This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Monday, November 13, 2017
मेरे प्रिय साधक ,
तत्वज्ञान तो इतना ही है कि सेवक धर्म में केवल सेव्य की इच्छानुसार सेवा
करना है। किन्तु अभ्यास एवं वैराग्य से ही सेवा का सही रूप बनेगा। अभ्यास
यह है कि क्षण - क्षण सावधान रहो। वैराग्य यह कि शरीर के सुखों की इच्छा न
हो। स्टेशन मास्टर या कारखाने का कर्मचारी रात भर नहीं सोता। बीमार शिशु की
माँ रात भर नहीं सोती। यह महत्व मानने पर निर्भर करता है। लापरवाही ही
अनन्त जन्म नष्ट कर चुकी है। अतः तत्वज्ञानी को परवाह करनी चाहिए। यह
सौभाग्य सदा न मिलेगा। जब तक मिला है परवाह करके ले लें।
---तुम्हारा जगद्गुरु कृपालु।
---तुम्हारा जगद्गुरु कृपालु।
दीनानाथ मोहिं काहे बिसारे । हमरिहिं बार मौन कस धारे।
नाथ ! अगति के गति अनाथ हम, कहहु कौन गति मोरि विचारे।
गणिका गीध अजामिल आदिक, सुनत अमित पतितन तुम प्यारे।
इन सम अगनित पतित रोम प्रति, वारत पतित विरद रखवारे ।
दंभ कोटि शत कालनेमि सम, कोटिन रावन सम मद धारे ।
लाजहुँ जासु लजाति अधम अस, हैं न हुये न तु ह्वैहैं भारे ।
कौने मुख ‘कृपालु’ प्रभु सन कछु, कहिय नाथ अब हाथ तिहारे ।।
नाथ ! अगति के गति अनाथ हम, कहहु कौन गति मोरि विचारे।
गणिका गीध अजामिल आदिक, सुनत अमित पतितन तुम प्यारे।
इन सम अगनित पतित रोम प्रति, वारत पतित विरद रखवारे ।
दंभ कोटि शत कालनेमि सम, कोटिन रावन सम मद धारे ।
लाजहुँ जासु लजाति अधम अस, हैं न हुये न तु ह्वैहैं भारे ।
कौने मुख ‘कृपालु’ प्रभु सन कछु, कहिय नाथ अब हाथ तिहारे ।।
भावार्थ:– हे श्यामसुन्दर ! तुमने मुझे क्यों भुला दिया ? हमारी ही बार
कैसे मौन धारण कर लिया ? हे नाथ ! हम अनाथ हैं और तुम अगति–के गति हो ।
बताओ तो सही, तुमने हमारे लिए क्या सोचा है ? गणिका ( वेश्या ), गीध,
अजामिल इत्यादि अनन्त पापियों से तुमने प्यार किया है, ऐसा सुनता हूँ ।
किन्तु हे पतितों की रक्षा का भार लेने वाले ! पतित – पावन विरद को धारण
करने वाले ! इन सरीखे तो अनन्त पापी मेरे प्रत्येक रोम पर न्यौछावर किये जा
सकते हैं । फिर मेरा क्या होगा ? सैकड़ों करोड़ कालनेमि के समान मेरे अन्दर
पाखण्ड भरा हुआ है, एवं करोड़ों रावण के समान अभिमानी भी हूँ । कहाँ तक
कहूँ, जिसके पापों को देखकर लज्जा भी लज्जित है । मुझ सरीखा पापी न तो इस
समय है, न पहले हुआ था, न तो आगे ही हो सकता है । ‘श्री कृपालु जी’ कहते
हैं कि मैं इतना बड़ा अपराधी हूँ कि कौन सा मुँह लेकर आपके आमने कुछ कहने का
अधिकार रखूँ। हे नाथ ! अब आप ही के हाथ में सब कुछ है, चाहे अपनाइए, चाहे
ठुकराइए।
( प्रेम रस मदिरा: दैन्य–माधुरी )
--- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति।
( प्रेम रस मदिरा: दैन्य–माधुरी )
--- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति।
सहनशीलता
बढ़ानी है। किसी के भी निंदनीय शब्द से अथवा व्यवहार से मन में अशांति न हो
। बस यही साधना एवं दीनता है। किसी की निरर्थक बात को न सुनना है, न सोचना
है। यदि कोई दुराग्रह करके या अन्य कुसंग द्वारा अपना पतन करना ही चाहता
है तो भगवान और महापुरुष क्या कर सकते हैं।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
जगत
की प्राप्ति जीव का लक्ष्य नहीं हैं। जीव भगवान् का अंश है अतः अपने अंशी
को प्राप्त कर ही आत्मा की शांति को प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार का
वास्तविक विवेक गुरु की कृपा से ही प्राप्त होता है। ऐसा विवेक जाग्रत करने
वाले गुरु को अपने करोड़ों प्राण देकर भी कोई उनके ऋण से उऋण होना चाहे तो
यह जीव का मिथ्या अभिमान है।
!! जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज !!
!! जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज !!
ऊधो ! कहि दीजो बलभ्रात।
जैसी प्रीति करी तुम मोते, तैसी कहुँ न सुनात ।
एक प्रेम लखि प्रेम करत जग, सब देखत दिन – रात ।
इक बिनु प्रेमहिं प्रेम करत जग, सब जानत पितु मात ।
इन दोउन सों रहित न काहुहिं, करत प्रेम इक तात ।
तुम ‘कृपालु’ नहिं इन तीनिउ महँ, सब अटपट तव बात ।।
एक प्रेम लखि प्रेम करत जग, सब देखत दिन – रात ।
इक बिनु प्रेमहिं प्रेम करत जग, सब जानत पितु मात ।
इन दोउन सों रहित न काहुहिं, करत प्रेम इक तात ।
तुम ‘कृपालु’ नहिं इन तीनिउ महँ, सब अटपट तव बात ।।
भावार्थ – ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेश भेजती
हुई कहती हैं कि हे उद्धव ! प्राणवल्लभ श्यामसुन्दर से कह देना कि उन्होंने
जिस प्रकार का प्रेम हम लोगों से किया है उस प्रकार का प्रेम कहीं सुनने
में नहीं आता | अब तीन प्रकार के ही प्रेम विख्यात थे | एक तो वह जो दूसरे
के प्रेम को देखकर प्रेम करते हैं | इसी को स्वार्थ का प्रेम भी कहते हैं |
दूसरा प्रेम वह जिसमें बिना किसी के प्रेम किये ही प्रेम किया जाय | इस
प्रकार का प्रेम सभी के माता – पिता ( नवजात शिशु से ) करते हैं | तीसरा वह
है जो प्रेम करने वाले अथवा प्रेम न करने वाले दोनों से ही उदासीन रहता है
| ऐसा प्रेमहीन हृदय आत्माराम, आप्तकाम, गुरुद्रोही एवं कृतघ्नी लोगों को
होता है | ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में सखियाँ कहती हैं कि उद्धव ! उनसे
कहना कि तुम तो इन तीनों प्रेम से पृथक् हो | तुम्हारी सभी बात अटपटी है।
( प्रेम रस मदिरा विरह – माधुरी )
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति।
( प्रेम रस मदिरा विरह – माधुरी )
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति।
अगर
भगवान् या महापुरुष कृपा कर दें कि सबका भगवद् चिन्तन होने लगे, तो ये
संसार ही क्यों रहता । किसी को कुछ करने के लिये वेद-पुराण आदेश क्यों देते
कि तुम ऐसा करो, ऐसा करो, ऐसा न करो । भगवान् ही सोच लेते, कृपा कर देते
तो सब जीवों का कल्याण हो जाता। भगवान् या महापुरुष की कृपा यही है कि हमको
सही मार्ग बता दें। उसके बाद उस पर चलता, ये कृपा हम लोगों को करनी पडेगी।
ये कृपा भगवान् या महापुरुष नहीं करेंगे । उनके पास और है क्या, कृपा के
सिवा । वो तो कृपा ही करते हैं, उनकी कृपा को REALISE करना ये हमारा काम
है।
------सुश्री श्रीधरी दीदी (प्रचारिका),जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
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