This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Wednesday, January 3, 2018
In
the world, everyone is wandering around for the fulfillment of their
aim of perfect happiness. If a Saint tells us that the path to attain
this goal is not here, but in the opposite direction, then we will
surrender to God and attain that supreme bliss. But those who do not
surrender and continue to love the material world, as they have done in
countless past lives, remain bound. We waste our time and energy in an
attempt to be called good, while it is totally impossible considering
the truth stated above. We never make an effort to actually become good,
we only want to be called good. All this results in a lifelong
hypocrisy. We constantly remain concerned about acting, pretence and
etiquette.
.............JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.
.............JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.
हमारे गुरुदेव.........'हमारे कृपालु गुरुवर'....'हमारे रखवार'...'हमारी सरकार'.....!!!!
हमारे गुरुदेव कब क्यों और कैसे किसी आध्यात्मिक कार्य को संपादित करते है यह जान पाना सर्वथा असंभव है। गूढ़तम आध्यात्मिक रहस्यों से आच्छादित उनका व्यवहार का लवलेष भी अगर पकड़ में आजाये तो हमें अपना सौभाग्य मानना चाहिये। यूं तो हम संसारी जन अपने स्वभाव,व अज्ञानवश अनेकों प्रश्न दर प्रश्न करते हैं,लेकिन हमारी इन भोली जिज्ञासाओं का समाधान शब्द से नहीं सत्संग से ही कुछ संभव हो सकता है। महापुरुष तो जीव कल्याण का कार्य अनवरत रूप से करता ही रहेगा.......ये उनका 'स्वभाव' है- 'कृपालु' जो हैं-अपना विरद तो उन्हें निभाना ही है।
हमारे गुरुदेव कब क्यों और कैसे किसी आध्यात्मिक कार्य को संपादित करते है यह जान पाना सर्वथा असंभव है। गूढ़तम आध्यात्मिक रहस्यों से आच्छादित उनका व्यवहार का लवलेष भी अगर पकड़ में आजाये तो हमें अपना सौभाग्य मानना चाहिये। यूं तो हम संसारी जन अपने स्वभाव,व अज्ञानवश अनेकों प्रश्न दर प्रश्न करते हैं,लेकिन हमारी इन भोली जिज्ञासाओं का समाधान शब्द से नहीं सत्संग से ही कुछ संभव हो सकता है। महापुरुष तो जीव कल्याण का कार्य अनवरत रूप से करता ही रहेगा.......ये उनका 'स्वभाव' है- 'कृपालु' जो हैं-अपना विरद तो उन्हें निभाना ही है।
इसलिए हमारे गुरुदेव का "प्रेम रस सिद्धान्त" एवं उनकी द्वारा बताई 'साधना
पद्धति' इस युग की एक युगांतकारी उपलब्धि है। महापुरुष इतिहास का साक्षी
ही नहीं वरन नित नए-नए इतिहास का रचियता भी होता है।हम नहीं समझ सकते अपने
कृपालु गुरुदेव को। इसलिए जब भी कहीं आचार्यवर के विषय में कुछ कथ्य या लेख
प्रस्तुत करते हैं,अगले ही पल अपनी मूर्खता पर लज्जित हो जाते हैं। अपराध
बोध व ग्लानि से मन विचलित हो जाता है-हजारों-हजारों साधक मानस पटल पर सजीव
हो जाते हैं।कहीं कोई हमारी इस धृष्टा से आहत तो नहीं हो जाएगा-लगता है
सभी वर्जना की मुद्रा में कह रहे हैं-ये क्या कर रहे हो? समुद्र मथने का
प्रयास? भूमंडल नापने की चेष्टा,आध्यात्मिक नियम के विपरीत कर्म? असीम को
बांधने की मूर्खता-क्योंकि जिन गुरुदेव के सन्मुख समय अपनी गति भूल जाता
है,वक्ता अपनी वाकचातुरी और ज्ञानी ज्ञान गठरिया खो देता है ऐसे एक दिव्य
एक्सरे मशीन के सामने जब आत्मा,मन,प्राण,सब के सब नग्न व असहाय से हो जाते
हैं तब कौन करे उस 'मशीन' का अवलोकन,कैसे हो उसकी कार्य पद्धति का विवेचन।
वैसे तो श्री महाराजजी अपने सरल-सरस आत्मीयता के साथ नन्हें-नन्हें बच्चों से भी खेलते दिखाई पड़ते हैं,लेकिन सच ये है वे हमारे अंत:करण में बड़ी ही सावधानी से बैठे हैं। पल भर का भी हमारा कोई भी चिंतन,कर्म उनकी पकड़ से छूट नहीं सकता---इस 'सत्य' पर अगर हम विश्वास कर ले तो कुछ जानने या कहने को शेष नहीं रह जाता। यह 'सत्य' जो अनंत सूर्य हैं,जीव जगत,का जीवन है-प्रकार्तिक प्रकाश से तो हम बाहर देखते हैं,वह भी सीमित दृष्टि पाठ तक लेकिन इस 'सत्य' के प्रकाश से आत्मा को देखना व जानना है-चंचल भोले मन को नियंत्रित करना है।फिर उस मन को त्याग वैराग्य दया क्षमा परोपकार आदि देवी गुणों से क्षृंगार करना है। फिर उसके बाद ही तो भगवत प्रेम के हिंडोले पर विहार कर सकेगा साधक।
राधे-राधे।
वैसे तो श्री महाराजजी अपने सरल-सरस आत्मीयता के साथ नन्हें-नन्हें बच्चों से भी खेलते दिखाई पड़ते हैं,लेकिन सच ये है वे हमारे अंत:करण में बड़ी ही सावधानी से बैठे हैं। पल भर का भी हमारा कोई भी चिंतन,कर्म उनकी पकड़ से छूट नहीं सकता---इस 'सत्य' पर अगर हम विश्वास कर ले तो कुछ जानने या कहने को शेष नहीं रह जाता। यह 'सत्य' जो अनंत सूर्य हैं,जीव जगत,का जीवन है-प्रकार्तिक प्रकाश से तो हम बाहर देखते हैं,वह भी सीमित दृष्टि पाठ तक लेकिन इस 'सत्य' के प्रकाश से आत्मा को देखना व जानना है-चंचल भोले मन को नियंत्रित करना है।फिर उस मन को त्याग वैराग्य दया क्षमा परोपकार आदि देवी गुणों से क्षृंगार करना है। फिर उसके बाद ही तो भगवत प्रेम के हिंडोले पर विहार कर सकेगा साधक।
राधे-राधे।
गुरु: कृपालुर्मम शरणम, वंदेsहं सद्गुरु चरणम।।
आज करूँ कहो जनि गोविन्द राधे।
अभी करूँ यह कहि मन को लगा दे।।
आज करूँ कहो जनि गोविन्द राधे।
अभी करूँ यह कहि मन को लगा दे।।
ये नव वर्ष 2018 आपकी सभी की साधना में उत्साह,उन्नति व दिव्य अनुभूतियाँ
लेकर आये। आपकी प्रीति श्री हरि-गुरु चरणों में निरंतर दृढ़ होती जाये एवं
उनकी असीम अनुकंपा का अनुभव करते हुए,इस देव-दुर्लभ मानव देह की
क्षणभंगुरता पर विचार कर तन-मन-धन की सेवा का संकल्प लेकर दिव्य गुरु चरणों
में उनका सदुपयोग कर,हर क्षण को हरि-गुरु के स्मरण में लगा कर आप अपने
जीवन को सफल बनायें।
राधे-राधे।
राधे-राधे।
कभी
कभी लोग हमसे कहते हैं कि महाराजजी हमारा बड़ा दुर्भाग्य है । हमें हँसी
आती है और आश्चर्य भी होता है कि यदि मनुष्य अभागा है तो क्या ये कुत्ता
बिल्ली गधे भाग्य वाले हैं। अरे! तुम्हें चौरासी लाख योनियों मे सबसे ऊपर
मानव देह मिला । भारत जैसे देश में जन्म मिला जहाँ भगवान के इतने अवतार हुए
और संत भी बहुत आए । फिर तत्त्वज्ञान कराने वाला गुरु भी मिला। अनंत जीवों
में कितनो को ये सौभाग्य मिला। सोचो!
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
O
stubborn and foolish mind! Besides spoiling yourself, you are spoiling
me as well. You have wasted countless lives wandering around in the
material world, but have refused time and time again to surrender to the
merciful Radha Rani, who is waiting with open arms to embrace you. It
is not too late. Go to Radhe Rani. She will forgive you and accept you
as Her own.
--- JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.
--- JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.
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मन का अटैचमेंट किसमें करें?
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Baar Baar suno, Baar Baar suno, tab tatvagyan paripakva hoga. Ye jo hum Logo ko Brham hota hai ki yeh to maine bahut suna hai, yeh to mein j...
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ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...






