This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Monday, March 12, 2018
''कृपा सागर कृपालु''........!!!
हे कृपा सागर 'कृपालु गुरुदेव'! तुम्हारी महिमा अपरम्पार है । तुम्हारे ऋण से हम करोड़ों कल्प में भी उऋण नहीं हो सकते । निरन्तर अपराध किये जाने पर भी तुम अपनी असीम करुणा के कारण हम पामर जीवों को गले लगाते हो । तुम्हारे द्वार पर कोई भी आ जाय सदाचारी हो या दुराचारी, तुम्हारा प्रशंसक हो अथवा निन्दक, पापी हो या भक्त, निर्धन हो या धनवान, विद्वान हो या अपढ़ गँवार, तुम उसे अपने प्रेम पाश में बाँधकर उसकी आध्यात्मिक गरीबी दूर करके उसे वह धन प्रदान करते हो कि वह सदा सदा के लिए मालामाल हो जाता है ।
जय श्री राधे।
हे कृपा सागर 'कृपालु गुरुदेव'! तुम्हारी महिमा अपरम्पार है । तुम्हारे ऋण से हम करोड़ों कल्प में भी उऋण नहीं हो सकते । निरन्तर अपराध किये जाने पर भी तुम अपनी असीम करुणा के कारण हम पामर जीवों को गले लगाते हो । तुम्हारे द्वार पर कोई भी आ जाय सदाचारी हो या दुराचारी, तुम्हारा प्रशंसक हो अथवा निन्दक, पापी हो या भक्त, निर्धन हो या धनवान, विद्वान हो या अपढ़ गँवार, तुम उसे अपने प्रेम पाश में बाँधकर उसकी आध्यात्मिक गरीबी दूर करके उसे वह धन प्रदान करते हो कि वह सदा सदा के लिए मालामाल हो जाता है ।
जय श्री राधे।
भगवान
ने दया करके मानव देह दिया और आप लोग जब गर्भ में थे तब वादा किया था की
महाराज बहुत दु:ख मिल रहा है माँ के पेट में, गंदगी में, सिर नीचे पैर ऊपर
कितना कोमल शरीर, हमको निकालो, आपका ही भजन करेंगे आपको पाने का उपाय
खोजेंगे अबकी बार मुझे निकालो । और बाहर आया मम्मी ने कहा ए मेरा भजन कर,
पापा ने कहा ए मैं तेरा हूँ । यह सब लोगों ने धोखा देकर बेचारे को बेबकूफ
बना दिया, भगवान को दिया हुआ वादा भूल गया और भगवान को छोड़ इन लोगों को
भजने लगा । और अगर जागा भी, कोई संत मिल गया और जगा दिया तो कल से करेंगे, अवश्य करेंगे अवश्य । आज जरा काम आ गया कल से करेंगे अवश्य।
तन का भरोसा नहीं गोविंद राधे ।
जाने कब काल तेरा तन छिनवा दे ॥
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
जाने कब काल तेरा तन छिनवा दे ॥
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
एक
सुन्दर स्त्री को एक व्यक्ति रिवाल्वर से मारने जा रहा है एवं दूसरा
व्यक्ति उस सुन्दरी को बचाने के लिये स्वयं सीना ताने खड़ा है। ऐसा क्यों ?
पता लगाने पर ज्ञात हुआ कि वह सुन्दरी रिवाल्वर मारने वाले की स्त्री है
किन्तु सीना ताने हुए व्यक्ति से प्रेम करती है। अब सोचिये सुन्दरता में
सुख होता तो दोनों को बराबर-बराबर मिलता।
जिस वस्तु में बार-बार सुख का चिन्तन किया जाता है उसी वस्तु में आसक्ति हो जाती है।
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
जिस वस्तु में बार-बार सुख का चिन्तन किया जाता है उसी वस्तु में आसक्ति हो जाती है।
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
तुम्हारा
Aim खाना नहीं है, तुम्हारा Aim आत्मा का जाे लक्ष्य है, आत्मा की जाे
खुराक है, आत्मा का जाे भाेज्य पदार्थ है वह है ,अर्थात् भगवत्प्राप्ति।
ताे इस बात का बार-बार जब चिन्तन करे काेई जीव।ये बीमारी लग जाय़ उसके
पीछे जैसे संसार में किसी काे प्यार की बीमारी लग जाती है,किसी लड़के काे
किसी लड़की की बीमारी लग गई या किसी दुश्मन से दुश्मनी की बीमारी लग गई ,
ताे उसका लगातार चिन्तन चलता रहता है जागते, बैठते, साेते हर समय हर
जगह।ऐसे अगर हर समय तुम्हारा चिन्तन प्रारम्भ हाे जाये कि मैं जीव हूँ, मैं
श्रीकृष्ण दास हूँ, मेरा असली रुप ये है,ये मेरा मानवदेह मुझे ईश्वर
प्राप्ति के लिये मिला है और फिर कल ये रहे न रहे,इसलिये आज करना है, अभी
करना है, तुरन्त करना है, ये निश्चय जब तक आप पक्का नही करेंगें,तब तक
अनन्त सन्त मिले,भगवान की गाेद में आप बैठे हैं - फिर भी काेई लाभ नहीं।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
तुमको बर्तन साफ़ करना पड़ेगा। बर्तन साफ़? क्या मतलब?
अन्तःकरण शुद्धि, पहला काम।अन्तःकरण की शुद्धि अर्थात् ये जो डिसीज़न अनन्त जन्मों से हम करते आये हैं कि संसार में ही आनन्द है, ‘ही’। हमको नहीं मिला ये बात अलग है। है। एक लाख में नहीं मिला, एक करोड़ में है,एक करोड़ में नहीं मिला, एक अरब में है। एक कांस्टेबल बनकर के नहीं मिला,सब इंस्पेक्टर को होता होगा, कोतवाल है वो...।अरे! नहीं, उसके भी ऊपर है वो एस॰पी॰ को होगा,आई॰जी॰ को होगाअरे! क्या कल्पना कर रहा है पागल,संसार मात्र में कहीं आनन्द नहीं है—
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
अन्तःकरण शुद्धि, पहला काम।अन्तःकरण की शुद्धि अर्थात् ये जो डिसीज़न अनन्त जन्मों से हम करते आये हैं कि संसार में ही आनन्द है, ‘ही’। हमको नहीं मिला ये बात अलग है। है। एक लाख में नहीं मिला, एक करोड़ में है,एक करोड़ में नहीं मिला, एक अरब में है। एक कांस्टेबल बनकर के नहीं मिला,सब इंस्पेक्टर को होता होगा, कोतवाल है वो...।अरे! नहीं, उसके भी ऊपर है वो एस॰पी॰ को होगा,आई॰जी॰ को होगाअरे! क्या कल्पना कर रहा है पागल,संसार मात्र में कहीं आनन्द नहीं है—
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
सब जगह एक हाल है,बल्कि जितना बड़ा आदमी संसार में आप लोग बोलते हैं न,
उतना ही वो दुःखी है।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
उतना ही वो दुःखी है।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
We
all devotees of Shree Maharaj ji always experience one thing that, our
life was just meaningless before meeting Maharaj ji. We didn't even know
the purpose of our lives. Always wandering here and there just for the
satisfaction of immortal desire for happiness. We had made innumerable
relationships Mother, Father, Sister, Brother etc. but none could
satisfy.
Life was just stationary before Maharaj ji. Heart was just dead. Mind was tired of this world.
But after getting Maharaj ji, the seed of divine love is spurting in our hearts. This we all realize. But we must think, that we are all his souls, his children, his parts. That is why, in 7 million people only few get this rare opportunity to be in his association. Isn't this is grace. Only by his grace we are at this stage. Always loving us. keep on gracing us every time. We have uncountable sins in backlog, lots of sinful activities on our account but in spite of our shortcomings, Maharaj ji always grace us. With even fraction of time devoted in his remembrance, he grace us with so much love.
He really loves us very much. Care for us. He is our real relative, real friend, real mother father everything. He is our true companion. We must listen to him. We must follow him. We must cry out loud and call him. He is doing so much for us. So much so much. So much for our welfare. He knows what is best for us, what is harmful for us. We must surrender ourselves to his lotus feet.
Life was just stationary before Maharaj ji. Heart was just dead. Mind was tired of this world.
But after getting Maharaj ji, the seed of divine love is spurting in our hearts. This we all realize. But we must think, that we are all his souls, his children, his parts. That is why, in 7 million people only few get this rare opportunity to be in his association. Isn't this is grace. Only by his grace we are at this stage. Always loving us. keep on gracing us every time. We have uncountable sins in backlog, lots of sinful activities on our account but in spite of our shortcomings, Maharaj ji always grace us. With even fraction of time devoted in his remembrance, he grace us with so much love.
He really loves us very much. Care for us. He is our real relative, real friend, real mother father everything. He is our true companion. We must listen to him. We must follow him. We must cry out loud and call him. He is doing so much for us. So much so much. So much for our welfare. He knows what is best for us, what is harmful for us. We must surrender ourselves to his lotus feet.
Radhey- Radhey.
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