Saturday, December 2, 2017

एक साधक का प्रश्न - शरणागति का क्या अर्थ है ?

श्री महाराजजी द्वारा उत्तर - हमें भगवान् की शरणागति करनी है शरणागति का मतलब है कुछ न करना लेकिन अनादिकाल से हम सब कुछ करने के अभ्यस्त है ― इसलिये कुछ न करने की अवस्था पर आने के लिये हमे बहुत कुछ करना है इसी का नाम 'साधना' है । जो भगवान् का दर्शन आदि मिलता है वह सब उसी की शक्ति ही से मिलता है ।
वेदाहमेतं पुरुषं महान्त्मादित्यवर्ण तमसः परस्तात्।
( श्वेता. ३-८ )
इसका रहस्य यह है कि श्रीकृष्ण की बुद्धि से ही श्रीकृष्ण को जाना जा सकता है और वह बुद्धि तभी प्राप्त होगी जब जीव श्रीकृष्ण के शरणापन्न होगा । इसी भाव से गीता कहती है । यथा -
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामु प्यान्ति ते ।।
( गीता १०-१० )
अतः हे बुद्धि देवी ! तुम श्रीकृष्ण की शरण चली जाओ बस - तुम्हारा काम बन जायगा ।
श्रीकृष्ण चरणों में बुद्धि समर्पित करने के पश्चात ही वे अकारण करुण श्रीकृष्ण अपनी कृपा द्वारा दिव्य बुद्धि प्रदान करे देंगे तभी हम उस श्रीकृष्ण बुद्धि से श्रीकृष्ण को जान सकेंगे ।
---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

श्री महाराजजी से प्रश्न:
जो संसार में रहने वाला अविवाहित व्यक्ति साधना करने चलता है ,उसके लिए विवाह करना कहाँ तक सही या गलत है?

श्री महाराजजी द्वारा उत्तर:
शादी का मतलब यह होता है कि अगर सब परिवार स्त्री बच्चे सब भगवान को मानने वाले और एक ही गुरु के द्वारा govern हो रहे हों तो कुछ कुछ ग्रहस्थ में साधना होती है। कुछ कुछ । और तो पहले साधना कर ले कोई व्यक्ति एकांत में,मन को जमा ले भगवान में फिर शादी करे तो danger नहीं है ज्यादा। लेकिन पहले शादी करेगा तो संसार में आसक्त हो जाएगा फिर भगवान की और कहेगा...."देखा जायेगा,बुढ़ापे में करेंगे......करेंगे"। वह एक nature हो जाता है इस प्रकार का तो वह फिर नहीं कर पाता।
और आजकल के वातावरण में तो हर घर में अशांति है। बीबी का कुछ मूड है,बच्चों का कुछ मूड है,बाप बेचारा परेशान रहता है 24 घंटे। शादी से क्या मिला उसको?

हे प्रभु.......!!!
मैं तो सदा से ही माया से भ्रमित होकर आपसे विमुख होकर संसार में भटकता रहा। गुरु कृपा से मेरी मोह निद्रा टूटी। उनके इस उपकार के बदले में मैं कंगाल भला कौन सी वस्तु उन्हें अर्पित कर सकता हूँ। क्योंकि गुरु के द्वारा दिये गये ज्ञान के उस शब्द के बदले सम्पूर्ण विश्व की सम्पति भी उन्हें सौंप दी जाय तो भी ज्ञान का मूल्य नहीं चुकाया जा सकता। ज्ञान दिव्य है और सांसारिक पदार्थ मायिक हैं।

!! जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु !!

Friday, November 24, 2017

जगद्गुरु स्वामी श्री कृपालु जी महाराज हम अधमों को समझाते हैं....!!!
।।...भगवान् की कृपा देखो कि उसने कृपा करके मानव देह दिया, मन में भगवत जिज्ञासा दी, महापुरुष से मिलाया, इन कृपाओं को हम महसूस करें तो हमारा हृदय पत्थर न बना रहे, पिघल जाय...।।
।।...अपने को अधम पतित मानकर मनुहार करो और आँसू बहाकर भगवान् के निष्काम प्रेम की कामना करो। संसार न मांगो। तब भगवान् महापुरुष के द्वारा अपना दिव्य स्वरुप दिखायेंगे...।।
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज ने आज तक किसी को मन्त्रदान नहीं दिया।
अमेरिका में एक बहुत बड़े पादरी(POP) ने महाराजजी से प्रश्न किया की आपके कितने लाख शिष्य है ? तो महाराजजी का जवाब सुनकर वो पादरी आश्चर्य चकित हो गये जब श्री महाराजजी ने मुस्कुराते हुये जवाब दिया - एक भी नहीं। उस पादरी ने पुनः प्रश्न किया- आप वर्तमान मूल ओरिजिनल जगद्गुरु हैं और आप का एक भी शिष्य नहीं ? क्या आप कान नहीं फूँकते ? जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज ने उत्तर दिया- नहीं, मैं कान नही फूँकता। बल्कि कान फूँकने वालो की बुराई करता हूँ। इसलिये हमारे खिलाफ हो गये है सारे बाबा लोग की ये खुद भी शिष्य नहीं बनाते न किसी को बनाने देते हैं।
इस धराधाम पर अनन्त बार श्रीहरि के अवतार हुये परन्तु अपने मन के दोष के कारण यह जीव कभी उनकी कृपा का पात्र नहीं बन सका ! ब्रह्म श्रीकृष्ण को भी यहाँ चोर - जार की उपाधि से विभूषित किया गया ! श्रीकृष्ण के अवतार काल में मिथ्या वासुदेव भी था जिसने दो नकली भुजाएं लगा ली थीं ! उनके श्रीकृष्ण के पास संदेश भेजा था कि असली वासुदेव मैं हूँ , तुम नहीं हो !
..........श्री महाराज जी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...