहाँ तक कहूँ, जिसके पापों को देखकर लज्जा भी लज्जित है । मुझ सरीखा पापी न तो इस समय है, न पहले हुआ था, न तो आगे ही हो सकता है । ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि मैं इतना बड़ा अपराधी हूँ कि कौन सा मुँह लेकर आपके आमने कुछ कहने का अधिकार रखूँ। हे नाथ ! अब आप ही के हाथ में सब कुछ है, चाहे अपनाइए, चाहे ठुकराइए।
( प्रेम रस मदिरा: दैन्य–माधुरी )
--- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति।

सहनशीलता बढ़ानी है। किसी के भी निंदनीय शब्द से अथवा व्यवहार से मन में अशांति न हो । बस यही साधना एवं दीनता है। किसी की निरर्थक बात को न सुनना है, न सोचना है। यदि कोई दुराग्रह करके या अन्य कुसंग द्वारा अपना पतन करना ही चाहता है तो भगवान और महापुरुष क्या कर सकते हैं।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
जगत की प्राप्ति जीव का लक्ष्य नहीं हैं। जीव भगवान् का अंश है अतः अपने अंशी को प्राप्त कर ही आत्मा की शांति को प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार का वास्तविक विवेक गुरु की कृपा से ही प्राप्त होता है। ऐसा विवेक जाग्रत करने वाले गुरु को अपने करोड़ों प्राण देकर भी कोई उनके ऋण से उऋण होना चाहे तो यह जीव का मिथ्या अभिमान है।
!! जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज !!

ऊधो ! कहि दीजो बलभ्रात।
जैसी प्रीति करी तुम मोते, तैसी कहुँ न सुनात ।
एक प्रेम लखि प्रेम करत जग, सब देखत दिन – रात ।
इक बिनु प्रेमहिं प्रेम करत जग, सब जानत पितु मात ।
इन दोउन सों रहित न काहुहिं, करत प्रेम इक तात ।
तुम ‘कृपालु’ नहिं इन तीनिउ महँ, सब अटपट तव बात ।।

भावार्थ – ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेश भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव ! प्राणवल्लभ श्यामसुन्दर से कह देना कि उन्होंने जिस प्रकार का प्रेम हम लोगों से किया है उस प्रकार का प्रेम कहीं सुनने में नहीं आता | अब तीन प्रकार के ही प्रेम विख्यात थे | एक तो वह जो दूसरे के प्रेम को देखकर प्रेम करते हैं | इसी को स्वार्थ का प्रेम भी कहते हैं | दूसरा प्रेम वह जिसमें बिना किसी के प्रेम किये ही प्रेम किया जाय | इस प्रकार का प्रेम सभी के माता – पिता ( नवजात शिशु से ) करते हैं | तीसरा वह है जो प्रेम करने वाले अथवा प्रेम न करने वाले दोनों से ही उदासीन रहता है | ऐसा प्रेमहीन हृदय आत्माराम, आप्तकाम, गुरुद्रोही एवं कृतघ्नी लोगों को होता है | ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में सखियाँ कहती हैं कि उद्धव ! उनसे कहना कि तुम तो इन तीनों प्रेम से पृथक् हो | तुम्हारी सभी बात अटपटी है।
( प्रेम रस मदिरा विरह – माधुरी )
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति।
अगर भगवान् या महापुरुष कृपा कर दें कि सबका भगवद् चिन्तन होने लगे, तो ये संसार ही क्यों रहता । किसी को कुछ करने के लिये वेद-पुराण आदेश क्यों देते कि तुम ऐसा करो, ऐसा करो, ऐसा न करो । भगवान् ही सोच लेते, कृपा कर देते तो सब जीवों का कल्याण हो जाता। भगवान् या महापुरुष की कृपा यही है कि हमको सही मार्ग बता दें। उसके बाद उस पर चलता, ये कृपा हम लोगों को करनी पडेगी। ये कृपा भगवान् या महापुरुष नहीं करेंगे । उनके पास और है क्या, कृपा के सिवा । वो तो कृपा ही करते हैं, उनकी कृपा को REALISE करना ये हमारा काम है।

------सुश्री श्रीधरी दीदी (प्रचारिका),जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
कृपालु गुरुवर हैं रखवार हमारों......!!!!!
श्री महाराजजी हम साधकों के लिए 'साक्षात राधारानी' का ही रूप हैं, सर्वजन कल्याणार्थ उनको जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु का रूप धारण करना पड़ा। हमारे कल्याण के लिए ये भारत में वर्षों तक अनेक स्थानों पर प्रवचन देते रहे। भक्तो के बीच प्राय: प्रवचन,पदगान,पद व्याख्या आदि कर हमें वेद-वेदान्त एवं निगमागम आगम सिद्धांतो से अवगत कराते रहें हैं। मैं(जीव), ये (माया),और वह(भगवान),संबंध,अभिधेय एवं प्रयोजन आदि का ज्ञान जिस प्रकार हमारे गुरुदेव बोधगम्य कराते हैं, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। उनकी कृपा और सत्संग से ही उनके बारे में जाना जा सकता है।
हमारे रखवार(श्री कृपालु महाप्रभु) हमें साधना कैसे करें,साधक सावधानी,दिव्यादेश! आदि देकर भी कृतार्थ करते रहते हैं।एक वस्तु में दूसरे वस्तु की भावना करने से भावना का फल नहीं मिलता,वस्तु नहीं बदल जाती परंतु कहीं भी किसी वस्तु में भगवद भावना का फल मिलता है। गुरुदेव के ये सिद्धान्त ये निर्देश हैं कि जहां-जहां मन भटके वहाँ वहाँ श्याम सुंदर को खड़ा कर दो। सदा सर्वत्र हरि-गुरु को साथ मानो,कितने सार्थक और उपयोगी हैं।
रसिक संत कि क्रिया,मुद्रा कोई समझ नहीं सकता उसको महाप्रभु गुरु रूप में चरितार्थ करते रहते हैं। वे हमे गोलोक की भी अग्रिम पंक्ति में बिठाना चाहते हैं।अत: साधक जैसे जैसे भक्ति मार्ग में अग्रसर होता है उसकी परीक्षाएँ कठिन होती जाती हैं,गुरुधाम सघन प्रशिक्षण केंद्र में परिवर्तित होने लगता है,गुरु व्यवहार समझ में नहीं आता,वातावरण और परिस्थिति प्रतिकूल एवं विपरीत होने लगती हैं। ऐसे में ही बस साधक को गुरु वचनों पर दृढ़ निष्ठा रख कर सर्वत्र हरि-गुरु को खड़ा कर अपने साथ-साथ समझ संयम रखकर हरि-गुरु के निर्देशानुसार व्यवहार करना चाहिए।कहना और लिखना बहुत आसान है पर ऐसी परीक्षाओं से गुजरना आसान नहीं है।साधक यदि विफल भी रहता है तो पुन: प्रयत्न करता है और प्रत्येक परीक्षा के बाद वह अनुभव करता है की वो और निखर गया है। इसलिए निराशा कभी नहीं लाना है। हमारे गुरुदेव परीक्षा तो लेंगे ही परंतु टूटने या बिखरने नहीं देते। हम भी आश्वस्त हैं क्योंकि स्वयं हरि अवतारी जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु(महाराजजी),हमारे रखवार सदा हमारा योगक्षेम वहन कर रहे हैं।

जय श्री राधे।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...