Monday, March 12, 2018

कुछ समय का नियम बनाकर प्रतिदिन श्यामसुंदर का स्मरण करते हुए रोकर उनके नाम-लीला-गुण आदि का संकीर्तन एवं स्मरण करो एवं शेष समय में संसार का आवश्यक कार्य करते हुए बार-बार यह महसूस करो कि श्यामसुंदर हमारे प्रत्येक कार्य को देख रहें हैं, और उन्हें आप दिखा-दिखा कर कार्य कर रहे हैं। इस प्रकार कर्म भी न्यायपूर्ण होगा एवं थकावट भी न होगी। एक बार करके देखिये।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
"संसार में हमें 'सुख' दिखायी पड़ता है, पर वास्तव में संसार का सुख ,सुख नहीं धोखा है।
-----श्री महाराजजी।"
''कृपा सागर कृपालु''........!!!
हे कृपा सागर 'कृपालु गुरुदेव'! तुम्हारी महिमा अपरम्पार है । तुम्हारे ऋण से हम करोड़ों कल्प में भी उऋण नहीं हो सकते । निरन्तर अपराध किये जाने पर भी तुम अपनी असीम करुणा के कारण हम पामर जीवों को गले लगाते हो । तुम्हारे द्वार पर कोई भी आ जाय सदाचारी हो या दुराचारी, तुम्हारा प्रशंसक हो अथवा निन्दक, पापी हो या भक्त, निर्धन हो या धनवान, विद्वान हो या अपढ़ गँवार, तुम उसे अपने प्रेम पाश में बाँधकर उसकी आध्यात्मिक गरीबी दूर करके उसे वह धन प्रदान करते हो कि वह सदा सदा के लिए मालामाल हो जाता है ।
जय श्री राधे।
भगवान ने दया करके मानव देह दिया और आप लोग जब गर्भ में थे तब वादा किया था की महाराज बहुत दु:ख मिल रहा है माँ के पेट में, गंदगी में, सिर नीचे पैर ऊपर कितना कोमल शरीर, हमको निकालो, आपका ही भजन करेंगे आपको पाने का उपाय खोजेंगे अबकी बार मुझे निकालो । और बाहर आया मम्मी ने कहा ए मेरा भजन कर, पापा ने कहा ए मैं तेरा हूँ । यह सब लोगों ने धोखा देकर बेचारे को बेबकूफ बना दिया, भगवान को दिया हुआ वादा भूल गया और भगवान को छोड़ इन लोगों को भजने लगा । और अगर जागा भी, कोई संत मिल गया और जगा दिया तो कल से करेंगे, अवश्य करेंगे अवश्य । आज जरा काम आ गया कल से करेंगे अवश्य।
तन का भरोसा नहीं गोविंद राधे ।
जाने कब काल तेरा तन छिनवा दे ॥

------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

एक सुन्दर स्त्री को एक व्यक्ति रिवाल्वर से मारने जा रहा है एवं दूसरा व्यक्ति उस सुन्दरी को बचाने के लिये स्वयं सीना ताने खड़ा है। ऐसा क्यों ? पता लगाने पर ज्ञात हुआ कि वह सुन्दरी रिवाल्वर मारने वाले की स्त्री है किन्तु सीना ताने हुए व्यक्ति से प्रेम करती है। अब सोचिये सुन्दरता में सुख होता तो दोनों को बराबर-बराबर मिलता।
जिस वस्तु में बार-बार सुख का चिन्तन किया जाता है उसी वस्तु में आसक्ति हो जाती है।
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
तुम्हारा Aim खाना नहीं है, तुम्हारा Aim आत्मा का जाे लक्ष्य है, आत्मा की जाे खुराक है, आत्मा का जाे भाेज्य पदार्थ है वह है ,अर्थात् भगवत्प्राप्ति। ताे इस बात का बार-बार जब चिन्तन करे काेई जीव।ये बीमारी लग जाय़ उसके पीछे जैसे संसार में किसी काे प्यार की बीमारी लग जाती है,किसी लड़के काे किसी लड़की की बीमारी लग गई या किसी दुश्मन से दुश्मनी की बीमारी लग गई , ताे उसका लगातार चिन्तन चलता रहता है जागते, बैठते, साेते हर समय हर जगह।ऐसे अगर हर समय तुम्हारा चिन्तन प्रारम्भ हाे जाये कि मैं जीव हूँ, मैं श्रीकृष्ण दास हूँ, मेरा असली रुप ये है,ये मेरा मानवदेह मुझे ईश्वर प्राप्ति के लिये मिला है और फिर कल ये रहे न रहे,इसलिये आज करना है, अभी करना है, तुरन्त करना है, ये निश्चय जब तक आप पक्का नही करेंगें,तब तक अनन्त सन्त मिले,भगवान की गाेद में आप बैठे हैं - फिर भी काेई लाभ नहीं।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

तुमको बर्तन साफ़ करना पड़ेगा। बर्तन साफ़? क्या मतलब?
अन्तःकरण शुद्धि, पहला काम।अन्तःकरण की शुद्धि अर्थात् ये जो डिसीज़न अनन्त जन्मों से हम करते आये हैं कि संसार में ही आनन्द है, ‘ही’। हमको नहीं मिला ये बात अलग है। है। एक लाख में नहीं मिला, एक करोड़ में है,एक करोड़ में नहीं मिला, एक अरब में है। एक कांस्टेबल बनकर के नहीं मिला,सब इंस्पेक्टर को होता होगा, कोतवाल है वो...।अरे! नहीं, उसके भी ऊपर है वो एस॰पी॰ को होगा,आई॰जी॰ को होगाअरे! क्या कल्पना कर रहा है पागल,संसार मात्र में कहीं आनन्द नहीं है—
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।

सब जगह एक हाल है,बल्कि जितना बड़ा आदमी संसार में आप लोग बोलते हैं न,
उतना ही वो दुःखी है।

----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...