Thursday, February 8, 2018

ए मनुष्यों! मानव देह प्राप्त हुआ है , भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ भाेग विलास में केवल लिप्त रह कर। पतन के लिये ताे अन्य याेनी हैं। संसार मे रह कर तुम संसार का उपयाेग कराे दुरूपयाेग नही, और संसार मे अनासक्त हाेकर भगवतप्राप्ति करो , भक्ति कराे भगवान् की, क्योंकि मानव देह का एक मात्र लक्ष्य भगवतप्राप्ति ही है,अन्य कुछ नहीं। नहीं ताे ये अनमाेल खजाना मानव देह छिन जायेगा और कुकर शुकर की योनि मे भेज देंगें भगवान।
------ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
हे मन ! मैं तुमको अनन्य प्रेम का सिद्धांत समझाता हूँ, ध्यान देकर सुनो । श्यामा - श्याम का अनन्य प्रेमी केवल श्यामा - श्याम एवं उनके परिकर (सेवक) रसिक - जनों के सिवाय अन्यत्र कहीं भी, स्वप्न में भी, अपना सम्बन्ध नहीं जोड़ता । संसार के सुख, मोक्ष सुख एवं बैकुण्ठ आदि लोकों के सुखों से सर्वथा परे रहता है, अर्थात् बैकुण्ठ पर्यन्त के किसी भी सुख के चक्कर में नहीं पड़ता । इन सब सुखों को जीतकर वह अनन्य भाव ग्रहण करता है । राधा - कृष्ण के परिकर रसिक - जनों को छोड़कर बैकुंठ के स्वामी महाविष्णु को भूलकर भी मित्र नहीं बनाता । कर्तव्य, अकर्तव्य एवं लौकिक, वैदिक आज्ञाओं से भी अनन्य प्रेमी थोड़ा भी भयभीत नहीं होता । ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अनन्य प्रेमी के रोम - रोम मं एकमात्र राधा - कृष्ण एवं राधा - कृष्ण प्रेमियों का पूर्ण विश्वास रहता है।
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
मौत को हर समय याद रखो !पता नहीं अगला क्षण मिले न मिले ! कौन जनता है कल का दिन मिले न मिले ?
Always remember your impending time of death. No one knows if he will live to see the next moment or not. Who knows if he will live to see tomorrow?
.......SHRI MAHARAJ JI.


Wednesday, January 3, 2018

हम साधकों को सदा यही समझना चाहिए कि हमसे जो अच्छा काम हो रहा है, वह गुरु एवं भगवान की कृपा से ही हो रहा है क्योंकि हम तो अनादिकाल से मायाबद्ध घोर संसारी, घोर निकृष्ट, गंदे आइडियास(ideas) वाले बिलकुल गंदगी से भरे पड़े हैं। हमसे कोई अच्छा काम हो जाये, भगवान के लिए एक आँसू निकल जाय, महापुरुष के लिए, एक नाम निकल जाये मुख से, अच्छी भावना पैदा हो जाये उसके प्रति हमारी यह सब उनकी ही कृपा से हुआ ऐसा ही मानना चाहिये। अगर वे सिद्धान्त न बताते , हमको अपना प्यार न देते तो हमारी प्रवर्ति ही क्यों होती, कभी यह न सोचो की हमारा कमाल है, अन्यथा अहंकार पैदा होगा , अहंकार आया की दीनता गयी, दीनता गयी तो भक्ति का महल ढह गया। सारे दोष भर जाएंगे एक सेकंड में इसलिए कोई भी भगवत संबंधी कार्य हो जाये तो उसको यही समझना चाहिये कि गुरु कृपा है, उसी से हो रहा है ताकि अहंकार न होने पाये। अगर गुरु हमको न मिला होता, उसने हमको न समझाया होता ,उसने अपना प्यार दुलार न दिया होता, आत्मीयता न दी होती तो हम ईश्वर कि और प्रव्रत्त ही न होतें। अत: उन्ही की कृपा से सब अच्छे कार्य हो रहें है ऐसा सदा मान के चलो।
-----------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

कृपालु गुरुवर हैं रखवार हमारों......!!!!!

हमारे कृपालु गुरुवर तो जीव की शरणागति के अनुसार ही योगक्षेम वहन करने लगते हैं।भिन्न-भिन्न तरीकों से श्री गुरुदेव कृपा करते ही रहते हैं जिससे जीव का अंत:करण शुद्ध हो,वह अनुग्रह समझने लगे एवं निश्चयात्मक बुद्धि से सदा के लिए शरणागत हो जाये।अंत:करण पात्र पावन करने में जीव को गुरुदेव के साथ सहयोग करना ही पड़ेगा।
गुरुदेव अपने जन को अपना सत्संग एवं प्रथम दर्शन देने से पहले उसे परखते रहते हैं। प्रथम मिलन दर्शन एवं सत्संग गुरु का जीव पर सबसे बड़ा अनुग्रह है।उसके उपरांत जीव पर गुरु को बहुत कठिन परिश्रम करना पड़ता है,तब जाकर जीव धीरे-धीरे शरणागति की ओर उन्मुख होता है। जीव के अनुरूप ही उसके प्रश्न होते हैं और उसी के अनुरूप जिसको वो समझ सके गुरुदेव के उत्तर होते हैं।कब कहाँ किसके लिए क्या उपयुक्त है गुरुवर ही जानते हैं।जीव का भगवान में अनुराग कैसे हो और जगत से कैसे वैराग्य कैसे हो,यह सब अनुग्रह गुरुदेव ही करते हैं।वे जीव की क्लास में जाकर उसके शंका समाधान करते हैं।
गुरुदेव से प्रथम मिलन एवं सत्संग में कोई देखते ही होश खो बैठा,कोई आठ-दस दिन तक सतत रोता रहा कोई गुरुदेव का सत्संग छोड़ के पुन: अपने संसार में जाना ही नहीं चाहता है।अपवाद स्वरूप ऐसे भी व्यक्ति हैं जिन्हे प्रारम्भ में अच्छा नहीं लगा किन्तु वे आज 'राधे' नाम सुनते ही बेचैन हो जाते हैं और अब पूर्ण रूप से सत्संग में हैं।श्री महाराजजी किसी ग्रहस्थ को जब तक उसका सांसरिक कर्तव्य(बीवी,बच्चों) आदि का शेष रेहता है संसार कदापि त्यागने नहीं देते हैं।वरन उस व्यक्ति के सत्संग से परिवार के अन्य सदस्य का भी हरि-गुरु में अनुराग होने लगता है।भगवद मार्ग में अग्रसर अविवाहित व्यक्ति गुरु सत्संग में परा विद्या के विषय में तो जानकारी प्राप्त करता ही है,गुरु कृपा से जगत में भी उच्च कोटि की शिक्षा प्राप्त कर स्वावलंबी एवं सक्षम बन जाता है।किसी व्यक्ति को गुरुधाम में वास मिल भी जाये तो यहाँ उसे लगातार कठिन वातावरण में परीक्षाओं का सामना करना पड़ता है। जब वह जगत वैराग्य एवं भगवद अनुराग में दृढ़ निश्चयी होता है तब यहाँ टिक पाता है। बार-बार अनुरोध करने पर भी गुरु सेवा हर किसी को उपलब्ध नहीं है।
श्री महाराजजी अथवा उनके अति-विद्वान प्रचारकों का प्रवचन सुनने कोई क्यों गया? अथवा किसी को भी श्री महाराजजी के रचित पद,साहित्य बिना मिले ही कैसे प्राप्त हुआ,पढ़ने सुनने को मिला,उनका प्रथम दर्शन कैसे प्राप्त हुआ? यदि हमारे गुरुदेव के सत्संगीयो से पूछा जाये तो सबके अपने-अपने विलक्षण विचित्र किन्तु कल्याणकारी अनुभव हैं।परंतु सब एक मत से स्वीकार करते हैं की अचानक उनकी कृपा से ही उनके दर्शन कर सके,उन तक पहुच पाये,सब पर अकारण कृपा ही हुई,ऐसे बनाव स्वयं बन गए,ऐसा वातावरण उपस्थित कर दिया गया गुरु द्वारा की सभी किसी न किसी बहाने से आकर्षित होकर उन तक पहुँच ही गये।हमारे कृपालु रखवार सदा जीव को परखते रहते हैं एवं उचित अवसर देख कर तत्काल जिज्ञासु मनुष्यों को अपना सत्संग प्रदान कर देते हैं।

राधे-राधे।

साधुओं का शरीर ही तीर्थ स्वरूप है,उनके दर्शन से ही पुण्य होता है। साधुओं और तीर्थों में एक बड़ा भारी अंतर है ,तीर्थों में जाने का फल तो कालान्तर में मिलता है किन्तु साधुओं के समागम का फल तत्काल ही मिल जाता है। अत: सच्चे साधुओं का सत्संग तो बहुत दूर की बात है ,उनका दर्शन ही कोटि तीर्थों से अधिक होता है।
------सुश्री श्रीधरी दीदी (प्रचारिका),जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

गुरु मेटत अँधियार .....!!!
गुरु अपने अनुगत के लिए सदा कृपालु होता है,किन्तु कृष्ण प्राप्ति हेतु लालसा बनाए रखने की पात्रता अनिवार्य है। पात्रता का तात्पर्य शरणागति से है। निष्काम भाव से गुरु की शरणागति करने से वह महापुरुष अनुगत साधक के अंत:करण की भूमि को उर्वरक बना उसमें ईश्वर भक्ति का बीज बोता है। गुरु कृपा पाने की शर्त यह है की साधक की गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा एवं दृढ़ निष्ठा हो। विपरीत से विपरीत परिस्थिति में उसकी गुरु भक्ति निष्कंप और निश्चल रहे। तभी शिष्य की चेतना गुरु की चेतना से एकाकार हो सकती है,उसकी वत्सलता और कृपा को अनुभूत कर सकती है। गुरु अनुगत के अंत:करण की निर्मलता को नहीं देखता बल्कि उसका समर्पण देखता है और हरी की गोद उपलब्ध करवा देता है।
गुरु माता शिशु मन गोविंद राधे। विमल बना के हरि गोद बैठा दे।।
अत: गुरु की महिमा का बखान असंभव है;शब्दातीत है।
काम ,क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या,द्वेष, अहंकार आदि मन के शत्रु घटाटोप की तरह मन को आछादित किए रहते हैं। ऐसे भीषण शत्रुओं से घिरे मन की स्थिति के प्रति उसके कृपालु मन में भाव- संवेदनाओं की अजस्र धार फूट पड़ती है और वह अपने अनुगत के अंत:करण के मल का अनवरत प्रक्षालन करता रहता है। गुरु के हर व्यवहार,हर कार्य का विशिष्ट अर्थ होता है,भले ही वह ऊपरी तौर पर कितना भी निरर्थक क्यों न लगे। हमें उसकी किसी बात की अवहेलना नहीं करनी चाहिए,बल्कि अटूट श्रद्धा रखनी चाहिए क्योंकि गुरु के रूठ जाने पर जीव के कल्याण का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। गुरु आज्ञापालन और सेवा ही जीव को ईश्वर तक पहुंचाने का मूल मंत्र है। गुरु सेवा का अर्थ है- गुरु जो भी कहे,जैसा भी काम सौंपे,करना है।

---जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...