Wednesday, January 3, 2018

शास्त्रों के अनुसार प्रत्येक जीव कर्मबन्धन में है। प्रारब्धानुसार जितना भी सांसारिक सुख(जिसका वास्तविक स्वरुप दु:ख है) जिसके भाग्य में लिखा है मिलेगा ही।अरे भाई, हम जब शास्त्रों में पढ़ते हैं कि सर्वशक्तिमान् भगवान् राघवेन्द्र सरकार के पिता मर गये,किन्तु राम ने नहीं बचाया;इसी प्रकार जिसके मामा पूर्णतम पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण और पिता महापुरुष अर्जुन,दोनों मिल कर भी अभिमन्यु को नहीं बचा सके,तब हमें भी समझ लेना चाहिये कि हम दशरथ,अभिमन्यु आदि से तो बड़े नहीं जो हमारे लिये भगवान् काअकाट्टय विधान कट जायगा।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
अगर भगवान् या महापुरुष कृपा कर दें कि सबका भगवद् चिन्तन होने लगे, तो ये संसार ही क्यों रहता । किसी को कुछ करने के लिये वेद-पुराण आदेश क्यों देते कि तुम ऐसा करो, ऐसा करो, ऐसा न करो । भगवान् ही सोच लेते, कृपा कर देते तो सब जीवों का कल्याण हो जाता। भगवान् या महापुरुष की कृपा यही है कि हमको सही मार्ग बता दें। उसके बाद उस पर चलता, ये कृपा हम लोगों को करनी पडेगी। ये कृपा भगवान् या महापुरुष नहीं करेंगे । उनके पास और है क्या, कृपा के सिवा । वो तो कृपा ही करते हैं, उनकी कृपा को REALISE करना ये हमारा काम है।
-----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Saturday, December 2, 2017

साधुओं का शरीर ही तीर्थ स्वरूप है,उनके दर्शन से ही पुण्य होता है। साधुओं और तीर्थों में एक बड़ा भारी अंतर है ,तीर्थों में जाने का फल तो कालान्तर में मिलता है किन्तु साधुओं के समागम का फल तत्काल ही मिल जाता है। अत: सच्चे साधुओं का सत्संग तो बहुत दूर की बात है ,उनका दर्शन ही कोटि तीर्थों से अधिक होता है।
------सुश्री श्रीधरी दीदी (प्रचारिका),जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
Turning the Mind away from this world,Engage it in God.Make it your Spiritual Practice to do so again and again.
-------SUSHRI SHREEDHARI DIDI(PREACHER OF JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ).

भगवान कहते हैं :- मेरी "कृपा का रहस्य" तुम इतना मान लो की जो कुछ भी हो रहा है वो सब "कृपा" ही है।
------श्री महाराजजी।

Avoid spiritual discussions with an unqualified person. In his present state, he cannot comprehend those incomprehensible subjects as he is devoid of spiritual experience. He will only transgress, losing whatever little faith he has. In addition, his faithlessness will disturb the mind of the person revealing those divine secrets.
-------SHRI MAHARAJ JI.

वेद कहता है -
उद्यानं ते पुरुष नावयानम् ।
अरे मनुष्य ! सोच तुझसे आगे कुछ भी नहीं है , देवता भी तेरे नीचे हैं, ये भी तरसते हैं मानव देह को । तू ऐसे देह को पाकर खो रहा है । क्या कर रहा है ? जी जरा आजकल मैं सर्विस खोज रहा हूँ । जरा आजकल मैं एक लाख के चक्कर में हूँ , जरा आजकल , लड़का जरा बड़ा हो जाय , बीबी जरा ऐसी हो जाय, बेटा जरा । क्या सोच रहा है ? इसके लिये तू आया है ? अनन्त बाप, अनन्त बेटे, अनन्त पति , अनन्त बीबी , अनन्त वैभव अनन्त जन्मों में बना चुका , पा चुका, भोग चुका , खो चुका अब भी पेट नहीं भरा ? फिर दस बीस करोड़, दस बीस अरब , दस बीस बीबी , दस बीस बच्चे के चक्कर में पड़ा है । सोच । उठ ऊपर को ' उद्यानम् ' । अगर तू चूक गया तो ऐ मनुष्य ! तुझसे आगे कोई सीट नहीं है ये अन्तिम सीट पर तू खड़ा है । अब जब यहाँ से नीचे गिरेगा तो -
आकर चारि लक्ष चौरासी । योनि भ्रमत यह जिव अविनाशी।
कबहुँक करि करुणा नर देही ।

करुणा करके मानव देह , इस बार जो मिला , यह हर बार नहीं मिला करेगा । हजार , लाख , करोड़ साल बाद भी नहीं मिला करेगा । ये तो ' कबहुँक करि करुणा नर देही ।'
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...