Wednesday, January 3, 2018

मन, भगवान् में लगाना है । मन गन्दा है और इसके विचार अनन्त जन्म में बिगडते-बिगडते स्वाभाविक गन्दे हो गये हैं, अतः मन को शुद्ध करना है । मन से ही अच्छे-बुरे विचार उत्पन्न होते हैं, यदि मन ने अपनी स्थिति ठीक कर ली, तो सब ठीक हो जायेगा।
------सुश्री श्रीधरी दीदी (प्रचारिका), जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
दीनता भीतर रहे , और बहार से एक्टिंग में क्रोध का व्यवहार भी करना होगा ! संसार में हर तरह का व्यवहार करना होगा लेकिन भीतर गड़बड़ न हो ! भीतर दीनता , सहनशीलता , नम्रता यही गुण रहें और बाहर से जैसा व्यवहार बाहर वाला करे उसी का जवाब देना चाहिए ! अब एक बदमाश घर में घुसे और उससे तुम कह दो कि आप कैसे पधारे ? नहीं , उसकी चप्पल से पिटाई करो , लेकिन भीतर से गड़बड़ न करो ! ये मतलब है ! दीनता , नम्रता और सरे गुण अंतःकरण में रहने चाहिये और संसार के व्यवहार में सब तरह का व्यवहार करना चाहिए ! जैसा पात्र हो वैसा व्यवहार करो ! बच्चे का सुधार करना है , उसको डाँटना है , गुस्से की एक्टिंग करो , गुस्सा न करो ! भीतर गड़बड़ न करो , बाहर से गड़बड़ की एक्टिंग करो ! इतने मर्डर किये अर्जुन ने , हनुमान जी ने , प्रह्लाद वगैरह ने , भीतर गड़बड़ नहीं हुआ बाहर से सब एक्टिंग हो रही है ! पिक्चर में जैसे प्यार की एक्टिंग करते हैं , दुश्मनी की एक्टिंग करते हैं , मारधाड़ करते हैं , वैसे ही मुँह बनाते हैं ! लेकिन भीतर नहीं ! वो तो पैसा कमाने को एक्टिंग कर रहे हैं ऐसे ही हमको बाहर से व्यवहार करना है अनेक प्रकार का लेकिन भीतर नार्मल रहें !
***जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज***
शास्त्रों के अनुसार प्रत्येक जीव कर्मबन्धन में है। प्रारब्धानुसार जितना भी सांसारिक सुख(जिसका वास्तविक स्वरुप दु:ख है) जिसके भाग्य में लिखा है मिलेगा ही।अरे भाई, हम जब शास्त्रों में पढ़ते हैं कि सर्वशक्तिमान् भगवान् राघवेन्द्र सरकार के पिता मर गये,किन्तु राम ने नहीं बचाया;इसी प्रकार जिसके मामा पूर्णतम पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण और पिता महापुरुष अर्जुन,दोनों मिल कर भी अभिमन्यु को नहीं बचा सके,तब हमें भी समझ लेना चाहिये कि हम दशरथ,अभिमन्यु आदि से तो बड़े नहीं जो हमारे लिये भगवान् काअकाट्टय विधान कट जायगा।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
अगर भगवान् या महापुरुष कृपा कर दें कि सबका भगवद् चिन्तन होने लगे, तो ये संसार ही क्यों रहता । किसी को कुछ करने के लिये वेद-पुराण आदेश क्यों देते कि तुम ऐसा करो, ऐसा करो, ऐसा न करो । भगवान् ही सोच लेते, कृपा कर देते तो सब जीवों का कल्याण हो जाता। भगवान् या महापुरुष की कृपा यही है कि हमको सही मार्ग बता दें। उसके बाद उस पर चलता, ये कृपा हम लोगों को करनी पडेगी। ये कृपा भगवान् या महापुरुष नहीं करेंगे । उनके पास और है क्या, कृपा के सिवा । वो तो कृपा ही करते हैं, उनकी कृपा को REALISE करना ये हमारा काम है।
-----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Saturday, December 2, 2017

साधुओं का शरीर ही तीर्थ स्वरूप है,उनके दर्शन से ही पुण्य होता है। साधुओं और तीर्थों में एक बड़ा भारी अंतर है ,तीर्थों में जाने का फल तो कालान्तर में मिलता है किन्तु साधुओं के समागम का फल तत्काल ही मिल जाता है। अत: सच्चे साधुओं का सत्संग तो बहुत दूर की बात है ,उनका दर्शन ही कोटि तीर्थों से अधिक होता है।
------सुश्री श्रीधरी दीदी (प्रचारिका),जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
Turning the Mind away from this world,Engage it in God.Make it your Spiritual Practice to do so again and again.
-------SUSHRI SHREEDHARI DIDI(PREACHER OF JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ).

भगवान कहते हैं :- मेरी "कृपा का रहस्य" तुम इतना मान लो की जो कुछ भी हो रहा है वो सब "कृपा" ही है।
------श्री महाराजजी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...